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Indira Ekadashi 2025: पूर्वजों के मोक्ष के लिए प्रार्थना को समर्पित एकादशी
Authored By: स्मिता
Published On: Tuesday, September 2, 2025
Last Updated On: Tuesday, September 2, 2025
Indira Ekadashi 2025: इंदिरा एकादशी पितृ पक्ष में पड़ने के कारण एकादशी श्राद्ध भी कहलाती है. इस वर्ष यह एकादशी 17 सितंबर को होगी. इस अवसर पर भक्तगण अपने पूर्वजों को याद कर सकेंगे और उनके मोक्ष के लिए प्रार्थना कर सकेंगे.
Authored By: स्मिता
Last Updated On: Tuesday, September 2, 2025
हिंदू धर्म में एकादशी सबसे महत्वपूर्ण दिनों में से एक है (Indira Ekadashi 2025), क्योंकि इस दिन भक्तगण स्वर्ग प्राप्ति और पापों से मुक्ति की कामना के लिए भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा और व्रत रखते हैं. वर्ष भर में शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष में कुल 24 एकादशी पड़ती है. यह एकादशी महीने में दो बार पड़ती है. इस वर्ष सितंबर में पार्श्व एकादशी और इंदिरा एकादशी (Indira Ekadashi) मनाई जाएगी.
इंदिरा एकादशी 2025 तिथि और समय (Indira Ekadashi 2025 Date & Time)
| विवरण | जानकारी |
| सितंबर 2025 में एकादशी | इस वर्ष सितंबर में पार्श्व एकादशी और इंदिरा एकादशी क्रमशः 3 सितंबर और 17 सितंबर को मनाई जाएगी. |
| इंदिरा एकादशी | आश्विन मास के कृष्ण पक्ष में मनाई जाती है. |
| तिथि | बुधवार, 17 सितंबर 2025 |
| एकादशी का समय | 17 सितंबर को रात्रि 12:21 बजे से शुरू होकर 18 सितंबर की सुबह तक |
| पारण का समय | 18 सितंबर को सुबह 6:07 बजे से 10:12 बजे तक |
इंदिरा एकादशी का आध्यात्मिक महत्व (Indira Ekadashi Spiritual Significance)
- इंदिरा एकादशी का आध्यात्मिक महत्व बहुत अधिक है. यह मुख्य रूप से भगवान विष्णु को प्रसन्न करने और दिवंगत पूर्वजों के मोक्ष के लिए प्रार्थना करने के लिए समर्पित है.
- इंदिरा एकादशी पर पितरों को मुक्ति प्रदान करने और पवित्र व्रत रखा जाता है. भगवान विष्णु की पूजा करके अपने पापों का शमन करने की भी इस दिन प्रार्थना की जाती है.
- पितृ पक्ष के दौरान मनाया जाने वाला यह दिन भक्तों को अपने पूर्वजों से जुड़ने, उनका आशीर्वाद प्राप्त करने और अंततः आध्यात्मिक विकास प्राप्त करने का अवसर प्रदान करता है. इस व्रत का फल महत्वपूर्ण यज्ञों के समान माना जाता है. माना जाता है कि इससे भगवान विष्णु के स्वर्गलोक वैकुंठ में प्रवेश मिलता है.
क्या है इंदिरा एकादशी की व्रत कथा (Indira Ekadashi Vrat Katha 2025)
सत्य युग (स्वर्ण युग) के दौरान भगवान विष्णु के भक्त, धर्मात्मा राजा इंद्रसेन, महिष्मती नगरी पर शासन करते थे. एक दिन बुद्धिमान ऋषि नारद मुनि ब्रह्मलोक से राजा के दरबार में अवतरित हुए. नारद मुनि ने बताया कि वे भगवान यम के लोक गए थे. वहां राजा के पिता को एकादशी व्रत के असमय भंग होने के कारण हुए पाप के कारण कष्ट भोगते हुए देखा था. राजा के पिता ने नारद मुनि के माध्यम से एक संदेश भेजा था. इसमें राजा इंद्रसेन से इंदिरा एकादशी का व्रत रखने और उनकी आत्मा को स्वर्ग प्राप्ति में सहायता के लिए दान-पुण्य करने का अनुरोध किया गया था. राजा इंद्रसेन ने नारद मुनि के निर्देशों का पालन किया. भक्ति के साथ व्रत और अनुष्ठान किया. यहां तक कि अपने पिता के लिए व्रत के आवश्यक नियमों का भी पालन किया. जैसे ही राजा ने अगले दिन द्वादशी को व्रत पूरा किया, आकाश से फूलों की वर्षा हुई. राजा इंद्रसेन के पिता जिनकी आत्मा अब एक आध्यात्मिक शरीर धारण कर चुकी थी, गरुड़ (भगवान विष्णु के दिव्य वाहन) की पीठ पर सवार होकर भगवान विष्णु के धाम वैकुंठ जाते हुए दिखाई दिए. मान्यता है कि जो कोई भी इस आख्यान को सुनता या पढ़ता है, उसे इंदिरा एकादशी व्रत का महान पुण्य प्राप्त होता है. वह पिछले पापों के प्रभावों से मुक्त हो जाता है. वह भगवान विष्णु के धाम वैकुंठ का वासी हो जाता है.
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