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मूर्ति पूजा की महत्ता
Authored By: स्मिता
Published On: Tuesday, July 15, 2025
Last Updated On: Tuesday, July 15, 2025
हिंदू धर्म में मूर्ति पूजन के विशिष्ट अर्थ हैं. मूर्ति ईश्वर से जुड़ने का माध्यम बनती है. यह हर प्रकार के तनाव को दूर कर मन को शांत करती है. प्रेमानंद महाराज के अनुसार, घर में उतनी ही मूर्ति रखें, जितनी की सेवा कर सकें.
Authored By: स्मिता
Last Updated On: Tuesday, July 15, 2025
Murti Puja: भारत में वर्ष भर कोई न कोई पर्व त्योहार मनाया जाता रहता है. इन पर्व-त्योहारों में हम अलग-अलग देवता की पूजा करते हैं. एकादशी के अवसर पर भगवान विष्णु की, तो गणेश चतुर्थी के अवसर पर प्रथम पूज्य देव गणेश की और जन्माष्टमी के अवसर पर श्रीकृष्ण की पूजा हम करते हैं. हम पूजा स्थल पर इनके प्रतीक स्वरुप मूर्ति या विग्रह की स्थापना करते हैं और उनकी विधि-विधान से उनकी पूजा करते हैं. हिंदू धर्म में भगवान की मूर्ति की पूजा का विशेष महत्व है.
मन को शांत करती है मूर्ति
हम मानते हैं कि ईश्वर ब्रह्मांड के कण-कण में विराजमान हैं, लेकिन मूर्ति पूजा सदियों से हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग रही है. अगर किसी कारणवश हमारा मन अशांत होता है या तनाव से भरा होता है, तो मूर्ति या प्रतिमा हमारे मन को शांत करता है. हमारा ध्यान ईश्वर के रूप पर केंद्रित हो पाता है. हम ईश्वर भक्ति में लीन हो पाते हैं. ईश्वर की प्रतिमा या मूर्ति पूजने से यह भाव गहरा होता है कि सर्वशक्तिमान ईश्वर सभी जगह उपस्थित हैं और हमारी रक्षा कर रहे हैं.
ईश्वर के प्रति अनुराग है अंतिम लक्ष्य
स्वामी विवेकानंद ईश्वर पूजा को सर्वोपरि मानते थे. वे मूर्ति पूजा को आध्यात्मिक विकास में मददगार मानते थे. उनका मानना था कि जो लोग निराकार, सर्वव्यापी ईश्वर की अमूर्त अवधारणा को नहीं समझ पाते हैं, उन्हें ईश्वर को समझने में मूर्ति की पूजा सहायक हो सकती है. विवेकानंद मानते थे कि जहां अंतिम लक्ष्य अपने भीतर के दिव्य तत्व को समझना है, वहां ईश्वर की मूर्ति और विग्रह की पूजा-अनुष्ठान सीढ़ी के रूप में काम कर सकते हैं. इससे चित्त को एकाग्र करने में सहायता मिलती है. इससे ईश्वर के प्रति दिव्य अनुराग विकसित करने में मदद मिलती है.
अनंत तक पहुंचने का साधन है मूर्ति
व्यक्ति रूप और आकार के प्रति जल्दी आकर्षित होता है. जब ईश्वर की छवि हमारे सामने होती है, तो उनके बारे में सोचना और उनसे प्रेम करना आसान हो जाता है. यही कारण है कि मूर्ति पूजा पूरे विश्व में प्रचलित है. जो हमें ईश्वर से जोड़ता है वह मूर्ति नहीं, बल्कि वह भावना है जो हम अपने मन में रखते हैं. मूर्ति इंद्रियों के माध्यम से अनंत तक पहुंचने का एक साधन है. मनु स्मृति के अनुसार, ईश्वर न तो पत्थर में रहता है और न ही मिट्टी में, बल्कि प्रेम भरे हृदय में रहता है. इसलिए मूर्ति की पूजा गहरे भाव से करनी चाहिए.
नहीं करें उपहारस्वरूप मूर्ति का लेन देन
प्रेमानंद महाराज कहते हैं कि घर में उतनी ही ईश्वर की मूर्ति रखनी चाहिए, जितनी की सेवा हो सके. उनकी रोज पूजा की जा सके. कई बार हम उपहार स्वरुप किसी को भगवान की मूर्ति दे देते हैं या हमें किसी और से मिल जाती है. हमें ऐसा नहीं करना चाहिए. हमें मूर्तियों का लेन-देन नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे ईश्वर का अनादर होता है. यदि मूर्ति खराब हो गई है, तो उसे किसी पेड़ के नीचे छोड़ने या रखने की बजाय जल में प्रवाहित कर देना चाहिए. यदि जल में प्रवाहित करना संभव नहीं है, तो उसे गड्ढा खोदकर उन मूर्तियों को गड्ढे में डाल देना चाहिए. उन्हें फूल-पान अर्पित कर आरती दिखा देना चाहिए.

















