ईरान में सड़कों पर उबलता असंतोष: जानें खामेनेई का शासन कैसे पहुंचा सबसे खतरनाक दौर में

Authored By: गुंजन शांडिल्य

Published On: Friday, January 9, 2026

Last Updated On: Friday, January 9, 2026

Iran Protest Crisis के चलते ईरान में हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं, जानें कैसे जनता के विरोध और राजनीतिक दबाव ने खामेनेई के शासन को उसके सबसे चुनौतीपूर्ण दौर में ला खड़ा किया है.
Iran Protest Crisis के चलते ईरान में हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं, जानें कैसे जनता के विरोध और राजनीतिक दबाव ने खामेनेई के शासन को उसके सबसे चुनौतीपूर्ण दौर में ला खड़ा किया है.

ईरान आज द्वंद के चौराहे पर खड़ा है. जहां सवाल यह नहीं कि स्थानीय लोगों में असंतोष है या नहीं. सवाल यह है कि क्या यह असंतोष किसी संगठित बदलाव में बदल पाएगा, या सत्ता एक बार फिर नई कहानी गढ़ेगी. इतना तय जरूर है कि इस्लामिक गणराज्य के लिए पुरानी कहानी दोहराना, अब पहले जितना आसान नहीं रहा.

Authored By: गुंजन शांडिल्य

Last Updated On: Friday, January 9, 2026

Iran Protest Crisis: ईरान आज एक ऐसे दौर से गुजर रहा है, जहां सत्ता, धार्मिक प्रतिष्ठान, सुरक्षा तंत्र और क्रांतिकारी विचारधारा, सभी एक साथ दबाव में हैं. बीते महीने तेहरान से शुरू हुए सरकार-विरोधी प्रदर्शन अब देश के सभी 31 प्रांतों में फैल चुके हैं. भले ही यह उभार 2022–23 के महसा अमिनी आंदोलन जितना व्यापक न हो, लेकिन इसकी प्रकृति और संकेत कहीं अधिक गहरे संकट की ओर इशारा करते हैं.

यह असंतोष किसी एक घटना से उत्पन्न नहीं हुई है. वर्षों से चली आ रही आर्थिक बदहाली, राजनीतिक बंदिशों और सामाजिक घुटन से पैदा हुआ है. इस बार विरोध की चिंगारी तेहरान के ग्रैंड बाज़ार से उठी. यहां के व्यापारी रियाल (ईरानी मुद्रा) की ऐतिहासिक गिरावट से नाराज़ थे. देखते ही देखते यह गुस्सा सड़कों पर फैल गया. उसमें वे युवा भी शामिल हो गए, जो अब क्रांतिकारी नारों से ज़्यादा अपनी रोज़मर्रा की आज़ादी और सम्मान की बात कर रहे हैं.

रियाल का पतन

ईरान की अर्थव्यवस्था पहले ही प्रतिबंधों, भ्रष्टाचार और कुप्रबंधन से जूझ रही थी. रियाल की गिरती कीमत ने आम लोगों की कमर और तोड़ दी है. महंगाई, बेरोज़गारी और भविष्य की अनिश्चितता ने एक पूरी पीढ़ी को व्यवस्था से विमुख कर दिया है.

मानवाधिकार कार्यकर्ता समाचार एजेंसी (HRANA) के अनुसार इन प्रदर्शनों में अब तक कम से कम 34 प्रदर्शनकारी और चार सुरक्षाकर्मी मारे जा चुके हैं. वहीं 2,200 से अधिक लोगों की गिरफ्तारी हुई है. ये आंकड़े केवल हिंसा का नहीं, बल्कि समाज में गहराते अविश्वास का भी पैमाना हैं. विश्लेषकों का मानना है कि यह संकट केवल आर्थिक नहीं, बल्कि शिया धार्मिक यथास्थिति के प्रति टूटते भरोसे का संकेत है.

मिडिल ईस्ट इंस्टीट्यूट में ईरान कार्यक्रम के निदेशक एलेक्स वटांका के शब्दों में, ‘यह सिर्फ रियाल का पतन नहीं है. यह विश्वास का भी पतन है.’

महसा अमिनी के बाद का ईरान

2022–23 में महसा अमिनी की मौत के बाद भड़के आंदोलन में महिलाएं और युवतियां केंद्र में थीं. हिजाब उस संघर्ष का प्रतीक बन गया था. आज हालात बदले हैं. हिजाब अब भी मुद्दा है, लेकिन उसका क्रियान्वयन ढीला पड़ चुका है. कई शहरों में महिलाएं सार्वजनिक रूप से इसे पहनने से इनकार कर रही हैं. आज ईरानी शासन पहले की तरह कठोर प्रतिक्रिया देने की स्थिति में नहीं दिखता.

यह बदलाव सत्ता की उस नैतिक पकड़ के कमजोर होने का संकेत है, जिसने दशकों तक इस्लामिक रिपब्लिक को परिभाषित किया. ईरान में धार्मिक नियम अब डर के बजाय उपेक्षा का शिकार हो रहे हैं. यही किसी भी वैचारिक या धार्मिक शासन के लिए सबसे खतरनाक स्थिति होती है.

  • अशांति युवा आबादी और शासकों के बीच बढ़ती खाई को दर्शाती है.
  • प्रदर्शनकारियों का कहना है कि आक्रामक विदेश नीति से उन्हें कोई फायदा नहीं होता.
  • विश्लेषकों का कहना है कि अब दमन और रियायतें काम नहीं कर सकतीं.
  • ईरान का धार्मिक शासक अमेरिका, इज़राइल के सैन्य हस्तक्षेप से सावधान हैं.

न गाज़ा, न लेबनान

इस बार के प्रदर्शनों में एक और नया स्वर उभरा है. ईरान की क्षेत्रीय नीतियों के खिलाफ लोगों में खुला गुस्सा है. गुस्साए लोग नारा लगा रहे हैं, ‘न गाज़ा, न लेबनान, मेरी जान ईरान के लिए.’ जनता अब अपने संसाधनों को विदेशी प्रॉक्सी युद्धों में झोंकने से थक चुकी है.

इज़राइल द्वारा हमास, हिज़बुल्लाह, हौथी और इराकी मिलिशिया पर किए गए हमलों से ईरान का क्षेत्रीय प्रभाव कमजोर पड़ा है. सीरिया में बशर अल-असद की सत्ता से विदाई ने भी तेहरान की रणनीतिक गहराई को झटका दिया है. इन घटनाओं ने आम ईरानी के मन में यह सवाल और तेज़ कर दिया है कि क्या सत्ता की प्राथमिकताएं जनता से कट चुकी हैं?

सड़कों से मदरसों तक विद्रोह

सोशल मीडिया पर कैसे ऐसे वीडियो सामने आ रहे हैं, जिनमें मशहद में ईरानी झंडा उतारकर फाड़ा जा रहा है. तेहरान के ग्रैंड बाज़ार में सुरक्षा बलों से झड़प और इलम प्रांत में जश्न मनाते प्रदर्शनकारी, ये सभी इस बात के संकेत हैं कि विरोध केवल आर्थिक नहीं, बल्कि प्रतीकात्मक भी हो चुका है.

खामेनेई के सामने कठिन विकल्प

86 वर्षीय सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई अपने शासन के सबसे चुनौतीपूर्ण दौर में हैं. दशकों तक दमन और सीमित रियायतों से संकट टालने की नीति अब अपनी सीमा पर पहुंचती दिख रही है. वटांका के मुताबिक, ‘बदलाव अब अपरिहार्य लग रहा है. शासन का पतन संभव है, लेकिन तय नहीं.’

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयानों और इज़राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की खुली तारीफ ने विदेशी हस्तक्षेप की आशंकाओं को हवा दी है. लेकिन ईरान में कट्टर आलोचकों के बीच इस पर गहरी दुविधा है.

तेहरान के एक 31 वर्षीय स्थानीय युवा इस्फ़हान के शब्दों में, ‘हम इस सरकार से थक चुके हैं, लेकिन हम विदेशी बम नहीं चाहते. हम शांति चाहते हैं. वह इस्लामिक रिपब्लिक के बिना.’

आगे का रास्ता: बदलाव या ठहराव

निर्वासन में बैठे ईरानी विपक्षी समूह इस मौके को निर्णायक मान रहे हैं. विपसखी समूह का ईरान के भीतर जनाधार कितना मजबूत है, यह अब भी स्पष्ट नहीं. इतिहास बताता है कि सीरिया, लीबिया और इराक में सत्ता परिवर्तन केवल प्रदर्शनों से नहीं, बल्कि बाहरी हस्तक्षेप के साथ हुआ. उसकी कीमत वहां के स्थानीय लोगों को भारी चुकानी पड़ी थी.

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गुंजन शांडिल्य समसामयिक मुद्दों पर गहरी समझ और पटकथा लेखन में दक्षता के साथ 10 वर्षों से अधिक का अनुभव रखते हैं। पत्रकारिता की पारंपरिक और आधुनिक शैलियों के साथ कदम मिलाकर चलने में निपुण, गुंजन ने पाठकों और दर्शकों को जोड़ने और विषयों को सहजता से समझाने में उत्कृष्टता हासिल की है। वह समसामयिक मुद्दों पर न केवल स्पष्ट और गहराई से लिखते हैं, बल्कि पटकथा लेखन में भी उनकी दक्षता ने उन्हें एक अलग पहचान दी है। उनकी लेखनी में विषय की गंभीरता और प्रस्तुति की रोचकता का अनूठा संगम दिखाई देता है।
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