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ईरान तनाव गहराया, भारत का ऑयल कंटीजेंसी प्लान तैयार, रूस से कच्चा तेल आयात बढ़ाने की रणनीति तैयार
Authored By: Nishant Singh
Published On: Tuesday, March 3, 2026
Last Updated On: Tuesday, March 3, 2026
मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और होर्मुज स्ट्रेट में रुकावट की आशंका के बीच भारत ने ऑयल कंटीजेंसी प्लान तैयार किया है. सरकार पेट्रोल-डीजल एक्सपोर्ट सीमित करने, रूस से कच्चा तेल बढ़ाने और डिमांड मैनेजमेंट जैसे विकल्पों पर विचार कर रही है, ताकि संभावित फ्यूल संकट से निपटा जा सके.
Authored By: Nishant Singh
Last Updated On: Tuesday, March 3, 2026
Iran India Oil Strategy: इजराइल, अमेरिका और ईरान के बीच जारी टकराव अब सीमाओं से बाहर निकलकर पूरे मिडिल ईस्ट को अपनी चपेट में ले चुका है. यूरोप से लेकर एशिया तक इसकी गूंज सुनाई दे रही है. रूस और चीन भी बयानबाज़ी में शामिल हो चुके हैं. ऐसे में साफ है कि यह संकट जल्दी थमता नजर नहीं आ रहा. इस भू-राजनीतिक तनाव का सबसे बड़ा असर कच्चे तेल और गैस की सप्लाई पर पड़ रहा है. भारत, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात से पूरा करता है, अब संभावित फ्यूल संकट को लेकर अलर्ट मोड में है. सरकार और तेल कंपनियां आने वाले हफ्तों के लिए बैकअप प्लान तैयार कर रही हैं, ताकि देश में पेट्रोल, डीजल और गैस की उपलब्धता प्रभावित न हो.
होर्मुज स्ट्रेट बना चिंता का केंद्र
पूरे संकट की धुरी होर्मुज स्ट्रेट बन गया है, जहां से दुनिया के बड़े हिस्से का तेल गुजरता है. यहां टैंकरों की आवाजाही में आई कमी ने सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ा दी है. अगर यह रुकावट लंबी चली, तो भारत जैसे आयात-निर्भर देशों पर दबाव बढ़ सकता है. इसी आशंका को देखते हुए सरकार पेट्रोल और डीजल के एक्सपोर्ट पर अस्थायी रोक लगाने जैसे विकल्पों पर विचार कर रही है. साथ ही डिमांड मैनेजमेंट यानी जरूरत के हिसाब से खपत को नियंत्रित करने की रणनीति भी बनाई जा रही है. लक्ष्य साफ है: घरेलू बाजार में किसी भी हाल में कमी न होने देना.
तेल-गैस की कीमतों में उछाल
तनाव बढ़ते ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में हलचल तेज हो गई. ब्रेंट क्रूड की कीमतों में करीब 10 फीसदी तक उछाल देखा गया और यह 80 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गया. यूरोप में गैस की कीमतें 40 फीसदी से ज्यादा बढ़ गईं. सऊदी अरब की रास तनुरा रिफाइनरी और कतर के एलएनजी प्लांट पर हमलों की खबरों ने बाजार को और अस्थिर कर दिया. अगर हालात चार हफ्ते तक भी बिगड़े रहते हैं, जैसा कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संकेत दिया है, तो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर गंभीर असर पड़ सकता है. भारत इसी संभावित स्थिति के लिए पहले से तैयारी में जुटा है.
सबसे ज्यादा दबाव LPG पर
भारत पेट्रोल का लगभग एक-तिहाई, डीजल का एक-चौथाई और एविएशन टर्बाइन फ्यूल का लगभग आधा हिस्सा निर्यात करता है. जरूरत पड़ने पर इन निर्यातों को सीमित कर घरेलू सप्लाई बढ़ाई जा सकती है. रिफाइनर अतिरिक्त एटीएफ को अन्य उत्पादों में भी बदल सकते हैं. लेकिन सबसे ज्यादा चिंता एलपीजी को लेकर है. देश अपनी जरूरत का लगभग दो-तिहाई एलपीजी आयात करता है, और उसमें भी 85-90 फीसदी हिस्सा खाड़ी देशों से आता है. अगर सप्लाई बाधित होती है, तो स्टॉक दो हफ्ते से कम समय तक ही चल पाएगा. यही वजह है कि इंडियन ऑयल, एचपीसीएल और बीपीसीएल जैसी सरकारी रिफाइनरियों ने कुछ प्लांट्स में एलपीजी उत्पादन बढ़ाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है.
रूस से बढ़ेगा तेल आयात?
भारत के पास फिलहाल 17-18 दिनों का कच्चे तेल का रिजर्व, 20-21 दिनों का पेट्रोल-डीजल स्टॉक और 10-12 दिनों की एलएनजी उपलब्धता है. लेकिन अगर होर्मुज के रास्ते नई सप्लाई नहीं आई, तो ये बफर धीरे-धीरे कम होंगे. ऐसे में खाड़ी देशों पर निर्भरता घटाने के लिए रूस से कच्चे तेल के आयात को बढ़ाने पर गंभीर विचार हो रहा है. रूसी तेल पहले भी भारत के लिए किफायती विकल्प साबित हुआ है. जानकार मानते हैं कि अगर वैश्विक सप्लाई घटती है और कीमतें तेज होती हैं, तो अंतरराष्ट्रीय दबाव भी कुछ नरम पड़ सकता है, जिससे भारतीय रिफाइनर ज्यादा रूसी तेल खरीद सकेंगे.
सरकार की रणनीति: उपलब्धता और किफायत दोनों
तेल मंत्रालय ने साफ किया है कि हालात पर लगातार नजर रखी जा रही है और देश में पेट्रोलियम उत्पादों की उपलब्धता व किफायत सुनिश्चित करने के लिए हर जरूरी कदम उठाया जाएगा. रणनीति दो हिस्सों में बंटी है पहला, सप्लाई बढ़ाना या वैकल्पिक स्रोत खोजना; दूसरा, जरूरत पड़ने पर मांग को संतुलित करना. भारत की कोशिश है कि वैश्विक संकट का असर आम आदमी की जेब तक कम से कम पहुंचे.
ईरान संकट ने दुनिया को फिर याद दिलाया है कि ऊर्जा सुरक्षा सिर्फ आर्थिक मुद्दा नहीं, बल्कि रणनीतिक चुनौती भी है. भारत का ‘ऑयल कंटीजेंसी प्लान’ इसी चुनौती से निपटने की तैयारी है ताकि अगर हालात बिगड़ें भी, तो देश की रफ्तार थमे नहीं.
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