क्या प्रधानमंत्री और गृहमंत्री पर भी हो सकता है मुकदमा? जानिए संविधान और कानून क्या कहता है

Authored By: Mazhar Pathan

Published On: Monday, October 5, 2026

Last Updated On: Sunday, November 1, 2026

PM Legal Immunity: प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के खिलाफ केस और FIR का कानून
PM Legal Immunity: प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के खिलाफ केस और FIR का कानून

PM Legal Immunity: भारत में आम लोगों के मन में अक्सर यह सवाल उठता है कि क्या प्रधानमंत्री या गृहमंत्री जैसे बड़े पदों पर बैठे लोग कानून से ऊपर हैं, या उनके खिलाफ भी आम नागरिक की तरह शिकायत दर्ज कराई जा सकती है. हाल ही में एक वकील ने कुछ बड़े नेताओं के खिलाफ [...]

Authored By: Mazhar Pathan

Last Updated On: Sunday, November 1, 2026

PM Legal Immunity: भारत में आम लोगों के मन में अक्सर यह सवाल उठता है कि क्या प्रधानमंत्री या गृहमंत्री जैसे बड़े पदों पर बैठे लोग कानून से ऊपर हैं, या उनके खिलाफ भी आम नागरिक की तरह शिकायत दर्ज कराई जा सकती है. हाल ही में एक वकील ने कुछ बड़े नेताओं के खिलाफ अदालत में शिकायत दी, जिसके बाद यह सवाल एक बार फिर लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गया है. (Can FIR be filed against PM) आइए सीधी और आसान भाषा में समझते हैं कि इस बारे में संविधान और कानून क्या कहता है.

क्या है पूरा मामला

हाल ही में एक वकील ने अदालत में एक याचिका दाखिल करके प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, उपराष्ट्रपति और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री समेत कुछ और बड़े नेताओं के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने की मांग की है. याचिका में कहा गया है कि ये सभी लोग संवैधानिक पदों पर होने के बावजूद अपने पद का गलत इस्तेमाल कर रहे हैं. इसी घटना के बाद यह सवाल फिर उठ खड़ा हुआ है कि क्या सच में प्रधानमंत्री या गृहमंत्री जैसे बड़े ओहदों पर बैठे लोगों पर भी कोई मुकदमा चल सकता है.

क्या बड़े नेताओं को मिलती है कोई खास छूट

सीधा जवाब है- नहीं. भारत के संविधान में प्रधानमंत्री या किसी भी केंद्रीय मंत्री(Can a case be filed against Prime Minister) को आपराधिक मामलों से पूरी तरह बचाने वाला कोई नियम नहीं है. संविधान का अनुच्छेद 14 कहता है कि कानून की नजर में हर व्यक्ति बराबर है. यानी कोई भी व्यक्ति सिर्फ इसलिए कानून के दायरे से बाहर नहीं हो जाता कि वह प्रधानमंत्री या गृहमंत्री बन गया है.

हां, संविधान में एक खास छूट जरूर है, लेकिन वह सिर्फ दो पदों के लिए है- देश के राष्ट्रपति और राज्यों के राज्यपाल. अनुच्छेद 361(Article 361 के तहत इन दोनों को अपने पद पर रहते हुए कुछ खास सुरक्षा मिलती है. लेकिन यह सुरक्षा प्रधानमंत्री, गृहमंत्री या किसी भी दूसरे मंत्री पर लागू नहीं होती.

कैसे दर्ज होता है केस

अगर किसी आम आदमी को लगता है कि कोई ऐसा अपराध हुआ है जिसमें पुलिस खुद कार्रवाई कर सकती है, तो वह सीधे नजदीकी थाने जाकर लिखित शिकायत दे सकता है. अगर पुलिस उस शिकायत पर FIR दर्ज नहीं करती, तो शिकायत करने वाला व्यक्ति कानून में दी गई प्रक्रिया के तहत मजिस्ट्रेट के पास भी जा सकता है(PM immunity in India) . मजिस्ट्रेट को यह अधिकार है कि वह पूरे मामले की जांच करे और अगर उसे सही लगे तो पुलिस को जांच करने और केस दर्ज करने का आदेश भी दे सकता है. यानी चाहे व्यक्ति प्रधानमंत्री हो या गृहमंत्री, सिर्फ उनका पद इस पूरी प्रक्रिया को रोकने के लिए काफी नहीं है.

हर शिकायत पर FIR दर्ज नहीं होती

यहां एक बात समझनी जरूरी है कि शिकायत देने का मतलब यह बिल्कुल नहीं होता कि उस पर अपने आप FIR दर्ज हो जाएगी. केस आगे बढ़ाने के लिए शिकायत में कानून के तहत पहचाने गए किसी अपराध का साफ-साफ जिक्र होना जरूरी है, साथ ही उसके पीछे ठोस तथ्य भी होने चाहिए. किसी नेता पर सिर्फ यह कहना कि उसने गलत काम किया, काफी नहीं होता.

अदालतें ऐसे मामलों में क्यों बरतती हैं सावधानी

जब किसी बड़े पद पर बैठे व्यक्ति के खिलाफ शिकायत(Criminal case against Prime Minister) आती है, तो अदालतें काफी सतर्क रहती हैं. इसकी वजह यह है कि कानूनी व्यवस्था को यह पक्का करना होता है कि कोई भी व्यक्ति सिर्फ राजनीतिक रंजिश, किसी को परेशान करने या उसकी छवि खराब करने के मकसद से आपराधिक मामला दर्ज न करा दे. इसी वजह से किसी भी आरोप का ठोस सबूतों और कानूनी आधार पर टिका होना जरूरी माना जाता है. अगर अदालत को लगे कि शिकायत में किसी अपराध का कोई संकेत ही नहीं है, या वह बिना किसी वास्तविक वजह के दायर की गई है, तो वह उसे खारिज भी कर सकती है.

राजनीतिक आलोचना और अपराध में फर्क

यह समझना भी जरूरी है कि किसी नेता की नीति, फैसले या बयान से असहमत होना और उस पर आपराधिक मामला बनता है, इन दोनों में बड़ा फर्क है. कोई भी नागरिक प्रधानमंत्री या गृहमंत्री के किसी फैसले की आलोचना कर सकता है, और सिर्फ इस असहमति के आधार पर उसके खिलाफ या उसकी ओर से कोई केस नहीं बन सकता. मामला आगे तभी बढ़ता है जब आरोप किसी कानून के तहत तय किए गए अपराध से मेल खाते हों.

अगर याचिका बेबुनियाद निकले तो क्या होता है

अगर अदालत को यह लगे कि कोई याचिका सिर्फ परेशान करने के इरादे से या कानूनी प्रक्रिया का गलत फायदा उठाने के लिए दाखिल की गई है, तो वह न सिर्फ उस याचिका को खारिज कर सकती है, बल्कि याचिका लगाने वाले व्यक्ति पर जुर्माना भी लगा सकती है.

कुल मिलाकर, भारत में कानून की नजर में कोई भी पद किसी व्यक्ति को पूरी तरह सुरक्षा कवच नहीं देता. प्रधानमंत्री और गृहमंत्री जैसे बड़े पदों पर बैठे लोगों के खिलाफ भी शिकायत दी जा सकती है और कानूनी प्रक्रिया शुरू हो सकती है, बशर्ते आरोप ठोस तथ्यों और सही कानूनी आधार पर टिके हों.

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About the Author: Mazhar Pathan
मैं पिछले 6 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हूं। इस दौरान न्यूज़ रूम से लेकर ज़मीनी स्तर तक पत्रकारिता के विभिन्न आयामों में काम करने का अनुभव हासिल किया है। ऑफिस में वीडियो एंकरिंग से लेकर फील्ड में ग्राउंड रिपोर्टिंग तक, मैंने अलग-अलग विषयों और मुद्दों पर काम किया है। सामाजिक, राजनीतिक, समसामयिक और जनहित से जुड़े विषयों पर रिपोर्टिंग, लेखन और वीडियो कंटेंट तैयार करना मेरी कार्यशैली का हिस्सा रहा है।
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