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अमेरिकी मिडटर्म चुनाव में ट्रंप को बड़ा झटका, रिपब्लिकन की हार पर पार्टी में उठे सवाल, ओबामा ने डेमोक्रेट्स को दी बधाई
Authored By: Mazhar Pathan
Published On: Wednesday, November 4, 2026
Last Updated On: Wednesday, November 4, 2026
अमेरिका के मिडटर्म चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी ने सीनेट और प्रतिनिधि सभा में बढ़त हासिल कर रिपब्लिकन पार्टी को बड़ा झटका दिया है. चुनावी नतीजों के बाद पार्टी के भीतर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों, महंगाई, ईरान युद्ध और उम्मीदवारों के चयन को लेकर सवाल उठने लगे हैं. वहीं पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने डेमोक्रेटिक जीत पर प्रतिक्रिया देते हुए इसे अमेरिकी जनता का स्पष्ट संदेश बताया.
Authored By: Mazhar Pathan
Last Updated On: Wednesday, November 4, 2026
अमेरिका के 2026 मिडटर्म चुनाव के नतीजों ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनकी रिपब्लिकन पार्टी के सामने नई राजनीतिक चुनौती खड़ी कर दी है. चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी ने उन राज्यों में भी बड़ी कामयाबी हासिल की है, जिन्हें लंबे समय से रिपब्लिकन का मजबूत गढ़ माना जाता रहा है. सीनेट में डेमोक्रेट्स ने बहुमत हासिल कर लिया है, जबकि प्रतिनिधि सभा में भी पार्टी ने नियंत्रण अपने हाथ में लेने की स्थिति बना ली है. इस चुनावी नतीजे के बाद रिपब्लिकन पार्टी के भीतर हार की वजहों को लेकर चर्चा तेज हो गई है. कई रिपब्लिकन नेताओं और रणनीतिकारों ने राष्ट्रपति ट्रंप की कम लोकप्रियता, महंगाई, टैरिफ नीति और ईरान के साथ लंबे समय से जारी युद्ध को पार्टी के खराब प्रदर्शन की वजह बताया है. दूसरी तरफ ट्रंप ने उम्मीदवारों की भूमिका पर सवाल उठाए हैं, हालांकि उन्होंने ईरान युद्ध को भी चुनावी नुकसान का एक कारण माना है. पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भी डेमोक्रेटिक पार्टी की सफलता पर प्रतिक्रिया दी है.
मिडटर्म चुनाव में डेमोक्रेट्स का बड़ा उलटफेर
अमेरिका में 3 नवंबर 2026 को हुए मिडटर्म चुनाव का मुख्य मुकाबला कांग्रेस के दोनों सदनों पर नियंत्रण को लेकर था. अमेरिकी कांग्रेस के दो सदन हैं- सीनेट और हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स. इस चुनाव में प्रतिनिधि सभा की सभी 435 सीटों और सीनेट की 100 में से 35 सीटों पर मतदान हुआ. इसके अलावा 36 राज्यों में गवर्नर पद के चुनाव भी हुए.
चुनाव से पहले रिपब्लिकन पार्टी के पास दोनों सदनों में बहुमत था. लेकिन नतीजों ने राजनीतिक तस्वीर बदल दी. डेमोक्रेटिक पार्टी ने सीनेट में बहुमत हासिल करने के लिए जरूरी सीटें जीत लीं और प्रतिनिधि सभा में भी बहुमत की ओर बढ़ गई.
Reuters और Associated Press की रिपोर्ट के मुताबिक, डेमोक्रेट्स ने टेक्सास, साउथ कैरोलाइना, कंसास, नॉर्थ कैरोलाइना और ओहायो जैसे राज्यों में अहम जीत दर्ज की. इनमें कुछ ऐसे राज्य भी शामिल हैं.
टेक्सास से साउथ कैरोलाइना तक, रिपब्लिकन के गढ़ में सेंध
इस चुनाव की सबसे चर्चित बात यह रही कि डेमोक्रेटिक पार्टी ने उन राज्यों में भी रिपब्लिकन उम्मीदवारों को चुनौती दी, जहां लंबे समय से रिपब्लिकन का दबदबा रहा है. टेक्सास में डेमोक्रेटिक उम्मीदवार जेम्स तालारिको ने रिपब्लिकन उम्मीदवार केन पैक्सटन को हराकर सीनेट की सीट जीत ली. वहीं साउथ कैरोलाइना में डेमोक्रेटिक उम्मीदवार एनी एंड्रयूज ने रिपब्लिकन उम्मीदवार डार्लिन ग्राहम को शिकस्त दी. नॉर्थ कैरोलाइना में पूर्व गवर्नर रॉय कूपर ने रिपब्लिकन उम्मीदवार माइकल व्हाटली को हराया. ओहायो में पूर्व डेमोक्रेटिक सीनेटर शेरोड ब्राउन ने रिपब्लिकन उम्मीदवार जॉन हस्टेड को हराकर वापसी की. कंसास में भी डेमोक्रेटिक उम्मीदवार एडम हैमिल्टन की जीत ने राजनीतिक विश्लेषकों का ध्यान खींचा. इन नतीजों का महत्व इसलिए भी ज्यादा है क्योंकि 2024 के राष्ट्रपति चुनाव में इनमें से कई राज्यों में डोनाल्ड ट्रंप को मजबूत समर्थन मिला था. अब उन्हीं क्षेत्रों में डेमोक्रेटिक उम्मीदवारों की जीत ने रिपब्लिकन पार्टी की चुनावी रणनीति पर सवाल खड़े कर दिए हैं.
रिपब्लिकन नेताओं ने ट्रंप को क्यों ठहराया जिम्मेदार?
चुनावी नतीजों के बाद रिपब्लिकन पार्टी के भीतर हार की जिम्मेदारी तय करने को लेकर बहस शुरू हो गई है. कई नेताओं और चुनावी रणनीतिकारों का मानना है कि ट्रंप की लोकप्रियता में गिरावट का असर पार्टी के उम्मीदवारों पर भी पड़ा. BBC की ओर से दिए गए विवरण में टेक्सास के रिपब्लिकन लॉबिस्ट बिल मिलर का बयान शामिल है. उन्होंने हार के लिए सीधे ट्रंप को जिम्मेदार बताते हुए कहा कि यह राष्ट्रपति को पूरी तरह अस्वीकार करने का नतीजा है. वहीं मिनेसोटा के रिपब्लिकन रणनीतिकार ग्रेग पिपेन ने पार्टी की लगातार गलतियों और मतदाताओं के बीच ट्रंप की नीतियों को लेकर नाराजगी का जिक्र किया. Axios की रिपोर्ट भी बताती है कि चुनाव से पहले ही रिपब्लिकन खेमे में संभावित हार को लेकर चर्चा शुरू हो गई थी. पार्टी के कुछ रणनीतिकारों ने ट्रंप की ईरान नीति, बढ़ती ईंधन कीमतों, टैरिफ और कमजोर उम्मीदवारों के चयन को नुकसान की वजह माना था. हालांकि, पार्टी के सभी नेता सार्वजनिक रूप से ट्रंप को जिम्मेदार नहीं ठहरा रहे हैं. इसकी एक वजह यह भी है कि रिपब्लिकन पार्टी में ट्रंप का राजनीतिक प्रभाव अब भी काफी मजबूत है.
महंगाई और ईरान युद्ध ने कैसे बढ़ाई ट्रंप की मुश्किल?
इस चुनाव में अमेरिकी मतदाताओं के सामने सबसे बड़ा मुद्दा महंगाई और रोजमर्रा की चीजों की बढ़ती कीमतें रहीं. पेट्रोल, डीजल, किराना सामान और दूसरी जरूरी चीजों के महंगे होने से आम परिवारों का बजट प्रभावित हुआ.
Reuters की चुनावी समीक्षा के अनुसार, करीब 10 में से 9 मतदाताओं ने जीवनयापन की लागत को अपने वोट के लिए महत्वपूर्ण मुद्दा बताया. टैरिफ नीति और ईरान के साथ युद्ध के कारण बढ़ी ऊर्जा कीमतों ने भी मतदाताओं की नाराजगी को बढ़ाया.
ट्रंप प्रशासन की टैरिफ नीति का असर अमेरिकी कारोबार और कृषि क्षेत्र पर भी पड़ा. दूसरे देशों से आने वाले सामान पर शुल्क बढ़ने के कारण आयात की लागत बढ़ी और कई कारोबारियों को आर्थिक अनिश्चितता का सामना करना पड़ा.
इसके अलावा ईरान के साथ जारी युद्ध भी रिपब्लिकन पार्टी के लिए मुश्किल बना. युद्ध के कारण तेल और ईंधन की कीमतों पर दबाव बढ़ा. ट्रंप ने पहले विदेशों में सैन्य संघर्षों से दूरी बनाने की बात कही थी, लेकिन ईरान के साथ लंबे समय तक जारी टकराव ने उनकी नीतियों को लेकर सवाल खड़े किए. Associated Press की चुनावी रिपोर्ट और उसके सर्वेक्षण में भी बड़ी संख्या में अमेरिकी नागरिकों ने ट्रंप की आर्थिक नीतियों और महंगाई को लेकर असंतोष जताया था.
ट्रंप ने हार के लिए उम्मीदवारों को ठहराया जिम्मेदार
जहां रिपब्लिकन पार्टी के कुछ नेता चुनावी नुकसान के लिए ट्रंप की नीतियों पर सवाल उठा रहे हैं, वहीं राष्ट्रपति ने भी अपनी तरफ से हार की वजहों पर प्रतिक्रिया दी है. ट्रंप ने चुनाव प्रचार के दौरान कई बार कहा था कि मतदाता इन चुनावों को उनकी सरकार के कामकाज से जोड़कर देखें. लेकिन नतीजे सामने आने के बाद उन्होंने कुछ रिपब्लिकन उम्मीदवारों के प्रदर्शन पर सवाल उठाए और संकेत दिया कि कमजोर उम्मीदवारों की वजह से पार्टी को नुकसान हुआ.
Reuters की 4 नवंबर की रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप ने Fox News को दिए इंटरव्यू में माना कि ईरान युद्ध का रिपब्लिकन उम्मीदवारों पर असर पड़ा. हालांकि, उन्होंने अपने फैसले का बचाव भी किया और कहा कि मतदाता इस युद्ध के महत्व को समझते हैं. ट्रंप ने यह भी संकेत दिया कि अगर डेमोक्रेटिक पार्टी उनके सामने ऐसे विधेयक लाती है, जिन्हें वह अनुचित मानते हैं, तो वह राष्ट्रपति के तौर पर अपने वीटो अधिकार का इस्तेमाल करेंगे.
ओबामा ने डेमोक्रेटिक जीत को बताया जनता का स्पष्ट संदेश
अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भी चुनावी नतीजों पर प्रतिक्रिया दी. उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर डेमोक्रेटिक पार्टी की सफलता को अमेरिकी जनता का स्पष्ट संदेश बताया. ओबामा ने अपने संदेश में कहा कि अमेरिकी नागरिक ऐसी राजनीति चाहते हैं जो लोगों को बांटने के बजाय एकजुट करे. उन्होंने ऐसे नेताओं की जरूरत पर जोर दिया जो लोगों की समस्याओं का ठोस समाधान पेश कर सकें.
उन्होंने चुनाव में हिस्सा लेने वाले उम्मीदवारों, चुनाव अधिकारियों और स्वयंसेवकों की भी सराहना की. ओबामा के मुताबिक, अलग-अलग पृष्ठभूमि और राजनीतिक विचारों से आने वाले उम्मीदवारों ने साझा मूल्यों और जनसेवा के आधार पर लोगों के सामने अपनी बात रखी.
ओबामा ने यह भी कहा कि ट्रंप प्रशासन के पास अभी दो साल का समय बाकी है. ऐसे में डेमोक्रेटिक पार्टी को जहां भी अधिकार मिले हैं, वहां बदलाव के लिए काम करना चाहिए और भविष्य की मजबूत नींव तैयार करनी चाहिए. यह प्रतिक्रिया उनके उस राजनीतिक रुख के अनुरूप है, जिसमें उन्होंने चुनाव प्रचार के दौरान भी ट्रंप प्रशासन की आर्थिक और विदेश नीति की आलोचना की थी.
डेमोक्रेट्स के हाथ में कांग्रेस आने से ट्रंप की बढ़ेंगी मुश्किलें
अमेरिकी कांग्रेस के दोनों सदनों में डेमोक्रेटिक पार्टी का नियंत्रण होने से राष्ट्रपति ट्रंप के लिए आने वाले दो साल पहले के मुकाबले ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं. सीनेट और प्रतिनिधि सभा में बहुमत मिलने के बाद डेमोक्रेट्स को संसदीय समितियों पर नियंत्रण, सरकारी कामकाज की जांच और प्रशासन से जवाब मांगने के ज्यादा अधिकार मिलेंगे.
वे ट्रंप प्रशासन की नीतियों, सरकारी फैसलों और अधिकारियों के कामकाज की जांच के लिए सुनवाई कर सकते हैं. इसके अलावा राष्ट्रपति के कई विधायी प्रस्तावों को आगे बढ़ाना भी मुश्किल हो सकता है. हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि ट्रंप की राष्ट्रपति के रूप में शक्तियां खत्म हो जाएंगी. उनके पास राष्ट्रपति के संवैधानिक अधिकार, कार्यकारी आदेश जारी करने और कांग्रेस से पारित विधेयकों पर वीटो लगाने की शक्ति बनी रहेगी.
Al Jazeera और Reuters की रिपोर्ट के मुताबिक, डेमोक्रेटिक बहुमत से वॉशिंगटन में राजनीतिक टकराव बढ़ने और सरकार के कामकाज पर ज्यादा निगरानी की संभावना है.
भारत पर भी पड़ सकता है अमेरिकी चुनाव का असर
अमेरिका में सत्ता का संसदीय संतुलन बदलने का असर केवल वहां की घरेलू राजनीति तक सीमित नहीं रहेगा. भारत समेत कई देशों की नजर भी इन नतीजों पर रहेगी. भारत और अमेरिका के बीच व्यापार, टैरिफ, तकनीक, रक्षा सहयोग, ऊर्जा और वीजा जैसे कई महत्वपूर्ण मुद्दे जुड़े हुए हैं. ऐसे में अमेरिकी कांग्रेस में डेमोक्रेटिक पार्टी का बहुमत होने से इन विषयों पर राजनीतिक बहस का स्वरूप बदल सकता है.
खासतौर पर भारत पर लगाए जाने वाले अमेरिकी व्यापार शुल्क और H-1B वीजा जैसे मुद्दे भारतीय कारोबारियों, पेशेवरों और कंपनियों के लिए महत्वपूर्ण हैं.
हालांकि, यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि चुनावी नतीजों के बाद भारत-अमेरिका संबंधों में कोई बड़ा नीतिगत बदलाव जरूर होगा. अमेरिकी विदेश नीति और व्यापार से जुड़े कई फैसलों में राष्ट्रपति की भूमिका महत्वपूर्ण रहती है. इसके बावजूद कांग्रेस में डेमोक्रेटिक बहुमत ट्रंप प्रशासन के फैसलों पर चर्चा और निगरानी बढ़ा सकता है.
अब आगे क्या होगा?
2026 के मिडटर्म चुनाव ने अमेरिकी राजनीति में एक नया समीकरण तैयार कर दिया है. डेमोक्रेटिक पार्टी की जीत ने रिपब्लिकन पार्टी के भीतर नेतृत्व, चुनावी रणनीति और नीतियों को लेकर बहस तेज कर दी है.
एक तरफ ओबामा और डेमोक्रेटिक नेता इसे जनता के समर्थन के रूप में देख रहे हैं, तो दूसरी तरफ रिपब्लिकन खेमे में हार की जिम्मेदारी को लेकर सवाल उठ रहे हैं. ट्रंप ने भी ईरान युद्ध के चुनाव पर असर को स्वीकार किया है, लेकिन अपनी नीतियों का बचाव जारी रखा है.
आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि रिपब्लिकन पार्टी अपनी चुनावी हार से क्या सबक लेती है और डेमोक्रेटिक पार्टी कांग्रेस में मिले बहुमत का इस्तेमाल किस तरह करती है. फिलहाल इतना स्पष्ट है कि अमेरिकी मिडटर्म चुनाव ने ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के बाकी दो वर्षों की राजनीतिक परिस्थितियां बदल दी हैं.













