देश-दुनिया की पटाखा राजधानी बना तमिलनाडु का शिवकाशी, अब ग्लोबल मार्केट पर नजर

Authored By: Rajeev Mandal

Published On: Saturday, November 7, 2026

Updated On: Saturday, November 7, 2026

Sivakasi: भारत की पटाखा राजधानी, अब चीन को टक्कर देने की तैयारी

पटाखों की बात हो और शिवकाशी का जिक्र न हो, ऐसा नहीं हो सकता है. एक लाइन में कहें तो, जहां दिवाली मनती है, वहां शिवकाशी का पटाखा पहुंचता है. भारत में बिकने वाले 10 में से 9 पटाखे यहीं के बने होते हैं. देश का 85-90% उत्पादन अकेले इसी कस्बे से होता है. पेश है शिवाकाशी की अहमियत और पहचान पर एक खास रिपोर्ट…

Authored By: Rajeev Mandal

Updated On: Saturday, November 7, 2026

जवाहर लाल नेहरू ने कभी इस कस्बे को कुटीर जापान (लिटिल जापान) यूं ही नहीं कहा था. देश के किसी शहर में दिवाली की रात जब आसमान रंग-बिरंगी रोशनियों से जगमगाता है, जब बच्चे फुलझड़ियां जलाकर खिलखिलाते हैं और घरों के बाहर रंगभरे अनार और चकरीयां घूमती हैं, तब शायद ही किसी को उस छोटे से कस्बे की याद आती है, जहां इन खुशियों की तैयार करने के लिए महीनों पहले से मशक्कत शुरू हो जाती है. हजारों कारखाने रात-दिन आतिशबाजी बनाते हैं. अदालतों की तमाम रोक-टोक के बावजूद तमिलनाडु के विरुधुनगर जिले का शिवकाशी इन दिनों इसी तैयारी में जुटा है. यहां सुबह की पहली रोशनी के साथ कारखानों में काम शुरू हो जाता है और देर शाम तक पटाखों की पैकिंग, छंटाई और माल की खेप तैयार करने का सिलसिला चलता रहता है.

यहां की अर्थव्यवस्था आतिशबाजी उद्योग के इर्द-गिर्द विकसित हुई

शिवकाशी सिर्फ एक कस्बा नहीं, बल्कि देश की दिवाली की तैयारियों का एक बड़ा केंद्र है. यहां की अर्थव्यवस्था पीढ़ियों से आतिशबाजी उद्योग के इर्द-गिर्द विकसित हुई है. किसी परिवार में पिता पटाखे बनाते हैं तो अगली पीढ़ी इसी कारोबार से जुड़ जाती है. किसी के हाथों में फुलझड़ी तैयार होती है, तो कोई अनार, चकरी और रंगीन आतिशबाजी की पैकिंग में लगा है. छोटे कारोबारियों से लेकर बड़े निर्माताओं तक, सबकी निगाहें दीवाली के बाजार पर टिकी हैं. इस साल भी देशभर से ऑर्डर आने के साथ उत्पादन गतिविधियां बढ़ी हैं. हालांकि मजदूरों की कमी, कच्चे माल की बढ़ती कीमतों और पर्यावरण संबंधी नियमों ने कारोबार के सामने चुनौतियां भी खड़ी की हैं.

कैसे बनी पहचान, इसकी 3 वजह हैं-

1. कुट्टी जापान – नेहरू ने इसे छोटा जापान कहा था. 1920 में माचिस से शुरू हुआ, फिर पटाखा, फिर प्रिंटिंग. एक ही कस्बे में 1,070 से ज्यादा लाइसेंस वाली फैक्ट्रियां हैं.

2. 10 हजार वैरायटी – फुलझड़ी से लेकर 500 शॉट वाला स्काई शॉट तक. हाथ से बनी चीजों में यहां के कारीगरों का कोई मुकाबला नहीं.

3. कीमत -चीन से सस्ता और भारत की मिट्टी के हिसाब से बना. अब ग्रीन पटाखा भी यहीं बन रहा है.

वैश्विक बाजार में फिर से बन रही है पहचान

खबर है कि पोलैंड की एक कंपनी ने ऑर्डर दिया है. अमेरिका और यूरोप की कंपनियां पूछताछ कर रही हैं, जो पहले चीन से लेती थीं. साथ ही चेन्नई पोर्ट से 15 साल बाद फिर से सीधा एक्सपोर्ट शुरू हुआ है.

चीन को देगा टक्कर

अभी भारत का एक्सपोर्ट सिर्फ 7-8 लाख डॉलर है, दुनिया के कुल एक्सपोर्ट का 0.04% ही. चीन का 1.1 अरब डॉलर है. चीन का लियूयांग शहर दुनिया के दो-तिहाई पटाखे बनाता है. शिवकाशी अब उसी को टक्कर देने की तैयारी में है.

दिवाली ही है सबसे बड़ा बाजार

1. 80%: शिवकाशी की कुल बिक्री का हिस्सा दिवाली बाजार से

2. ₹4,000 करोड़ से अधिक: दिवाली के दौरान अनुमानित बिक्री

3. 3 लाख: प्रत्यक्ष रोजगार पाने वाले कामगार

4. 5 लाख परिवार: उद्योग पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से निर्भर

इसीलिए कहते हैं – दिवाली की रात आसमान में जो रंग दिखता है, उसके पीछे शिवकाशी के किसी मजदूर के हाथ का रंग होता है.

About the Author: Rajeev Mandal
वरिष्ठ पत्रकार राजीव मंडल पिछले 25 वर्षों से मीडिया इंडस्ट्री में सक्रिय हैं। दैनिक जागरण (लखनऊ) से बतौर कॅरियर की शुरुआत हुई। गलगोटिया टाइम्स जैसे प्रतिष्ठित संस्थान से जुड़ने से पहले राजीव ने टीवी इंडस्ट्री-ईटीवी और नेपाल वन न्यूज चैनल- में भी काम किया। इसके अलावा राष्ट्रीय सहारा अखबार के साथ 19 वर्षों तक इनका साथ रहा। इस अखबार के संपादकीय पृष्ठ और साप्ताहिक परिशिष्ट 'हस्तक्षेप" अंक का बतौर प्रभारी लंबे समय तक नेतृत्व किया। राजीव ने पत्रकारिता से मास्टर डिग्री (2000-2001) काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी से हासिल किया। फिलहाल राजीव गलगोटिया टाइम्स के लिए राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय और समसामयिक विषयों पर कलम चलाते हैं।
Leave A Comment

यह भी पढ़ें

Email marketing icon with envelope and graph symbolizing growth

news via inbox

समाचार जगत की हर खबर, सीधे आपके इनबॉक्स में - आज ही हमारे न्यूजलेटर को सब्सक्राइब करें।

खास आकर्षण