दिवाली पर कुछ अलग करना है? देश की इन 7 जगहों पर देखें त्योहार के अनोखे रंग

Authored By: Mazhar Pathan

Published On: Saturday, November 7, 2026

Last Updated On: Saturday, November 7, 2026

Diwali 2026 Destinations: अयोध्या से गोवा तक, इन 7 जगहों पर अलग अंदाज में मनती है दिवाली
Diwali 2026 Destinations: अयोध्या से गोवा तक, इन 7 जगहों पर अलग अंदाज में मनती है दिवाली

दिवाली सिर्फ दीये जलाने और मिठाइयां बांटने का त्योहार नहीं है. देश के अलग-अलग हिस्सों में इसे मनाने के तरीके भी अलग हैं. अयोध्या के दीपोत्सव से लेकर कोलकाता की काली पूजा और गुजरात के वौठा मेले तक, जानिए सात ऐसी जगहें जहां दिवाली का अनुभव बिल्कुल अलग हो सकता है.

Authored By: Mazhar Pathan

Last Updated On: Saturday, November 7, 2026

दिवाली आते ही घरों में साफ-सफाई, सजावट, मिठाइयों और खरीदारी की तैयारी शुरू हो जाती है. बाजार रोशनी से जगमगाने लगते हैं और हर तरफ त्योहार का माहौल दिखाई देने लगता है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि देश के अलग-अलग हिस्सों में दिवाली किस तरह मनाई जाती है? कहीं लाखों दीये नदी के घाटों को रोशन कर देते हैं, तो कहीं मां काली की भव्य पूजा होती है. कुछ जगहों पर लोकनृत्य और पारंपरिक मेले इस त्योहार को खास बना देते हैं.

अगर इस बार आप दिवाली पर घर में रहकर वही पुराना उत्सव मनाने के बजाय कुछ नया अनुभव करना चाहते हैं, तो देश की इन सात जगहों को अपनी यात्रा की सूची में शामिल कर सकते हैं.

अयोध्या का दीपोत्सव: लाखों दीयों से जगमगाते सरयू घाट

भगवान राम की नगरी अयोध्या में दिवाली का उत्सव खास धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व रखता है. मान्यता है कि 14 वर्ष का वनवास पूरा करने के बाद भगवान राम के अयोध्या लौटने की खुशी में दीप जलाए गए थे. इसी परंपरा को भव्य रूप में मनाने के लिए यहां दीपोत्सव आयोजित किया जाता है.

इस दौरान सरयू नदी के घाटों, मंदिरों और शहर के कई हिस्सों में मिट्टी के दीये जलाए जाते हैं. शाम होते ही पूरा शहर रोशनी से भर जाता है. दीपों की कतारें और सरयू के पानी में उनका प्रतिबिंब देखने लायक होता है. दीपोत्सव में धार्मिक कार्यक्रमों के साथ सांस्कृतिक प्रस्तुतियां, झांकियां और रामायण से जुड़े कार्यक्रम भी आकर्षण का केंद्र रहते हैं. अगर आप दिवाली को भक्ति और भव्यता के साथ महसूस करना चाहते हैं, तो अयोध्या एक खास अनुभव दे सकती है.

कोलकाता की काली पूजा: दिवाली की रात मां काली की आराधना

देश के कई हिस्सों में दिवाली की रात मां लक्ष्मी की पूजा होती है, लेकिन पश्चिम बंगाल में इसी अवसर पर मां काली की आराधना का विशेष महत्व है. कोलकाता में काली पूजा बड़े उत्साह के साथ मनाई जाती है.

इस मौके पर शहर के अलग-अलग इलाकों में भव्य पंडाल सजाए जाते हैं. मां काली की सुंदर और कलात्मक प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं. मंदिरों और पूजा पंडालों में विशेष अनुष्ठान होते हैं. रोशनी से सजी सड़कें और देर रात तक चलने वाली धार्मिक गतिविधियां शहर को अलग ही रूप दे देती हैं. कोलकाता की काली पूजा उन लोगों के लिए खास हो सकती है, जो दिवाली के दौरान बंगाल की धार्मिक परंपराओं और कला को करीब से देखना चाहते हैं.

टीकमगढ़ का मोनिया नृत्य: बुंदेलखंड की लोकसंस्कृति का रंग

दिवाली का एक अलग और जीवंत रूप मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में देखने को मिलता है. यहां मोनिया लोकनृत्य की परंपरा त्योहार को खास बनाती है. यह नृत्य आमतौर पर पुरुष कलाकारों द्वारा किया जाता है.

रंग-बिरंगे पारंपरिक कपड़े पहने कलाकार हाथों में लंबी लकड़ियां लेकर ढोलक और नगाड़े की थाप पर नृत्य करते हैं. उनके कदमों और लकड़ियों की लयबद्ध गतिविधियों में जोश और पारंपरिक युद्ध-कला की झलक दिखाई देती है. कुछ कलाकार मोरपंख भी धारण करते हैं.

इस नृत्य को भगवान कृष्ण द्वारा गोवर्धन पर्वत उठाने से जुड़ी लोककथा से भी जोड़ा जाता है. मान्यता है कि गोवर्धन पर्वत के नीचे सुरक्षित रहने के बाद गोकुल के लोगों ने खुशी में नृत्य किया था. फसल कटने के बाद आभार जताने की परंपरा से भी इसका संबंध बताया जाता है. अगर आप त्योहार के साथ लोककला और ग्रामीण संस्कृति देखना चाहते हैं, तो टीकमगढ़ का मोनिया नृत्य एक अलग अनुभव हो सकता है.

सीहोर का बाराखंबा मेला: पशुओं की खुशहाली के लिए अनोखी पूजा

दिवाली के दूसरे दिन मध्य प्रदेश के सीहोर जिले के बाराखंबा गांव में एक खास मेला लगता है. यहां किसान और पशुपालक परिवार बाराखंबा देव स्थान पर पहुंचकर दूध और नारियल चढ़ाते हैं.

स्थानीय मान्यता है कि इस पूजा से उनके पशु स्वस्थ रहते हैं और परिवार में खुशहाली आती है. खेती और पशुपालन से जुड़े लोगों के लिए यह परंपरा विशेष महत्व रखती है. इस आयोजन में आसपास के गांवों से बड़ी संख्या में लोग शामिल होते हैं. शहरी दिवाली से अलग यह मेला ग्रामीण जीवन, खेती और पशुपालन से जुड़े विश्वासों को समझने का अवसर देता है. सीहोर जिला मुख्यालय से बाराखंबा गांव की दूरी लगभग 40 किलोमीटर बताई गई है.

दिल्ली का दिल्ली हाट: दिवाली की खरीदारी और देशभर के हस्तशिल्प

अगर आप दिवाली पर घूमने के साथ खरीदारी का भी आनंद लेना चाहते हैं, तो दिल्ली हाट एक अच्छा विकल्प हो सकता है. यहां देश के अलग-अलग राज्यों के हस्तशिल्प और पारंपरिक सामान एक ही जगह देखने को मिलते हैं.

बाजार में हाथ से बनी सजावटी चीजें, कपड़े, आभूषण, घरेलू सजावट का सामान और उपहारों के कई विकल्प मिलते हैं. यहां अलग-अलग राज्यों के खानपान का स्वाद लेने का मौका भी मिलता है.

दिल्ली हाट की खासियत यह है कि यहां सिर्फ खरीदारी नहीं, बल्कि भारत की अलग-अलग सांस्कृतिक परंपराओं की झलक भी देखने को मिलती है. दिवाली से पहले उपहार और घर की सजावट का सामान खरीदने के लिए यह जगह उपयोगी हो सकती है.

गोवा का त्रिपुरारी पूर्णिमा उत्सव: नदी किनारे आस्था और रोशनी

गोवा का त्रिपुरारी पूर्णिमा उत्सव दिवाली के बाद होने वाले खास आयोजनों में शामिल है. इसे देव दिवाली के नाम से भी जाना जाता है. यह त्योहार कार्तिक महीने की पूर्णिमा को मनाया जाता है और भगवान शिव की त्रिपुरासुर पर विजय की कथा से जुड़ा है.

सांखली में वालवंती नदी के किनारे स्थित श्री विठ्ठल रखुमाई मंदिर के आसपास इस अवसर पर धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं. नदी के किनारे दीप जलाए जाते हैं और मंदिरों में विशेष सजावट की जाती है.

इस उत्सव का एक खास आकर्षण नाव प्रतियोगिता भी है. इसमें अलग-अलग टीमों द्वारा तैयार की गई छोटी और सजावटी नावों को नदी में उतारा जाता है. इस तरह यहां आस्था, रचनात्मकता और स्थानीय संस्कृति का सुंदर मेल देखने को मिलता है.

गुजरात का वौठा मेला: पशु बाजार और लोकजीवन की अनोखी झलक

गुजरात का वौठा मेला अपनी अलग पहचान के लिए जाना जाता है. यह कार्तिक पूर्णिमा के आसपास आयोजित होने वाला पारंपरिक मेला है. वौठा गांव साबरमती और वातरक नदियों के संगम के पास स्थित है.

इस मेले की सबसे बड़ी खासियत गधों और ऊंटों का व्यापार है. पशुओं को रंग-बिरंगे आभूषणों और सजावट से तैयार किया जाता है. किसान, पशुपालक, व्यापारी और श्रद्धालु यहां बड़ी संख्या में पहुंचते हैं.

मेले में पशुओं की खरीद-बिक्री के अलावा हस्तशिल्प की दुकानें, स्थानीय खानपान और अस्थायी बाजार भी देखने को मिलते हैं. शाम के समय नदी में दीप प्रवाहित करने की परंपरा इस आयोजन को धार्मिक रंग देती है.

अगर आप गुजरात के ग्रामीण जीवन, पारंपरिक व्यापार और लोकसंस्कृति को करीब से देखना चाहते हैं, तो वौठा मेला आपके लिए खास हो सकता है.

दिवाली को बनाएं यादगार, लेकिन यात्रा की तारीख जरूर जांचें

भारत में दिवाली मनाने का तरीका हर क्षेत्र में अलग है. अयोध्या का दीपोत्सव और कोलकाता की काली पूजा दिवाली के आसपास के प्रमुख आयोजन हैं, जबकि गोवा का त्रिपुरारी पूर्णिमा उत्सव और गुजरात का वौठा मेला कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर होते हैं. इसलिए यात्रा की योजना बनाते समय आयोजन की तारीख, स्थानीय कार्यक्रम, भीड़ और ठहरने की व्यवस्था पहले से जांच लेना बेहतर होगा.

इस बार दिवाली पर कुछ अलग अनुभव करना है, तो इन सात जगहों में से किसी एक को चुनकर त्योहार को नई यादों के साथ मना सकते हैं.

About the Author: Mazhar Pathan
मैं पिछले 6 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हूं। इस दौरान न्यूज़ रूम से लेकर ज़मीनी स्तर तक पत्रकारिता के विभिन्न आयामों में काम करने का अनुभव हासिल किया है। ऑफिस में वीडियो एंकरिंग से लेकर फील्ड में ग्राउंड रिपोर्टिंग तक, मैंने अलग-अलग विषयों और मुद्दों पर काम किया है। सामाजिक, राजनीतिक, समसामयिक और जनहित से जुड़े विषयों पर रिपोर्टिंग, लेखन और वीडियो कंटेंट तैयार करना मेरी कार्यशैली का हिस्सा रहा है।
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