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Ekadanta Sankashti Chaturthi 2026: एकदंत संकष्टी चतुर्थी, जानें शुभ मुहूर्त, अंगारकी योग, पूजा विधि, व्रत नियम और चंद्र दर्शन महत्व
Authored By: Nishant Singh
Published On: Monday, May 4, 2026
Last Updated On: Monday, May 4, 2026
Ekadanta Sankashti Chaturthi 2026: एकदंत संकष्टी चतुर्थी 2026, 5 मई को मनाई जाएगी, जिसमें अंगारकी चतुर्थी का दुर्लभ संयोग बन रहा है. इस दिन भगवान गणेश की पूजा, व्रत और चंद्र दर्शन का विशेष महत्व है. विधि-विधान से पूजा करने पर मंगल दोष शांत होता है और जीवन की बाधाएं दूर होकर सुख-समृद्धि प्राप्त होती है.
Authored By: Nishant Singh
Last Updated On: Monday, May 4, 2026
Ekadanta Sankashti Chaturthi 2026: हिंदू धर्म में भगवान गणेश को विघ्नहर्ता और प्रथम पूज्य माना जाता है. हर शुभ कार्य की शुरुआत उनकी आराधना से होती है, तभी कार्य सफल माना जाता है. ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाई जाने वाली एकदंत संकष्टी चतुर्थी इस बार साल 2026 में बेहद खास बन गई है. इसकी वजह है अंगारकी चतुर्थी का दुर्लभ संयोग, जो इस व्रत के महत्व को कई गुना बढ़ा देता है. यह दिन न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि जीवन की बाधाओं को दूर करने और सुख-समृद्धि पाने का भी श्रेष्ठ अवसर माना जाता है.
कब रखा जाएगा व्रत?
एकदंत संकष्टी चतुर्थी का व्रत साल 2026 में बेहद शुभ संयोग के साथ मनाया जाएगा. पंचांग के अनुसार, ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि 5 मई 2026 की सुबह 5 बजकर 24 मिनट से शुरू होकर 6 मई 2026 की सुबह 7 बजकर 51 मिनट तक रहेगी. चूंकि संकष्टी चतुर्थी का व्रत चंद्र दर्शन पर आधारित होता है और 5 मई की रात को चंद्रोदय के समय चतुर्थी तिथि विद्यमान रहेगी, इसलिए यह व्रत 5 मई 2026, मंगलवार को ही रखा जाएगा. इस दिन भक्त पूरे दिन व्रत रखते हैं और रात में चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद ही व्रत का पारण करते हैं.
- व्रत की तिथि: 5 मई 2026 (मंगलवार)
- चतुर्थी तिथि आरंभ: 5 मई सुबह 5:24 बजे
- चतुर्थी तिथि समाप्त: 6 मई सुबह 7:51 बजे
- व्रत का आधार: चंद्र दर्शन (Moonrise)
- पारण का समय: रात में चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद
इस दिन व्रत रखने से भगवान गणेश की विशेष कृपा प्राप्त होती है और जीवन की बाधाएं दूर होने की मान्यता है.
अंगारकी चतुर्थी का दुर्लभ संयोग
जब संकष्टी चतुर्थी मंगलवार के दिन पड़ती है, तो उसे अंगारकी चतुर्थी कहा जाता है. यह संयोग बहुत ही शुभ और दुर्लभ माना जाता है. मान्यता है कि इस दिन किया गया व्रत और पूजा सामान्य दिनों की तुलना में कई गुना अधिक फलदायी होती है. खासकर जिन लोगों की कुंडली में मंगल दोष होता है, उनके लिए यह दिन अत्यंत लाभकारी होता है. इस दिन भगवान गणेश की विधिपूर्वक पूजा करने से मंगल ग्रह के अशुभ प्रभाव कम होते हैं और जीवन की परेशानियां धीरे-धीरे समाप्त होने लगती हैं.
पूजा विधि: सरल और प्रभावी तरीका
एकदंत संकष्टी चतुर्थी के दिन भगवान गणेश की पूजा पूरे विधि-विधान और श्रद्धा से करना अत्यंत शुभ माना जाता है. इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करने के बाद मन को शांत रखते हुए व्रत का संकल्प लिया जाता है. घर के पूजा स्थान को साफ करके एक चौकी पर लाल वस्त्र बिछाया जाता है और उस पर गणेश जी की प्रतिमा स्थापित की जाती है. इसके बाद गंगाजल से अभिषेक कर उन्हें फूल, दूर्वा, अक्षत, धूप और दीप अर्पित किए जाते हैं. गणेश जी को मोदक या लड्डू का भोग लगाना विशेष रूप से फलदायी माना जाता है. पूजा के दौरान “ॐ गणपतये नमः” मंत्र का जाप और संकष्टी चतुर्थी की कथा सुनना या पढ़ना चाहिए. अंत में रात को चंद्रमा को अर्घ्य देकर ही व्रत का पारण किया जाता है, तभी यह व्रत पूर्ण माना जाता है.
पूजा के मुख्य चरण
- सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र पहनें
- हाथ में जल लेकर व्रत का संकल्प लें
- चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर गणेश जी की प्रतिमा स्थापित करें
- गंगाजल से अभिषेक करें
- फूल, अक्षत, धूप, दीप और दूर्वा अर्पित करें
- गणेश जी को मोदक या लड्डू का भोग लगाएं
- “ॐ गणपतये नमः” मंत्र का जाप करें
- संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा पढ़ें या सुनें
- रात में चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद व्रत खोलें
इस विधि से पूजा करने पर भगवान गणेश की कृपा प्राप्त होती है और जीवन की सभी बाधाएं दूर होने लगती हैं.
व्रत के दौरान ध्यान रखने योग्य बातें
इस व्रत को सफल बनाने के लिए कुछ नियमों का पालन करना बेहद जरूरी होता है. सबसे पहले, चंद्र दर्शन से पहले भोजन नहीं करना चाहिए, क्योंकि व्रत चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद ही पूर्ण माना जाता है. पूजा करते समय हमेशा गणेश जी के सामने ही रहें, उनकी पीठ की ओर देखने से बचें. इस दिन गणेश जी को तुलसी अर्पित नहीं की जाती, केवल दूर्वा ही चढ़ाई जाती है. इसके अलावा, घर में तामसिक भोजन जैसे लहसुन, प्याज और मांसाहार का सेवन नहीं करना चाहिए. मन को शांत रखें और नकारात्मक विचारों से दूरी बनाए रखें.
व्रत का आध्यात्मिक महत्व
एकदंत संकष्टी चतुर्थी केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं है, बल्कि यह आत्मशुद्धि और आत्मबल बढ़ाने का भी माध्यम है. यह व्रत व्यक्ति को अनुशासन, संयम और श्रद्धा का पाठ सिखाता है. ऐसा माना जाता है कि इस दिन सच्चे मन से की गई प्रार्थना भगवान गणेश तक अवश्य पहुंचती है और वे भक्तों की हर मनोकामना पूरी करते हैं. जीवन में आने वाली कठिनाइयों को दूर करने और सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त करने के लिए यह व्रत अत्यंत लाभकारी माना गया है.
इस प्रकार, साल 2026 की एकदंत संकष्टी चतुर्थी न केवल धार्मिक दृष्टि से विशेष है, बल्कि यह हर व्यक्ति के जीवन में सुख, शांति और सफलता लाने का एक सुनहरा अवसर भी है.
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