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Krishna Janmashtami 2026: 3 या 4 सितंबर, कब मनाई जाएगी जन्माष्टमी? जानें निशिता काल का शुभ मुहूर्त
Authored By: Nishant Singh
Published On: Tuesday, August 25, 2026
Last Updated On: Tuesday, August 25, 2026
Krishna Janmashtami 2026: कृष्ण जन्माष्टमी 2026 की तारीख को लेकर भक्तों में असमंजस है, लेकिन पंचांग के अनुसार 4 सितंबर को व्रत और जन्मोत्सव मनाना शुभ रहेगा. इस दिन अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र का संयोग रहेगा. निशिता काल में 11:57 बजे से 12:43 बजे तक कान्हा की पूजा और जन्मोत्सव किया जाएगा.
Authored By: Nishant Singh
Last Updated On: Tuesday, August 25, 2026
Krishna Janmashtami 2026: भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव का इंतजार कर रहे भक्तों के बीच इस बार तारीख को लेकर असमंजस है. कोई 3 सितंबर को जन्माष्टमी मनाने की बात कर रहा है तो किसी के मुताबिक 4 सितंबर सही तारीख है. पंचांग के अनुसार इस बार अष्टमी तिथि 4 सितंबर की रात शुरू होगी, इसलिए व्रत और जन्मोत्सव के लिए 4 सितंबर को ही प्रमुख माना जा रहा है.
4 सितंबर को रखा जाएगा जन्माष्टमी का व्रत
पंचांग के मुताबिक भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि 4 सितंबर को रात 2 बजकर 25 मिनट से शुरू होगी और 5 सितंबर की रात 12 बजकर 13 मिनट तक रहेगी. चूंकि जन्माष्टमी का मुख्य उत्सव निशिता काल यानी मध्यरात्रि में मनाया जाता है और इस दौरान अष्टमी तिथि विद्यमान रहेगी, इसलिए 4 सितंबर को व्रत रखना और रात में कान्हा का जन्मोत्सव मनाना शुभ माना जाएगा.
रोहिणी नक्षत्र का भी रहेगा संयोग
कृष्ण जन्माष्टमी पर अष्टमी तिथि के साथ रोहिणी नक्षत्र का विशेष महत्व है. इस वर्ष 4 सितंबर की रात 12 बजकर 29 मिनट से रोहिणी नक्षत्र शुरू होकर रात 11 बजकर 4 मिनट तक रहेगा. धार्मिक मान्यता के अनुसार श्रीकृष्ण का जन्म रोहिणी नक्षत्र में हुआ था. यही कारण है कि जन्माष्टमी की मध्यरात्रि पूजा में इस नक्षत्र को विशेष महत्व दिया जाता है.
निशिता काल में होगा कान्हा का जन्मोत्सव
जन्माष्टमी की पूजा का सबसे खास समय आधी रात का माना जाता है. 4 सितंबर की रात 11:57 बजे से 5 सितंबर की रात 12:43 बजे तक निशिता काल का शुभ मुहूर्त रहेगा. करीब 46 मिनट के इस समय में भक्त बाल गोपाल का विधि-विधान से पूजन कर सकते हैं. इस दौरान पंचामृत से अभिषेक, नए वस्त्र धारण कराने, माखन-मिश्री का भोग लगाने और आरती करने की परंपरा है.
जन्म के बाद कब खोलें व्रत?
जो श्रद्धालु जन्माष्टमी पर निर्जला या फलाहार व्रत रखते हैं, वे आधी रात को भगवान कृष्ण के जन्मोत्सव और पूजा के बाद पारण की तैयारी करते हैं. पंचांग के अनुसार 5 सितंबर की सुबह 6 बजकर 1 मिनट के बाद व्रत खोलने का समय माना गया है. हालांकि, व्रत रखने वाले लोग अपने क्षेत्र और परंपरा के अनुसार स्थानीय पंचांग का भी ध्यान रखें.
आधी रात को ही क्यों जन्म लेते हैं कान्हा?
धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मध्यरात्रि में मथुरा की कारागार में हुआ था. उनके जन्म के समय रोहिणी नक्षत्र का संयोग भी बताया जाता है. इसी वजह से जन्माष्टमी पर रात का निशिता काल सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है. आधी रात होते ही मंदिरों में शंख और घंटियां गूंजती हैं, आरती होती है और बाल कृष्ण को भोग लगाया जाता है.
इस जन्माष्टमी ऐसे मनाएं कान्हा का जन्मोत्सव
जन्माष्टमी का पर्व केवल व्रत और पूजा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भगवान कृष्ण के बाल स्वरूप की भक्ति और आनंद का उत्सव भी है. घरों और मंदिरों में झांकियां सजाई जाती हैं, लड्डू गोपाल को सुंदर वस्त्र पहनाए जाते हैं और माखन-मिश्री का भोग लगाया जाता है. आधी रात को कृष्ण जन्म के साथ पूरा माहौल भक्ति और उत्सव से भर जाता है.
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