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मधुश्रावणी व्रत: 13 दिनों का कठिन तप, बासी फूलों की पूजा और ‘टेमी’ की अनोखी परंपरा
Authored By: Nishant Singh
Published On: Friday, August 14, 2026
Last Updated On: Friday, August 14, 2026
Madhushravani Vrat: मधुश्रावणी मिथिलांचल की अनोखी परंपरा है, जिसमें नवविवाहिताएं पति की लंबी उम्र और सुखी दांपत्य जीवन के लिए 13 दिनों तक कठिन व्रत रखती हैं. बासी फूलों की पूजा, मिट्टी की प्रतिमाएं, चना-मूंग का भोग और ‘टेमी’ की रस्म इस पर्व को खास बनाती हैं.
Authored By: Nishant Singh
Last Updated On: Friday, August 14, 2026
Madhushravani Vrat: सावन सिर्फ शिव भक्ति का महीना नहीं, बल्कि भारत के अलग-अलग हिस्सों की अनूठी लोक परंपराओं का भी समय है. बिहार के मिथिलांचल में इसी दौरान मधुश्रावणी व्रत मनाया जाता है. नवविवाहिताओं के लिए खास माने जाने वाले इस अनुष्ठान में पति की लंबी उम्र, दांपत्य सुख और परिवार की खुशहाली की कामना की जाती है. वर्ष 2026 में यह व्रत 3 अगस्त से शुरू होकर 15 अगस्त को पूरा होगा.
नवविवाहिता के लिए खास है यह व्रत
मधुश्रावणी मुख्य रूप से मिथिलांचल की पारंपरिक संस्कृति से जुड़ा पर्व है. शादी के बाद आने वाले पहले सावन में नवविवाहिता इस व्रत को करती है. इसमें पूजा-पाठ के साथ प्रकृति और लोक आस्था का भी गहरा मेल दिखाई देता है. व्रती महिलाएं सज-धजकर बांस की डलिया में अलग-अलग पत्ते, फूल और पूजा सामग्री लेकर आती हैं. इस दौरान जूही और मैनी जैसे पौधों का इस्तेमाल भी परंपरा का हिस्सा माना जाता है.
इस व्रत की एक खास बात यह है कि पूजा कराने वाली पुरोहित भी महिला होती हैं. वही धार्मिक कथा सुनाती हैं और पूजा की विधि पूरी कराती हैं. मिथिलांचल के ब्राह्मण, कर्ण कायस्थ और स्वर्णकार समुदायों में इस परंपरा का विशेष महत्व माना जाता है.
जब भगवान को चढ़ते हैं बासी फूल
मधुश्रावणी की सबसे अलग परंपराओं में से एक है बासी फूल चढ़ाना. आमतौर पर देवी-देवताओं की पूजा में ताजे फूलों को शुभ माना जाता है, लेकिन यहां मनसा देवी को एक दिन पहले तोड़े गए फूल अर्पित किए जाते हैं. पूजा में मनसा देवी के साथ भगवान शिव, माता गौरी, नाग-नागिन, सूर्य, चंद्रमा और नवग्रहों की भी आराधना की जाती है.
इस परंपरा में फूलों के साथ प्रकृति और नाग पूजा की मान्यताएं भी जुड़ी हुई हैं, जो मिथिला की पुरानी लोक संस्कृति की झलक देती हैं.
13 दिनों तक आसान नहीं होती तपस्या
मधुश्रावणी को सिर्फ सामान्य पूजा मानना सही नहीं होगा. इस दौरान नवविवाहिता को कई कठिन नियमों का पालन करना पड़ता है. व्रत के दिनों में भोजन को लेकर विशेष संयम रखा जाता है. दिन में एक बार भोजन करने और उसमें नमक का इस्तेमाल नहीं करने की परंपरा बताई गई है. सेंधा नमक भी इसमें शामिल नहीं होता.
सोने के लिए बिस्तर की जगह जमीन का इस्तेमाल किया जाता है. पहले दिन बालों में की गई कंघी और बनाई गई वेणी को पूरे अनुष्ठान के दौरान बनाए रखने की परंपरा भी है. पूजा स्थल पर मिट्टी से बनाए गए हाथी, शिव-गौरी और नाग-नागिन की आकृतियों की सुबह-शाम पूजा की जाती है.
‘टेमी’ की रस्म क्यों है इतनी खास?
मधुश्रावणी के समापन से जुड़ी ‘टेमी’ रस्म इस पर्व को और भी अलग बनाती है. पुराने समय में इस रस्म के दौरान नवविवाहिता के घुटने को जलते दीपक से दागने की परंपरा बताई जाती है. लोक मान्यता थी कि इससे पति की लंबी उम्र का आशीर्वाद मिलता है.
हालांकि समय के साथ इस परंपरा में बदलाव आया है. अब कई जगह ‘शीतल टेमी’ की परंपरा निभाई जाती है. कहीं दीपक को घुटने के पास ले जाकर तुरंत हटा दिया जाता है, ताकि रस्म का प्रतीकात्मक रूप बना रहे और शरीर को नुकसान न पहुंचे.
चना-मूंग में छिपा है खुशहाल जीवन का संकेत
मधुश्रावणी में चना और मूंग का भी खास महत्व है. पूजा में इन्हें भोग के रूप में इस्तेमाल किया जाता है. पानी में भिगोने पर इनके अंकुर निकलते हैं, इसलिए इन्हें नवविवाहित जीवन की हरियाली, विकास और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है.
व्रत के दौरान भीगे हुए चना-मूंग और मौसमी फलों का इस्तेमाल किया जाता है. पहले और अंतिम दिन इन्हें गांव के लोगों के बीच बांटने की परंपरा भी कई जगह देखने को मिलती है.
आस्था के साथ मिथिला की संस्कृति का उत्सव
मधुश्रावणी की खासियत यही है कि इसमें सिर्फ व्रत और पूजा नहीं, बल्कि मिथिला की लोक संस्कृति, प्रकृति, वैवाहिक परंपराएं और सामुदायिक जीवन एक साथ दिखाई देते हैं. 13 दिनों तक चलने वाला यह अनुष्ठान नवविवाहिताओं के लिए धैर्य और आस्था की परीक्षा माना जाता है. ‘बासी फूल’, मिट्टी की प्रतिमाएं, चना-मूंग और ‘टेमी’ जैसी रस्में इस पर्व को देश की दूसरी सावनी परंपराओं से अलग पहचान देती हैं.














