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Phulera Dooj 2026: प्रेम, फूलों और वैवाहिक खुशियों का पर्व, 19 फरवरी को होंगी रिकॉर्ड तोड़ शादियां
Authored By: Nishant Singh
Published On: Friday, February 13, 2026
Last Updated On: Friday, February 13, 2026
Phulera Dooj 2026: फाल्गुन शुक्ल द्वितीया को मनाया जाने वाला फुलेरा दूज प्रेम, फूलों और वैवाहिक खुशियों का प्रतीक पर्व है. वर्ष 2026 में यह पर्व 19 फरवरी को मनाया जाएगा. अबूझ मुहूर्त होने के कारण इस दिन बिना मुहूर्त देखे विवाह और अन्य शुभ कार्य किए जाते हैं, जिससे रिकॉर्ड तोड़ शादियां होती हैं.
Authored By: Nishant Singh
Last Updated On: Friday, February 13, 2026
Phulera Dooj 2026: फाल्गुन माह की द्वितीया तिथि को मनाया जाने वाला फुलेरा दूज केवल एक तिथि नहीं, बल्कि प्रेम, उल्लास और नए रिश्तों की शुरुआत का प्रतीक है. वर्ष 2026 में यह पावन पर्व 19 फरवरी को मनाया जाएगा. मान्यता है कि इसी दिन से होली के रंग वातावरण में घुलने लगते हैं. उत्तर भारत के गांवों से लेकर ब्रजभूमि तक, फुलेरा दूज के साथ ही होली की औपचारिक तैयारियां शुरू हो जाती हैं. यह दिन फूलों की होली, सामाजिक उल्लास और विवाह के लिए विशेष रूप से शुभ माना जाता है.
फुलेरा दूज क्यों है खास?
‘फुलेरा’ शब्द का अर्थ ही फूल होता है. यह पर्व फूलों, सौंदर्य और प्रेम का प्रतीक माना गया है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण को फूलों से होली खेलना अत्यंत प्रिय था. यही कारण है कि फुलेरा दूज के दिन फूलों की होली खेली जाती है. यह पर्व संकेत देता है कि शीत ऋतु विदा ले रही है और रंगों से भरी होली आने वाली है. गांवों में इस दिन होली रखने के स्थान पर उपले या लकड़ी रखकर प्रतीकात्मक शुरुआत की जाती है.
तिथि और पंचांग की जानकारी
वैदिक पंचांग के अनुसार फाल्गुन शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि 18 फरवरी 2026 को दोपहर 04:57 बजे से प्रारंभ होकर 19 फरवरी को दोपहर 03:58 बजे तक रहेगी. सनातन परंपरा में उदया तिथि का महत्व होता है, इसलिए 19 फरवरी 2026 को फुलेरा दूज का पर्व मनाया जाएगा. यही कारण है कि इसी दिन विवाह, पूजन और अन्य मांगलिक कार्य संपन्न किए जाएंगे.
- फुलेरा दूज का पर्व फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाया जाता है.
- वर्ष 2026 में फुलेरा दूज 19 फरवरी को मनाई जाएगी.
- द्वितीया तिथि की शुरुआत 18 फरवरी 2026 को दोपहर 04:57 बजे होगी.
- द्वितीया तिथि का समापन 19 फरवरी 2026 को दोपहर 03:58 बजे होगा.
- सनातन धर्म में उदया तिथि को विशेष महत्व दिया जाता है.
- उदया तिथि के अनुसार 19 फरवरी 2026 को ही फुलेरा दूज का पर्व मनाया जाएगा.
- यह दिन अबूझ मुहूर्त माना जाता है, इसलिए विवाह और अन्य शुभ कार्य बिना मुहूर्त देखे किए जा सकते हैं.
अबूझ मुहूर्त का महत्व
फुलेरा दूज को हिंदू शास्त्रों में अबूझ मुहूर्त कहा गया है. इसका अर्थ है कि इस दिन किसी विशेष ज्योतिषीय गणना या शुभ समय देखने की आवश्यकता नहीं होती. पूरा दिन ही शुभ माना जाता है. यही वजह है कि हर साल इस दिन हजारों शादियां होती हैं और वर्ष 2026 में भी रिकॉर्ड तोड़ विवाह समारोह होने की संभावना जताई जा रही है.
विवाह के लिए सर्वोत्तम दिन
फाल्गुन शुक्ल द्वितीया को विवाह बंधन के लिए वर्ष के सबसे श्रेष्ठ दिनों में गिना जाता है. मान्यता है कि इस दिन विवाह करने वाले दंपति को भगवान श्रीकृष्ण का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है. सर्दियों के विदा होने के बाद यह विवाह सीजन का अंतिम बड़ा अवसर भी माना जाता है, इसलिए लोग इस दिन को हाथ से जाने नहीं देना चाहते.
प्रेम और दांपत्य के लिए अतिशुभ तिथि
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार जिस दिन राधा और श्रीकृष्ण ने फूलों की होली खेली थी, वही तिथि फुलेरा दूज के नाम से जानी गई. राधा-कृष्ण के मिलन की यह तिथि प्रेम, समर्पण और भावनात्मक जुड़ाव का प्रतीक मानी जाती है. इसी कारण इस दिन विवाह करने वाले युगलों के बीच प्रेम और दांपत्य जीवन को अत्यंत मजबूत माना जाता है.
फुलेरा दूज पर रिकॉर्ड तोड़ शादियां क्यों?
यह दिन किसी भी नकारात्मक ग्रह दोष या अशुभ प्रभाव से मुक्त माना जाता है. विवाह, संपत्ति खरीद, नया व्यवसाय शुरू करने जैसे हर शुभ कार्य के लिए यह दिन आदर्श है. उत्तर भारत के कई राज्यों में तो फुलेरा दूज की पूर्व संध्या से ही शादी समारोह शुरू हो जाते हैं. यही वजह है कि हर साल इस दिन शादियों की संख्या नए रिकॉर्ड बनाती है.
पोहा का विशेष भोग
फुलेरा दूज के दिन भगवान श्रीकृष्ण को विशेष भोग अर्पित किया जाता है. इसमें मुख्य रूप से पोहा और अन्य पारंपरिक व्यंजन शामिल होते हैं. पहले यह भोग देवता को अर्पित किया जाता है, फिर प्रसाद के रूप में भक्तों में वितरित किया जाता है. यह परंपरा सादगी और श्रद्धा का सुंदर उदाहरण है.
धार्मिक मान्यताएं और परंपराएं
मान्यता है कि ब्रज की गोपियों ने राधा-कृष्ण के प्रेम की खुशी में फूलों की वर्षा की थी. इसी से फूलों की होली की परंपरा शुरू हुई. कहा जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने इसी दिन होली खेलने की शुरुआत की थी. फुलेरा दूज पर घरों को फूलों और रंगोली से सजाया जाता है और वातावरण में उल्लास छा जाता है.
कैसे मनाया जाता है फुलेरा दूज?
इस दिन भगवान कृष्ण के साथ रंग-बिरंगे फूलों से होली खेली जाती है. ब्रज क्षेत्र में मंदिरों को फूलों और रोशनी से सजाया जाता है. भगवान कृष्ण की मूर्ति को सजे हुए मंडप में विराजमान किया जाता है और उनकी कमर पर रंगीन वस्त्र का छोटा टुकड़ा लगाया जाता है, जो यह दर्शाता है कि प्रभु होली खेलने के लिए तैयार हैं.
राधा-कृष्ण की प्रसिद्ध कथा
पौराणिक कथा के अनुसार जब श्रीकृष्ण व्यस्तता के कारण कई दिनों तक वृंदावन नहीं आए, तो राधा उदास हो गईं. उनके दुख से वन सूखने लगे और पुष्प मुरझा गए. जब कृष्ण को इसका कारण पता चला तो वे तुरंत मथुरा से वृंदावन पहुंचे. उनके आगमन से हरियाली लौट आई और फूल खिल उठे. तभी फूलों की होली का यह सुंदर दृश्य रचा गया.
गुलरियां क्या होती हैं?
फुलेरा दूज से ही होलिका दहन की तैयारी भी शुरू हो जाती है. महिलाएं गोबर से छोटी-छोटी गुलरियां बनाती हैं, जिनमें बीच में सुराख किया जाता है. सूखने के बाद इनकी मालाएं बनाकर होलिका दहन के दिन अग्नि में अर्पित किया जाता है. यह परंपरा प्रकृति और परिश्रम से जुड़ाव का प्रतीक मानी जाती है.
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