केरल से ‘केरलम’ तक लोकसभा से पास हुआ नाम बदलने का बिल, जानिए क्यों उठी यह मांग
Authored By: Nishant Singh
Published On: Friday, August 14, 2026
Updated On: Friday, August 14, 2026
लोकसभा ने केरल का नाम बदलकर ‘केरलम’ करने वाले विधेयक को मंजूरी दे दी है. यह मांग मलयालम भाषा और राज्य की सांस्कृतिक पहचान से जुड़ी है. विधानसभा पहले ही प्रस्ताव पारित कर चुकी है. अब राज्यसभा और राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद नाम बदलने की प्रक्रिया पूरी होगी.
Authored By: Nishant Singh
Updated On: Friday, August 14, 2026
Kerala Name Change Bill 2026: केरल के नाम को लेकर लंबे समय से चली आ रही मांग अब संसद के दरवाजे तक पहुंच गई है. लोकसभा ने 11 अगस्त 2026 को ‘केरल’ का नाम बदलकर ‘केरलम’ करने वाले विधेयक को ध्वनिमत से मंजूरी दे दी. हालांकि यह प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई है. कानून बनने के लिए बिल को राज्यसभा से पारित होने और फिर राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने का इंतजार है.
आखिर ‘केरल’ की जगह ‘केरलम’ क्यों?
नाम बदलने की मांग के पीछे सबसे बड़ी वजह भाषा और राज्य की स्थानीय पहचान से जुड़ी है. केरल विधानसभा का कहना है कि मलयालम भाषा में राज्य का नाम ‘केरलम’ है, जबकि अंग्रेजी में और संविधान की पहली अनुसूची में इसे ‘केरल’ लिखा गया है. इसी अंतर को खत्म करने के लिए राज्य ने केंद्र से नाम में बदलाव की मांग की.
केरल विधानसभा ने पहले अगस्त 2023 में इस संबंध में प्रस्ताव पारित किया था. इसके बाद जून 2024 में एक बार फिर सर्वसम्मति से प्रस्ताव पास कर केंद्र से संविधान के अनुच्छेद 3 के तहत राज्य का नाम बदलने की प्रक्रिया शुरू करने का आग्रह किया गया.
‘केरलम’ नाम की कहानी कितनी पुरानी है?
‘केरलम’ शब्द सिर्फ आधुनिक समय की देन नहीं है. इसके इतिहास को काफी पुराना माना जाता है. इसका शुरुआती उल्लेख सम्राट अशोक के 257 ईसा पूर्व के शिलालेख II में मिलता है, जहां ‘केरलपुत्र’ का जिक्र किया गया है. इसे दक्षिण भारत के चेर राजवंश से जोड़कर देखा जाता है.
नाम की उत्पत्ति को लेकर अलग-अलग मत भी हैं. भाषा विशेषज्ञों ने ‘केरम’, ‘चेरम’ और पुराने तमिल शब्द ‘चेर’ तथा ‘अलम’ के साथ इसके संबंध की चर्चा की है. यानी ‘केरलम’ नाम के पीछे भाषा, भूगोल और दक्षिण भारत के पुराने इतिहास की कई परतें जुड़ी हुई हैं.
आज का केरल कैसे बना?
आज का केरल भी एक दिन में अस्तित्व में नहीं आया. मलयालम भाषी क्षेत्र कभी त्रावणकोर, कोचीन और मद्रास प्रेसीडेंसी के मालाबार जैसे अलग-अलग प्रशासनिक हिस्सों में बंटे हुए थे. इन्हें एक साथ लाने की मांग ने 1920 के दशक में ‘ऐक्य केरल’ यानी संयुक्त केरल आंदोलन का रूप लिया.
आजादी के बाद 1949 में त्रावणकोर और कोचीन को मिलाकर त्रावणकोर-कोचीन राज्य बनाया गया. इसके बाद भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की प्रक्रिया में मलयालम भाषी क्षेत्रों को एक राज्य के रूप में संगठित किया गया. आखिरकार 1 नवंबर 1956 को आधुनिक केरल राज्य अस्तित्व में आया.
दिलचस्प बात यह है कि मलयालम में राज्य को ‘केरलम’ कहा जाता रहा, लेकिन आधिकारिक अंग्रेजी नाम ‘केरल’ ही रहा. अब इसी अंतर को समाप्त करने की कोशिश हो रही है.
राज्य का नाम बदलने की संवैधानिक प्रक्रिया क्या है?
किसी राज्य का नाम बदलना सिर्फ राज्य सरकार के फैसले से संभव नहीं है. इसके लिए संविधान में तय प्रक्रिया का पालन करना पड़ता है. अनुच्छेद 3 संसद को राज्य के नाम, क्षेत्र या सीमाओं में बदलाव करने की शक्ति देता है.
ऐसे विधेयक को संसद में पेश करने से पहले राष्ट्रपति की सिफारिश जरूरी होती है. यदि प्रस्ताव किसी राज्य के नाम या सीमा को प्रभावित करता है तो उसे संबंधित राज्य विधानसभा के पास राय के लिए भेजा जाता है. हालांकि विधानसभा की राय संसद के लिए बाध्यकारी नहीं होती.
अब आगे क्या होगा?
केंद्र सरकार ने फरवरी 2026 में नाम बदलने के प्रस्ताव को मंजूरी दी थी. इसके बाद प्रस्तावित विधेयक को राज्य विधानसभा की राय के लिए भेजा गया और वहां इसे समर्थन मिला. 10 अगस्त को लोकसभा में बिल पेश किया गया और 11 अगस्त को इसे ध्वनिमत से पारित कर दिया गया.
अब इसकी अगली परीक्षा राज्यसभा में होगी. वहां से मंजूरी मिलने के बाद विधेयक राष्ट्रपति के पास जाएगा. राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलने के बाद ही ‘केरल’ से आधिकारिक तौर पर ‘केरलम’ बनने की संवैधानिक प्रक्रिया पूरी मानी जाएगी. यानी फिलहाल नाम बदलने की दिशा में बड़ा कदम जरूर उठ चुका है, लेकिन अंतिम मुहर अभी बाकी है.
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