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बाइबिल नहीं, कुरान: Zohran Mamdani की शपथ ने अमेरिका की सत्ता परंपरा को क्यों चौंकाया?
Authored By: गुंजन शांडिल्य
Published On: Friday, January 2, 2026
Last Updated On: Friday, January 2, 2026
ज़ोहरान ममदानी 1 जनवरी 2026 को देर रात न्यूयॉर्क शहर के पहले मुस्लिम मेयर बने. उन्होंने दो समारोहों में तीन कुरान पर शपथ ली. इसके साथ ही ममदानी ने शहर के पहले मुस्लिम, दक्षिण एशियाई और अफ्रीकी मूल के मेयर के तौर पर अपनी पहचान को सबके साथ साझा किया.
Authored By: गुंजन शांडिल्य
Last Updated On: Friday, January 2, 2026
न्यूयॉर्क शहर को 1 जनवरी 2026 की आधी रात को एक नया मेयर मिल गया. नए मेयर के शपथ ग्रहण के दौरान सत्ता, पहचान और इतिहास के संगम का एक ऐसा दृश्य दिखा, जो इससे पहले कभी देखा नहीं गया था. सिटी हॉल के नीचे वर्षों से बंद पड़े एक सबवे स्टेशन में ज़ोहरान ममदानी (Zohran Mamdani) ने मेयर पद की शपथ ली. वह भी कुरान पर हाथ रखकर. यह भी पहली बार हुआ है.
यह एक औपचारिकता भर नहीं थी, बल्कि न्यूयॉर्क की राजनीतिक परंपरा में एक प्रतीकात्मक हस्तक्षेप माना जा रहा है.
34 वर्षीय ज़ोहरान ममदानी शहर के पहले मुस्लिम, पहले दक्षिण एशियाई और पहले अफ्रीकी मूल के मेयर बने हैं. युगांडा में जन्मे और प्रवासन के ज़रिए न्यूयॉर्क पहुंचे ममदानी की कहानी उन लाखों लोगों से मेल खाती है, जिनकी जड़ें इस शहर से बाहर हैं. लेकिन इनका भविष्य यहीं से जुड़ा है.
अमेरिकी परंपरा से अलग शपथ
अमेरिकी लोकतंत्र में शपथ ग्रहण का धार्मिक ग्रंथों से जुड़ाव नया नहीं है. अधिकांश चुने हुए प्रतिनिधि बाइबिल (Bible) पर हाथ रखकर शपथ लेते रहे हैं. संविधान में ऐसी कोई अनिवार्यता नहीं है. क़ानून सिर्फ़ इतना कहता है कि निर्वाचित प्रतिनिधि संविधान के प्रति निष्ठा की शपथ लें. किसी किताब के या बिना किसी प्रतीक के.
ममदानी ने इस खुलेपन का इस्तेमाल किया. इन्होंने परंपरा से हटकर कुरान को चुना. ऐसा कर वे उन गिने-चुने अमेरिकी जनप्रतिनिधियों में शामिल हो गए, जिन्होंने सार्वजनिक शपथ के दौरान इस्लामी धर्मग्रंथ का उपयोग किया है. लेकिन न्यूयॉर्क जैसे वैश्विक शहर में और मेयर पद के लिए यह पहली बार हुआ.
तीन कुरान, दो शपथ
ममदानी के शपथ ग्रहण को असाधारण बनाने वाली बात सिर्फ़ कुरान का इस्तेमाल नहीं था. बल्कि तीन अलग-अलग कुरानों का चयन भी था. हर एक कुरान के पीछे एक अलग इतिहास और अर्थ छुपा था. आधी रात को एक निजी समारोह में उन्होंने दो कुरानों पर शपथ ली. एक, उनके दादाजी की पुश्तैनी कुरान थी. यह परिवार, स्मृति और पीढ़ियों के संघर्ष का प्रतीक थी.
दूसरी, 18वीं सदी के अंत या 19वीं सदी की शुरुआत की एक ऐतिहासिक कुरान थी, जो न्यूयॉर्क पब्लिक लाइब्रेरी के शॉम्बर्ग सेंटर फॉर रिसर्च इन ब्लैक कल्चर के संग्रह से ली गई थी. वहीं, दिन में सिटी हॉल में हुए सार्वजनिक समारोह के लिए ममदानी ने परिवार की दो कुरानों (दादाजी और दादीजी की) को चुना. इससे यह संकेत गया कि सत्ता की इस नई यात्रा में निजी विरासत भी बराबर की हिस्सेदार है.
साधारण कुरान की असाधारण कहानी
शॉम्बर्ग सेंटर की कुरान किसी शाही खज़ाने जैसी नहीं दिखती. न सोने की सजावट, न जटिल नक्काशी. गहरे लाल रंग की जिल्द, साधारण फूलों का डिज़ाइन और साफ-सुथरी, पढ़ने लायक लिपि, यह कुरान आम पाठकों के लिए बनाई गई थी. यह अब प्रदर्शनी के लिए रखी गई है.
विशेषज्ञों का मानना है कि यह ओटोमन काल में पश्चिम एशिया के किसी हिस्से, आज के सीरिया, लेबनान, फिलिस्तीन या जॉर्डन, में लिखी गई होगी. इसमें न लेखक का नाम है, न तारीख. इसकी पहचान इसकी सादगी है.
न्यूयॉर्क पब्लिक लाइब्रेरी की क्यूरेटर हिबा आबिद के शब्दों में, ‘इस कुरान का महत्व इसकी विलासिता में नहीं, बल्कि इसकी सुलभता में है.’
आर्टुरो शोम्बर्ग और ब्लैक इतिहास
यह कुरान न्यूयॉर्क तक कैसे पहुंची, इसकी कहानी आर्टुरो शोम्बर्ग से जुड़ती है. प्यूर्टो रिकान मूल के अश्वेत लेखक, इतिहासकार और संग्रहकर्ता शोम्बर्ग ने अपना जीवन इस विचार के खिलाफ़ खड़ा किया कि अश्वेत लोगों का कोई इतिहास नहीं है.
उन्होंने हज़ारों किताबें, पांडुलिपियां और कलाकृतियां इकट्ठा कीं. उनमें यह कुरान भी शामिल थी. हालांकि शोम्बर्ग मुस्लिम नहीं थे, लेकिन उनके लिए इस्लाम अफ्रीकी और वैश्विक अश्वेत इतिहास का अहम हिस्सा था. 1926 में उन्होंने यह संग्रह न्यूयॉर्क पब्लिक लाइब्रेरी को सौंप दिया. यही आगे चलकर शॉम्बर्ग सेंटर बना. यह आज ब्लैक इतिहास के सबसे बड़े अभिलेखागारों में से एक है.
पहचान, आस्था और न्यूयॉर्क
ममदानी के लिए शॉम्बर्ग कुरान का चुनाव सिर्फ़ धार्मिक नहीं था. यह उनके अफ्रीकी जन्म, दक्षिण एशियाई विरासत और न्यूयॉर्क की बहु-सांस्कृतिक राजनीति, तीनों को जोड़ता है. उनकी पत्नी रमा दुवाजी (अमेरिकी-सीरियाई) और उनके वरिष्ठ सलाहकार ज़ारा रहीम ने क्यूरेटर हिबा आबिद के साथ मिलकर इसके चयन में भूमिका निभाई है.
कुरान की प्रदर्शनी
शपथ ग्रहण के बाद यह ऐतिहासिक कुरान पहली बार सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए रखी जा रही है. यह प्रदर्शनी शॉम्बर्ग सेंटर की 100वीं वर्षगांठ के मौके पर लगाई जाएगी. यह सिर्फ़ एक प्रदर्शनी नहीं, बल्कि एक राजनीतिक और सांस्कृतिक वक्तव्य है कि न्यूयॉर्क की सत्ता की कहानी अब एकरंगी नहीं रही. ज़ोहरान ममदानी की शपथ यह बताती है कि अमेरिका की राजनीति में पहचान अब हाशिये पर नहीं, बल्कि मंच के केंद्र में खड़ी है. वह भी पूरे आत्मविश्वास के साथ.















