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New START Treaty Expiry: क्या दुनिया फिर परमाणु शीत युद्ध की ओर लौट रही है?
Authored By: गुंजन शांडिल्य
Published On: Thursday, January 8, 2026
Last Updated On: Thursday, January 8, 2026
शीत युद्ध के दौरान भी वाशिंगटन और मॉस्को इस बात पर सहमत थे कि परमाणु हथियारों की अंधी दौड़ दुनिया को विनाश की ओर ले जा सकती है. तब दोनों देशों के बीच परमाणु हथियारों की अंधी दौड़ को नियंत्रित करने के लिए कई संधियां हुईं. उनमें से एक New START फरवरी के पहले सप्ताह खत्म होने वाला है. इससे वैश्विक सुरक्षा फिर से खतरे में पड़ गई है.
Authored By: गुंजन शांडिल्य
Last Updated On: Thursday, January 8, 2026
New START Treaty Expiry: जब शीत युद्ध अपने चरम पर था, तब भी वाशिंगटन (अमेरिका) और मॉस्को (रूस) इस बात पर सहमत थे कि परमाणु हथियारों की अंधी दौड़ दुनिया को विनाश की ओर ले जा सकती है. इसी समझ से दोनों देशों के बीच SALT, START और अंततः New START जैसी संधियां हुईं. इनका मकसद था, परमाणु ताकत को पूरी तरह खत्म करना नहीं, बल्कि उसे अनुमेय और नियंत्रित बनाए रखना था.
नई सामरिक शस्त्र न्यूनीकरण संधि (Strategic Arms Reduction Treaty- START) यानी NEW START 2010 में लागू हुई थी. यह संधि दोनों देशों को तैनात रणनीतिक परमाणु वॉरहेड की संख्या 1,550 तक सीमित करती है. साथ ही अमेरिका और रूस को निरीक्षण की पारदर्शी व्यवस्था देती है. यह संधि 5 फरवरी को समाप्त होने जा रही है. इसके बाद क्या होगा, यह सवाल वैश्विक सुरक्षा के केंद्र में आ गया है.
यूक्रेन युद्ध और टूटी बातचीत
यूक्रेन में जारी युद्ध ने अमेरिका-रूस संबंधों को शीत युद्ध के बाद के सबसे निचले स्तर पर पहुंचा दिया है. इसी टकराव के कारण दोनों देशों के बीच New START के उत्तराधिकारी पर कोई औपचारिक बातचीत नहीं हो सकी है.
रूस ने 2023 से आपसी निरीक्षण को भी रोक दिया है. इससे अमेरिका-रूस के बीच अविश्वास की खाई और बढ़ गई है. अमेरिका को यह भरोसा नहीं रह गया कि मॉस्को संधि का पालन पूरी तरह कर रहा है. यह अविश्वास ही हथियार नियंत्रण की सबसे बड़ी बाधा बन चुका है.
पुतिन के प्रस्ताव पर ट्रंप की चुप्पी
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने हाल में अमेरिका को प्रस्ताव दिया है कि दोनों देश 12 महीनों के लिए New START की सीमाओं का पालन जारी रखें. यह एक अस्थायी संधि हो सकता है, ताकि भविष्य की किसी संधि पर सोचने का समय मिल सके।
हालांकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस पर अभी तक कोई औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है. इस मसले पर पश्चिमी विश्लेषक भी बंटे हुए हैं. कुछ इसे जोखिम कम करने का व्यावहारिक रास्ता मानते हैं, तो कुछ का कहना है कि इससे रूस को संधि के दायरे से बाहर नई हथियार प्रणालियां, जैसे ब्यूरेवेस्तनिक क्रूज़ मिसाइल और पोसाइडन परमाणु टॉरपीडो विकसित करने की खुली छूट मिल जाएगी.
- New START परमाणु संधि 5 फरवरी को खत्म होने वाली है.
- पुतिन ने वॉरहेड की सीमा बढ़ाने का प्रस्ताव दिया है, लेकिन ट्रंप ने अभी तक उसका कोई जवाब नहीं दिया.
- चीन का बढ़ता हथियारों का जखीरा वाशिंगटन के लिए चिंता का विषय है.
- विशेषज्ञों का कहना है कि परमाणु हथियारों का जोखिम कम करने के कदम आगे का रास्ता दिखा सकते हैं.
चीन भी फैक्टर
आज वैश्विक परमाणु संतुलन सिर्फ अमेरिका और रूस तक सीमित नहीं है. फेडरेशन ऑफ अमेरिकन साइंटिस्ट्स के अनुसार, अमेरिका और रूस के पास दुनिया के लगभग 87 प्रतिशत परमाणु वॉरहेड हैं. इन दोनों के बाद चीन तेजी से तीसरा बड़ा खिलाड़ी बन रहा है. उसके पास करीब 600 वॉरहेड हैं. वर्ष 2030 तक चीन में यह संख्या 1,000 से अधिक होने का अनुमान है.
ट्रंप तीन-तरफ़ा (अमेरिका, रूस और चीन) परमाणु बातचीत की बात करते हैं, लेकिन बीजिंग इसे ‘अतार्किक’ बताकर खारिज करता है. उधर रूस चाहता है कि ब्रिटेन और फ्रांस की परमाणु सेनाएं भी चर्चा में आएं. यूरोपीय देश भी इसे साफ़ तौर पर नकारते रहे हैं. यह सब उलझन ही मिलकर किसी नई बहुपक्षीय संधि को लगभग असंभव बना देता है.
जोखिम कम करने पर हो जोर
पूर्व रूसी हथियार वार्ताकार निकोलाई सोकोव के अनुसार, इस माहौल में नई व्यापक संधि की कोशिश ‘लगभग डेड एंड’ है. उनका तर्क व्यावहारिक है. कहा जाता है कि जब देशों में आपसी भरोसा नहीं है, तो पहले जोखिम घटाने पर ध्यान देना चाहिए.
बताया जाता है कि आज भी केवल अमेरिका और रूस के पास 24/7 न्यूक्लियर हॉटलाइन है. यूरोप की किसी राजधानी या NATO मुख्यालय के पास मॉस्को से सीधी संकट-कालीन लाइन नहीं है. यह स्थिति किसी गलतफहमी को सीधे परमाणु संकट में बदल सकती है.
आगे क्या?
कई परमाणु विशेषज्ञ मानते हैं कि New START का खत्म होना, सिर्फ एक संधि का अंत नहीं है. इससे परमाणु स्थिरता के आख़िरी स्तंभ कमजोर पड़ना है. उनके मुताबिक आदर्श स्थिति यह होना चाहिए कि अमेरिका और रूस को नई संधि पर काम शुरू करना चाहिए. पर मौजूदा राजनीतिक माहौल में यह अवास्तविक लग रहा है.
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