Special Coverage
ट्रंप की पार्टी की हार से इजराइल में क्यों बढ़ी चिंता? नेतन्याहू की बढ़ सकती हैं मुश्किलें
Authored By: Mazhar Pathan
Published On: Thursday, November 5, 2026
Last Updated On: Thursday, November 5, 2026
अमेरिका के मिडटर्म चुनाव में डेमोक्रेट्स की जीत का असर अब इजराइल में भी दिखाई देने लगा है. वहां इस बात पर चर्चा हो रही है कि ट्रंप के साथ नेतन्याहू की नजदीकी और अमेरिकी मदद पर इसका क्या असर पड़ेगा. अमेरिका में हुए मिडटर्म चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप की पार्टी को बड़ा झटका लगा है. डेमोक्रेट्स ने सीनेट और प्रतिनिधि सभा, दोनों में जीत दर्ज की है. चुनाव के नतीजों के बाद इजराइल में भी इसे लेकर चर्चा शुरू हो गई है. इजराइली मीडिया में सवाल उठ रहे हैं कि क्या अमेरिका में सत्ता का यह नया समीकरण प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के लिए परेशानी खड़ी कर सकता है? सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की है कि इजराइल को मिलने वाली अमेरिकी सैन्य मदद और राजनीतिक समर्थन का भविष्य क्या होगा.
Authored By: Mazhar Pathan
Last Updated On: Thursday, November 5, 2026
अमेरिका लंबे समय से इजराइल का मजबूत सहयोगी रहा है. जरूरत पड़ने पर उसने सैन्य मदद भी दी है और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी इजराइल का साथ दिया है. ऐसे में अमेरिकी संसद में डेमोक्रेट्स की जीत को इजराइल के लिए अहम माना जा रहा है.
रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, अब इजराइल को दी जाने वाली सैन्य मदद और वेस्ट बैंक में यहूदी बस्तियों के मुद्दे पर अमेरिकी संसद में ज्यादा सवाल उठ सकते हैं. हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि अमेरिका अपनी नीति तुरंत बदल देगा. राष्ट्रपति के पास किसी फैसले को वीटो करने का अधिकार भी है. नई कांग्रेस जनवरी 2027 से काम शुरू करेगी.
अल-सैयद की जीत चर्चा में
मिशिगन से अब्दुल अल-सैयद की जीत भी इस चुनाव की बड़ी खबर है. उन्होंने रिपब्लिकन उम्मीदवार माइक रोजर्स को हराया है. इस जीत के बाद वह अमेरिकी सीनेट पहुंचने वाले पहले मुस्लिम सदस्य बनेंगे.
अल-सैयद पहले भी इजराइल को अमेरिकी मदद दिए जाने पर सवाल उठाते रहे हैं. वह इजराइल को हथियार बेचने और सैन्य सहायता जारी रखने के मुद्दे पर अपना विरोध जता चुके हैं. उनकी जीत को इसलिए भी अहम माना जा रहा है, क्योंकि डेमोक्रेटिक पार्टी में कई नेता ऐसे हैं जो इजराइल को दी जाने वाली अमेरिकी मदद की समीक्षा चाहते हैं.
AIPAC के खर्च पर चर्चा
इस चुनाव में इजराइल समर्थक संगठन AIPAC की भूमिका भी चर्चा में रही. वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, मिशिगन के डेमोक्रेटिक प्राइमरी चुनाव में AIPAC ने हैली स्टीवंस के समर्थन में 3 करोड़ डॉलर से ज्यादा खर्च किए थे. स्टीवंस का मुकाबला अब्दुल अल-सैयद से था.
इसके अलावा, माइक रोजर्स का समर्थन करने वाले एक समूह के लिए AIPAC से जुड़े सुपर PAC ने करीब 90 लाख डॉलर खर्च किए. ध्यान देने वाली बात यह है कि यह रकम सीधे AIPAC ने खर्च नहीं की थी, बल्कि उससे जुड़े राजनीतिक समूह के जरिए खर्च हुई थी.
AIPAC ने सीधे उम्मीदवारों को समर्थन देने और PAC के जरिए चंदा देने का तरीका बदलने की बात कही थी. हालांकि, उससे जुड़े सुपर PAC की चुनावी गतिविधियां जारी रहीं.
नेतन्याहू की बढ़ी मुश्किल
इजराइल में चिंता की एक बड़ी वजह प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और डोनाल्ड ट्रंप के करीबी रिश्ते भी हैं. नेतन्याहू ने ट्रंप और रिपब्लिकन नेतृत्व के साथ अपने संबंधों को मजबूत रखा है. लेकिन अब अमेरिकी संसद में डेमोक्रेट्स की स्थिति मजबूत होने से इजराइल को लेकर वहां बहस का रुख बदल सकता है.
इजराइल के कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नेतन्याहू ने अमेरिकी समर्थन को रिपब्लिकन पार्टी के साथ अपने रिश्तों पर जरूरत से ज्यादा निर्भर कर दिया. ऐसे में डेमोक्रेट्स की जीत उनके लिए राजनीतिक चुनौती बन सकती है. हालांकि, इसे पूरे अमेरिकी राजनीतिक वर्ग के इजराइल-विरोधी होने के तौर पर देखना सही नहीं होगा. अमेरिका में इजराइल के समर्थन को लेकर दोनों पार्टियों के भीतर अलग-अलग विचार मौजूद हैं.
ट्रंप का बड़ा ऐलान
चुनाव के बाद अमेरिकी सैन्य सहायता को लेकर ट्रंप का बयान भी चर्चा में है. ट्रंप ने कहा है कि इजराइल को दी जाने वाली सालाना सुरक्षा सहायता इस साल के अंत तक खत्म हो सकती है. लेकिन इस बयान को लागू हो चुका फैसला नहीं माना जा सकता.
अमेरिका और इजराइल के बीच मौजूदा सैन्य सहायता समझौता 2028 तक जारी है. इसलिए सहायता रोकने के लिए क्या कानूनी और प्रशासनिक कदम उठाए जाएंगे, यह अभी स्पष्ट नहीं है. इस मुद्दे पर अंतिम स्थिति सामने आने तक ट्रंप के बयान को एक राजनीतिक घोषणा के तौर पर ही देखना चाहिए.
सैन्य मदद पर संकट?
अमेरिका की सैन्य सहायता इजराइल की सुरक्षा व्यवस्था का अहम हिस्सा है. इसमें हथियारों की खरीद, रक्षा सहयोग और कई रणनीतिक कार्यक्रम शामिल हैं. इसलिए अमेरिकी समर्थन में किसी भी संभावित बदलाव को इजराइल गंभीरता से देख रहा है.
इजराइल के पूर्व राजनयिकों और विश्लेषकों ने आशंका जताई है कि अगर अमेरिका का समर्थन कमजोर होता है तो हथियारों की आपूर्ति, खुफिया जानकारी साझा करने और आयरन डोम जैसे रक्षा कार्यक्रमों पर असर पड़ सकता है. लेकिन फिलहाल इन सहयोगों को बंद करने का कोई पक्का फैसला सामने नहीं आया है. ये संभावित जोखिम हैं, न कि लागू हो चुके सरकारी निर्णय.
बदलते रिश्तों की आहट
अमेरिकी चुनाव में महंगाई, पेट्रोल की कीमतें और ईरान के साथ युद्ध जैसे मुद्दे भी मतदाताओं के लिए अहम रहे. रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, कुछ मतदाताओं ने युद्ध की आर्थिक लागत को लेकर ट्रंप प्रशासन पर सवाल उठाए. इससे साफ है कि चुनावी नतीजों को केवल इजराइल नीति के नजरिए से नहीं समझा जा सकता. घरेलू अर्थव्यवस्था और विदेश नीति, दोनों ने मतदाताओं के फैसले को प्रभावित किया.
इजराइल के लिए यह बदलाव ऐसे समय आया है, जब नेतन्याहू पहले से ही घरेलू राजनीतिक चुनौतियों का सामना कर रहे हैं. 27 अक्टूबर को हुए इजराइली चुनाव के बाद उनकी सरकार ने संसदीय बहुमत खो दिया है और नई सरकार बनाने को लेकर बातचीत जारी है. ऐसे में अमेरिका में बदला राजनीतिक समीकरण उनके लिए एक अतिरिक्त चुनौती बन सकता है.
आगे की राह मुश्किल?
अमेरिकी मिडटर्म चुनाव के नतीजे इजराइल-अमेरिका संबंधों में तत्काल बदलाव की गारंटी नहीं देते, लेकिन यह जरूर संकेत देते हैं कि इजराइल को लेकर अमेरिकी राजनीति में बहस तेज हो सकती है. डेमोक्रेट्स की जीत के बाद सैन्य सहायता, हथियारों की बिक्री और वेस्ट बैंक की नीतियों पर ज्यादा सवाल उठने की संभावना है.
नेतन्याहू के सामने अब चुनौती यह होगी कि वे अमेरिकी राजनीति में दोनों दलों के साथ मजबूत रिश्ते बनाए रखें. आने वाले महीनों में यह देखना अहम होगा कि नई कांग्रेस इजराइल को लेकर किस तरह का रुख अपनाती है और ट्रंप प्रशासन की सैन्य सहायता संबंधी घोषणा पर क्या कदम उठाए जाते हैं.













