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देशव्यापी एवं हिंसक आंदोलन की आग में भी क्यों नहीं पिघला ईरान का खामेनेई शासन?
Authored By: गुंजन शांडिल्य
Published On: Wednesday, January 14, 2026
Last Updated On: Wednesday, January 14, 2026
एक पखवाड़े से अधिक समय से जारी हिंसक आंदोलन के बाद भी ईरान में खामेनेई सत्ता कायम है. ईरान में आज सवाल यह नहीं है कि खामेनेई शासन गिरेगा या नहीं. सवाल यह है कि वर्तमान शासन कब और किस कीमत पर बदलेगा. अनिश्चितता इस्लामिक रिपब्लिक की सबसे बड़ी कमजोरी बनती जा रही है.
Authored By: गुंजन शांडिल्य
Last Updated On: Wednesday, January 14, 2026
Iran Regime Resilience: ईरान एक बार फिर इतिहास के निर्णायक मोड़ पर खड़ा दिखता है. दिसंबर के अंत से बिगड़ती अर्थव्यवस्था और महंगाई के खिलाफ शुरू हुए देशव्यापी आंदोलन जल्द ही 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद से स्थापित धार्मिक शासन की वैधता को सीधे चुनौती देना शुरू कर दिया. सैकड़ों मौतें, हजारों गिरफ्तारियां, अंतरराष्ट्रीय दबाव और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की खुली धमकियों के बावजूद तेहरान की सत्ता अब तक स्थिर है. सवाल यही है कि इतनी तीव्र अस्थिरता के बावजूद यह शासन क्यों कायम है?
सुरक्षा तंत्र की अभेद्य दीवार
ईरान के धार्मिक शासन की सबसे बड़ी ताकत उसका बहुस्तरीय सुरक्षा ढांचा है. इसे अक्सर ‘डीप स्टेट’ कहा जाता है. इस ढांचे की रीढ़ इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) और बासिज अर्धसैनिक बल है. इनकी संयुक्त संख्या लगभग दस लाख मानी जाती है.
ये बल केवल कानून-व्यवस्था संभालने वाली इकाइयां नहीं हैं, बल्कि वैचारिक रूप से इस्लामिक रिपब्लिक के प्रति गहराई से जुड़े भी हुए हैं. उन्हें शासन के पतन में नहीं, बल्कि उसके अस्तित्व में अपना भविष्य दिखता है. जब तक ऐसे सुरक्षा बल संगठित, अनुशासित और नेतृत्व के प्रति वफादार रहते हैं, तब तक सड़कों पर उमड़ता जनाक्रोश सत्ता के केंद्र तक नहीं पहुंच पाता.
शीर्ष नेतृत्व में दरार का अभाव
इतिहास बताता है कि किसी भी बड़े विद्रोह की सफलता तभी संभव होती है, जब सत्ता के भीतर से टूटना शुरू हो जाए. ईरान के मामले में सत्ता में बैठे लोगों में मतभेद अभी तक नहीं उभरा है. सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई, उम्र और स्वास्थ्य संबंधी सवालों के बावजूद सत्ता के केंद्र में मजबूती से बने हुए हैं.
राजनीतिक, सैन्य और धार्मिक प्रतिष्ठान के शीर्ष स्तर पर अब तक किसी बड़े दलबदल या विद्रोह के संकेत नहीं दिख रहे हैं. उलटे, सत्ता का स्पष्ट संदेश है कि जो वफादार रहेगा, वही सुरक्षित रहेगा. यह संदेश तंत्र के भीतर भय और अनुशासन दोनों बनाए रखता है.
- ईरान के धार्मिक शासन की सबसे बड़ी ताकत उसका बहुस्तरीय सुरक्षा ढांचा है.
- अधिकारी का कहना है कि विरोध प्रदर्शनों में लगभग 2,000 लोग मारे गए हैं.
- ईरान मामलों के विशेषज्ञों का कहना है कि ट्रंप की धमकियों से खतरा बढ़ गया है, लेकिन अभी तक शासन के शीर्ष स्तर पर कोई दरार नहीं आई है.
- 90 मिलियन की आबादी वाला ईरान न केवल बड़ा देश है, बल्कि जातीय, धार्मिक और सामाजिक रूप से भी अत्यंत जटिल है.
विरोध में निरंतरता की कमी
ईरान में विरोध प्रदर्शन अचानक तीखे और व्यापक जरूर रहे हैं, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार इनमें एक समस्या है. इस प्रदर्शन में लंबे समय तक एकजुट दबाव बनाए रखने की क्षमता नदारद है. सड़कों पर लाखों लोगों का उतरना शासन को हिला तो सकता है, पर उसे गिराने के लिए निरंतर, संगठित और महीनों तक चलने वाला आंदोलन चाहिए.
इसके अलावा, विरोध प्रदर्शनों का कोई एकीकृत नेतृत्व या स्पष्ट राजनीतिक विकल्प उभरकर सामने नहीं आया है. सत्ता के विकल्प के बिना, आंदोलन अक्सर दमन और थकान का शिकार हो जाते हैं.
राष्ट्रवाद बनाम विदेशी दबाव
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की सैन्य धमकियों और संभावित हस्तक्षेप की चर्चाओं ने स्थिति को और जटिल बना दिया है. विडंबना यह है कि बाहरी दबाव कई बार धार्मिक शासन के लिए राहत का काम करता है.
ईरान का नेतृत्व विदेशी खतरे को ‘राष्ट्रीय संप्रभुता’ और ‘क्रांति की रक्षा’ के विमर्श में बदल देता है. इससे वह असंतोष को देशद्रोह या विदेशी साजिश के रूप में पेश करता है. नतीजतन, समाज का एक हिस्सा शासन से असंतुष्ट भी है, लेकिन विदेशी हस्तक्षेप के डर से सत्ता के खिलाफ खुलकर खड़ा नहीं होता.
भय का मनोवैज्ञानिक प्रभाव
एक ईरानी अधिकारी ने लगभग 2,000 मौतों का दावा किया है. वहीं मानवाधिकार समूह सैकड़ों मौतों की पुष्टि करते हैं. वास्तविक संख्या चाहे जो हो, हिंसा का स्तर अपने आप में एक संदेश है.
यह दमन केवल शारीरिक नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक भी है. गिरफ्तारियां, फांसी की धमकियां, इंटरनेट बंदी और निगरानी सभी समाज में डर पैदा करते हैं. यह विरोध को लंबे समय तक टिकने नहीं देती.
भौगोलिक और सामाजिक जटिलता
90 मिलियन की आबादी वाला ईरान न केवल बड़ा देश है, बल्कि जातीय, धार्मिक और सामाजिक रूप से भी अत्यंत जटिल है. फारसी बहुल केंद्र, कुर्द, बलूच और अरब अल्पसंख्यक क्षेत्रों के आंदोलन आपस में पूरी तरह समन्वित नहीं हैं.
यह असमानता भी शासन के पक्ष में जाती है, क्योंकि वह अलग-अलग क्षेत्रों में अलग रणनीति अपनाकर विरोध को बिखेर देता है.
धार्मिक शासन पर दबाव
धार्मिक शासन अब तक टिका हुआ है. कई विशेषज्ञ मानते हैं कि इसका अर्थ स्थिरता नहीं है. आर्थिक प्रतिबंधों से जकड़ी अर्थव्यवस्था, कमजोर होता क्षेत्रीय प्रभाव, परमाणु कार्यक्रम पर बढ़ता दबाव और वैधता का संकट, ये सभी संकेत देते हैं कि यह सत्ता चल तो रही है पर आगे बढ़ नहीं पा रही है.
विश्लेषकों के मुताबिक, ईरान अभी ‘पतन’ की ओर नहीं बढ़ा है, लेकिन वह उस दिशा में बढ़ने से बहुत दूर भी नहीं है.
शक्ति है, समाधान नहीं
ईरान का धार्मिक शासन अभी भी इसलिए कायम है क्योंकि उसके पास वर्तमान में संगठित बल, वफादार सुरक्षा तंत्र और सत्ता के भीतर एकता है. लेकिन जिस समाज में उम्मीद, वैधता और आर्थिक भविष्य का भरोसा टूट चुका हो, वहां केवल बल के सहारे शासन लंबे समय तक स्थिर नहीं रह सकता.
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