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बांग्लादेश चुनाव 2026: कितने हिंदू उम्मीदवार जीते, किस पार्टी पर जताया अल्पसंख्यक मतदाताओं ने भरोसा
Authored By: Nishant Singh
Published On: Saturday, February 14, 2026
Last Updated On: Saturday, February 14, 2026
बांग्लादेश के 13वें संसदीय चुनाव में अल्पसंख्यक राजनीति ने नया मोड़ लिया. चार हिंदू उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की, जिनमें अधिकांश बांग्लादेश राष्ट्रवादी पार्टी से जुड़े रहे. वहीं जमात-ए-इस्लामी का हिंदू उम्मीदवार हार गया. यह नतीजे बताते हैं कि अल्पसंख्यक मतदाताओं ने इस बार भरोसा और नेतृत्व दोनों बदले हैं.
Authored By: Nishant Singh
Last Updated On: Saturday, February 14, 2026
Bangladesh Election 2026: बांग्लादेश के 13वें संसदीय चुनाव सिर्फ सत्ता परिवर्तन की कहानी नहीं हैं, बल्कि यह चुनाव देश में अल्पसंख्यकों, खासकर हिंदू समुदाय की राजनीतिक भागीदारी को लेकर भी बेहद अहम माना जा रहा है. हाल के वर्षों में सांप्रदायिक तनाव, हिंसा और अल्पसंख्यकों पर हमलों की खबरों के बीच यह सवाल बार-बार उठता रहा कि क्या चुनावी राजनीति में उन्हें सही प्रतिनिधित्व मिल पा रहा है. ऐसे माहौल में इस बार चुनावी नतीजों ने कई अहम संकेत दिए हैं.
कितने हिंदू उम्मीदवारों ने दर्ज की जीत?
इस चुनाव में कुल चार हिंदू उम्मीदवारों ने जीत हासिल की, जिनमें से तीन बांग्लादेश राष्ट्रवादी पार्टी और एक निर्दलीय समर्थित बीएनपी उम्मीदवार शामिल हैं. खास बात यह है कि सभी विजयी हिंदू उम्मीदवारों का नाता बांग्लादेश राष्ट्रवादी पार्टी से रहा, जबकि जमात-ए-इस्लामी की ओर से उतारा गया इकलौता हिंदू उम्मीदवार चुनाव हार गया. इससे साफ संकेत मिलता है कि इस बार अल्पसंख्यक मतदाताओं ने बीएनपी पर ज्यादा भरोसा जताया.
बीएनपी की बड़ी जीत और सीटों का गणित
299 सीटों वाली बांग्लादेश संसद में बीएनपी ने 211 सीटों पर शानदार जीत दर्ज की. वहीं जमात-ए-इस्लामी सिर्फ 68 सीटों तक सिमट गई. यह परिणाम न सिर्फ सत्ता संतुलन को दर्शाता है, बल्कि यह भी बताता है कि अल्पसंख्यक आबादी वाले इलाकों में बीएनपी की पकड़ कितनी मजबूत रही. खासकर हिंदू बहुल और मिश्रित आबादी वाले क्षेत्रों में पार्टी का प्रदर्शन चौंकाने वाला रहा.
गायेश्वर चंद्र रॉय: संघर्ष और भरोसे की जीत
ढाका-3 सीट से बीएनपी के वरिष्ठ नेता गायेश्वर चंद्र रॉय ने 99,163 वोट हासिल कर जमात उम्मीदवार मोहम्मद शाहिनुर इस्लाम को हराया. यह सीट जिंजीरा, आगानगर, तेघरिया और केरानीगंज के इलाकों को कवर करती है. हाल के वर्षों में हिंदू समुदाय पर हुए हमलों की पृष्ठभूमि में उनकी जीत को “विश्वास की जीत” माना जा रहा है. रॉय पहले भी राज्य मंत्री रह चुके हैं और अल्पसंख्यक राजनीति में एक मजबूत चेहरा हैं.
निताई रॉय चौधरी: अल्पसंख्यक इलाकों में बीएनपी का चेहरा
मागुरा-2 सीट से बीएनपी उपाध्यक्ष निताई रॉय चौधरी ने 1,47,896 वोटों के साथ आसान जीत दर्ज की. उन्होंने जमात उम्मीदवार मुस्तर्शीद बिल्लाह को बड़े अंतर से हराया. चौधरी को बीएनपी के भीतर अल्पसंख्यक समुदाय का प्रभावशाली नेता माना जाता है. उनकी जीत यह साबित करती है कि पार्टी ने जमीनी स्तर पर अल्पसंख्यक वोटरों से मजबूत जुड़ाव बनाया.
दिपेन दीवान और साचिंग प्रू: पहाड़ी और सीमावर्ती इलाकों की आवाज
रंगामती सीट से अधिवक्ता दिपेन दीवान ने 31,222 वोटों के साथ जीत हासिल की, जबकि बंदरबन से साचिंग प्रू को 1,41,455 वोट मिले. पहाड़ी और आदिवासी क्षेत्रों में इन नेताओं की जीत बताती है कि बीएनपी ने सिर्फ शहरी नहीं, बल्कि दूरदराज़ और संवेदनशील इलाकों में भी भरोसा कायम किया.
जमात का हिंदू उम्मीदवार क्यों हारा?
खुलना-1 सीट से जमात गठबंधन के हिंदू उम्मीदवार कृष्ण नंदी को 70,346 वोट मिले, लेकिन वे जीत दर्ज नहीं कर सके. यह साफ संकेत है कि अल्पसंख्यक मतदाताओं ने इस बार जमात की राजनीति पर भरोसा नहीं जताया. नतीजतन, जमात की ओर से नामांकित कोई भी अल्पसंख्यक उम्मीदवार संसद तक नहीं पहुंच सका.
निष्कर्ष: राजनीति में उम्मीद की नई तस्वीर
बांग्लादेश के इस चुनाव ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अल्पसंख्यक समुदाय अब सिर्फ प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व नहीं, बल्कि मजबूत और प्रभावी नेतृत्व चाहता है. हिंदू उम्मीदवारों की जीत, खासकर बीएनपी के टिकट पर, आने वाले समय में देश की राजनीति और सामाजिक संतुलन को नई दिशा दे सकती है.















