सोनम वांगचुक के स्कूल पर संकट, जमीन की लड़ाई में बच्चों की पढ़ाई क्यों फंसी?

Authored By: Mazhar Pathan

Published On: Friday, November 6, 2026

Last Updated On: Friday, November 6, 2026

सोनम वांगचुक और लद्दाख के फ्यांग में स्थित डेजर्ट फ्लावर स्कूल से जुड़ा जमीन विवाद
सोनम वांगचुक और लद्दाख के फ्यांग में स्थित डेजर्ट फ्लावर स्कूल से जुड़ा जमीन विवाद

लद्दाख़ प्रशासन ने सोनम वांगचुक की पत्नी गीतांजलि आंगमो को नोटिस भेजकर डेज़र्ट फ्लावर स्कूल में गतिविधियां रोकने को कहा है। आंगमो इसे दबाव बनाने की कोशिश बताती हैं, जबकि प्रशासन का अपना तर्क है। आइए जानते हैं ज़मीन से लीज़ तक क्या है पूरा मामला।

Authored By: Mazhar Pathan

Last Updated On: Friday, November 6, 2026

लद्दाख में शिक्षा सुधारों और SECMOL की स्थापना करने वाले क्रांतिकारी शिक्षाविद सोनम वांगचुक का एक स्कूल इन दिनों विवाद में घिर गया है। उनकी पत्नी गीतांजलि आंगमो का आरोप है कि प्रशासन सामाजिक और पर्यावरण के काम की वजह से उन दोनों को निशाना बना रहा है। वांगचुक का कहना है कि लद्दाख़ के उपराज्यपाल उनका स्कूल बंद कराना चाहते हैं। प्रशासन का कहना है कि उसने नियमों और अदालत में चल रहे मामले को देखकर कदम उठाया है।

क्या है नोटिस?

1 नवंबर को लेह के राजस्व विभाग ने गीतांजलि आंगमो को एक नोटिस भेजा। इसमें लेह के ऊंचाई वाले इलाक़े फ्यांग में बने ‘डेज़र्ट फ्लावर’ स्कूल में गतिविधियां शुरू करने पर रोक लगाने को कहा गया है। नोटिस के मुताबिक स्कूल में ज़रूरी मंज़ूरी और सहमति लिए बिना कामकाज शुरू कर दिया गया। दूसरी रिपोर्टों के अनुसार प्रशासन ने यह भी कहा है कि हाई कोर्ट का फ़ैसला आने तक यथास्थिति बनी रहे, ताकि अदालत में चल रहे मामले पर असर न पड़े।

यह स्कूल हिमालयन इंस्टीट्यूट ऑफ अल्टरनेटिव्स लद्दाख़ (एचआईएएल) के परिसर में चलता है। संस्थान शिक्षा के वैकल्पिक तरीक़ों पर काम करता है और ट्रस्ट के रूप में पंजीकृत है। स्कूल की वेबसाइट के अनुसार आंगमो इसकी संस्थापक निदेशक हैं और वांगचुक चार निदेशकों में से एक।

आंगमो का कहना क्या है?

आंगमो के मुताबिक स्कूल के सारे ज़रूरी दस्तावेज़ पूरे हैं और सोमवार को पहली बार कक्षाएं शुरू हुई थीं। उन्होंने एक मीडिया संसथान से बात चीत में कहा कि नोटिस के ज़रिए दबाव बनाया जा रहा है, ताकि वे उन मुद्दों पर आवाज़ न उठाएं जिन्हें वे सही मानती हैं। उन्होंने नोटिस का जवाब दे दिया है और कहा है कि वे इसका विरोध करेंगी। उनका यह भी आरोप है कि सरकार लोगों की चिंताओं के प्रति संवेदनहीन हो चुकी है और मुनाफ़े और औद्योगीकरण को सबसे ऊपर रखती है।

क्या है ज़मीन और लीज़ का मामला

दस्तावेज़ों के मुताबिक 2018 में, जब लद्दाख़ जम्मू-कश्मीर राज्य का हिस्सा था, लेह के डिप्टी कमिश्नर ने एचआईएएल को 1,076 कनाल ज़मीन 40 साल की लीज़ पर देने की मंज़ूरी दी थी। लेकिन इसके लिए लीज़ समझौते पर हस्ताक्षर नहीं हुए। पिछले साल 21 अगस्त को प्रशासन ने ज़मीन देने का आदेश रद्द कर दिया।

वांगचुक और आंगमो ने इसे ‘राजनीतिक बदले की कार्रवाई’ बताया और जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट में याचिका डाली। यह मामला अभी अदालत में है। इस साल 11 सितंबर को अदालत ने प्रशासन से कहा कि याचिका में शामिल ज़मीन पर किसी तीसरे पक्ष को कोई अधिकार न दिया जाए।

प्रशासन का तर्क

हाई कोर्ट में प्रशासन ने कहा कि ज़मीन कुछ शर्तों के साथ दी गई थी, जिनका पालन नहीं हुआ। इनमें किराया देना भी शामिल था। प्रशासन का यह भी कहना है कि जिस काम के लिए ज़मीन मिली थी, उसके लिए उसका इस्तेमाल नहीं हुआ और वहां विश्वविद्यालय शुरू होने का कोई सबूत नहीं है।

प्रशासन ने वांगचुक पर कुछ आरोप भी लगाए हैं। उसके मुताबिक जब भी उनसे जवाब मांगा जाता है, वे प्रशासन के ख़िलाफ़ ग़लत और भड़काऊ प्रचार करते हैं, निर्वाचित परिषद और अधिकारियों को धमकाते हैं और कर्मचारियों व छात्रों को आंदोलन के लिए उकसाते हैं। ये प्रशासन के आरोप हैं, और इन पर अदालत का फ़ैसला आना बाकी है।

आंगमो का जवाब: कोर्ट ने रोक नहीं लगाई

3 नवंबर को नोटिस के जवाब में आंगमो ने कहा कि अदालत ने सिर्फ़ यह निर्देश दिया है कि ज़मीन पर कोई तीसरा पक्ष अधिकार न बनाए। उनके मुताबिक अदालत ने स्कूल के कामकाज पर रोक लगाने का आदेश कहीं नहीं दिया, और प्रशासन आदेश की ग़लत व्याख्या कर रहा है।

उन्होंने अदालत को बताया कि एचआईएएल ने 20 मई 2018 को लीज़ के लिए आवेदन दिया था और मार्च 2020 में प्रशासन को फिर याद दिलाया। उन्होंने 14 मार्च 2020 के एक सरकारी पत्र का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि नई लीज़ नीति तय न होने के कारण समझौता नहीं हो सकता। दस्तावेज़ यह भी बताते हैं कि समझौता न होने पर भी प्रशासन ने वहां निर्माण जारी रखने के लिए प्रोत्साहित किया था।

आंदोलन से जुड़ा बड़ा संदर्भ

वांगचुक लेह एपेक्स बॉडी के सदस्य हैं। यह संगठन कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस के साथ मिलकर लद्दाख़ को पूर्ण राज्य का दर्जा देने और छठी अनुसूची में शामिल करने की मांग कर रहा है। 2023 में केंद्र सरकार ने एक हाई पावर्ड कमिटी बनाई थी और तब से गृह मंत्रालय के साथ कई दौर की बातचीत हो चुकी है।

लेह एपेक्स बॉडी के सह-अध्यक्ष चेरिंग दोरजे लकरुक का आरोप है कि वांगचुक को लोगों के अधिकारों की बात उठाने की सज़ा मिल रही है। उनका सवाल है कि ग़रीब और वंचित बच्चों को पढ़ाने वाले स्कूल के खुलने पर सरकार को क्या आपत्ति हो सकती है।

About the Author: Mazhar Pathan
मैं पिछले 6 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हूं। इस दौरान न्यूज़ रूम से लेकर ज़मीनी स्तर तक पत्रकारिता के विभिन्न आयामों में काम करने का अनुभव हासिल किया है। ऑफिस में वीडियो एंकरिंग से लेकर फील्ड में ग्राउंड रिपोर्टिंग तक, मैंने अलग-अलग विषयों और मुद्दों पर काम किया है। सामाजिक, राजनीतिक, समसामयिक और जनहित से जुड़े विषयों पर रिपोर्टिंग, लेखन और वीडियो कंटेंट तैयार करना मेरी कार्यशैली का हिस्सा रहा है।
Leave A Comment

अन्य खबरें

अन्य खबरें