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इलेक्शन के बाद कब खत्म होती है आचार संहिता? जानिए इसके बाद क्या बदल जाता है
Authored By: Ranjan Gupta
Published On: Friday, November 7, 2025
Last Updated On: Friday, November 7, 2025
चुनाव खत्म होते ही सबसे बड़ा सवाल यही होता है, आखिर आदर्श आचार संहिता कब हटती है और इसके हटने के बाद क्या बदलाव आते हैं? जानिए, वोटिंग पूरी होने के बाद किस तरह प्रशासनिक फैसलों, सरकारी योजनाओं और राजनीतिक गतिविधियों पर लगी पाबंदियां खत्म होती हैं.
Authored By: Ranjan Gupta
Last Updated On: Friday, November 7, 2025
Election 2025: भारत में जब भी चुनावी प्रक्रिया शुरू होती है, तो उसके साथ ही लागू हो जाती है आदर्श आचार संहिता (Code of Conduct) यानी ऐसे नियम जिनका पालन राजनीतिक दलों, उम्मीदवारों और प्रशासनिक अधिकारियों को करना अनिवार्य होता है. इस अवधि में सरकार किसी नई परियोजना की घोषणा नहीं कर सकती, अधिकारियों के तबादले पर रोक रहती है, और चुनाव प्रचार के तौर-तरीके भी सीमित हो जाते हैं. लेकिन जैसे ही वोटिंग खत्म होती है और परिणाम घोषित होते हैं, लोगों के मन में सवाल उठता है कि आखिर आचार संहिता कब हटती है और इसके हटने के बाद क्या कुछ बदलता है? आइए जानते हैं कि इस संहिता के खत्म होते ही प्रशासन, राजनीति और आम जनजीवन में कौन-कौन से बदलाव देखने को मिलते हैं.
क्या होती है आदर्श आचार संहिता?
स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए भारत निर्वाचन आयोग कुछ सख्त नियम बनाता है. इन्हें ही आदर्श आचार संहिता कहा जाता है. ये नियम राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों को दिशा देते हैं कि चुनाव के दौरान उन्हें क्या करना चाहिए और क्या नहीं. इसमें सभा करने, रैलियां निकालने, प्रचार करने, मतदान के दिन की व्यवस्था, सरकारी अधिकारियों के आचरण और सत्ताधारी दल की जिम्मेदारियां तक सब कुछ शामिल होता है.
आदर्श आचार संहिता लागू होने के बाद क्या-क्या पाबंदियां रहती हैं?
- आचार संहिता लागू होते ही कोई भी नेता धर्म, जाति, भाषा या समुदाय के नाम पर वोट नहीं मांग सकता. भड़काऊ भाषण देना, वादे कर मतदाताओं को प्रभावित करना या फिर उन्हें उपहार और पैसे देना पूरी तरह से मना है.
- प्रशासनिक स्तर पर भी कई नियम लागू हो जाते हैं. जिले के डीएम, एसपी, बीडीओ, एसडीओ और अन्य अधिकारी चुनाव आयोग के नियंत्रण में आ जाते हैं. इस दौरान बिना आयोग की अनुमति के किसी भी अधिकारी का ट्रांसफर या पोस्टिंग नहीं किया जा सकता.
- सरकार नई योजनाओं की घोषणा नहीं कर सकती और न ही किसी परियोजना का उद्घाटन किया जा सकता है. बजट आवंटन या किसी नई नीति पर फैसला लेने की भी अनुमति नहीं होती. राजनीतिक दलों की नई बैठकों या प्रचार अभियानों पर भी पाबंदी रहती है.
- इसके अलावा सरकारी इमारतें, गाड़ियां, विमान या बंगले चुनावी प्रचार के लिए इस्तेमाल नहीं किए जा सकते. सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर भी पार्टी के प्रतीक या प्रचार संदेशों को हटाना पड़ता है. सरकारी उपलब्धियों से जुड़े होर्डिंग्स और पोस्टर भी हटा दिए जाते हैं ताकि जनता पर कोई पक्षपातपूर्ण असर न पड़े.
कब हटती है आचार संहिता और तब क्या होता है?
- जैसे ही चुनाव खत्म होते हैं और परिणाम घोषित हो जाते हैं, आचार संहिता स्वतः समाप्त हो जाती है. इसके बाद सरकार दोबारा सामान्य कामकाज शुरू कर सकती है. नई भर्तियों और परीक्षाओं की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है. शराब के ठेकों की नीलामी, विकास योजनाओं की घोषणा और सरकारी निर्णय फिर से सामान्य तरीके से लिए जा सकते हैं.
- आचार संहिता खत्म होते ही प्रशासनिक गतिविधियां फिर पटरी पर लौट आती हैं. अधिकारी अपने पदों पर सामान्य निर्णय लेने लगते हैं और जनसभाओं या कार्यक्रमों पर कोई रोक नहीं रहती.
- कुल मिलाकर, आचार संहिता चुनावी प्रक्रिया को निष्पक्ष और पारदर्शी बनाने की एक अहम व्यवस्था है. यह न सिर्फ राजनीतिक दलों को सीमित करती है बल्कि प्रशासन और मीडिया को भी जिम्मेदार बनाती है. आचार संहिता हटते ही सरकार के कामकाज और राजनीतिक गतिविधियों में फिर से तेजी देखने को मिलती है.
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