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तेजस्वी चित, नीतीश फिट: बिहार में ‘डबल M’ कैसे बना गेमचेंजर?
Authored By: Ranjan Gupta
Published On: Saturday, November 15, 2025
Last Updated On: Saturday, November 15, 2025
बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों ने फिर साबित कर दिया कि नीतीश कुमार राजनीति के ऐसे खिलाड़ी हैं जो हर चुनाव में समीकरण बदल देना जानते हैं. जिन नेताओं ने उन्हें मानसिक रूप से कमजोर बताकर खारिज किया, वहीं नीतीश ने अपने दांव से विपक्ष को चारों खाने चित कर दिया. इस बार उनकी जीत के पीछे सबसे बड़ा रोल रहा ‘डबल M’ फैक्टर का, जिसने महागठबंधन का पूरा प्लान उधेड़ कर रख दिया. महिलाओं और मुसलमान मतदाताओं पर की गई उनकी वर्षों पुरानी रणनीति आखिरकार निर्णायक साबित हुई.
Authored By: Ranjan Gupta
Last Updated On: Saturday, November 15, 2025
Nitish Kumar: बिहार की राजनीति में कुछ चेहरे ऐसे होते हैं जिन्हें हर बार कमतर आंका जाता है, लेकिन जब नतीजे आते हैं तो वही चेहरे सबसे आगे खड़े मिलते हैं. नीतीश कुमार उन्हीं में से एक हैं. बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजे इस बात का ताज़ा सबूत हैं. महागठबंधन पूरे चुनाव अभियान में नीतीश को निशाने पर रखता रहा, उन्हें अस्थिर, कमजोर और मानसिक रूप से बीमार तक बताया गया. लेकिन जिन नीतीश को विपक्ष ने राजनीतिक तौर पर खत्म मान लिया था, उन्हीं नीतीश ने अपने एक दांव से तेजस्वी यादव का पूरा गणित खराब कर दिया.
दरअसल, इस चुनाव में सबसे ज्यादा चर्चा में रहा उनका ‘डबल M’ फैक्टर महिलाएं और मुसलमान. एक तरफ महिलाओं के लिए सालों से चल रही योजनाओं का भरोसा, और दूसरी तरफ मुसलमान वोटों में आई हल्की सी दरार, इन दोनों ने मिलकर एक ऐसा राजनीतिक माहौल बनाया जिसने महागठबंधन की उम्मीदों को ध्वस्त कर दिया. शराबबंदी से लेकर साइकिल योजना, महिला आरक्षण से लेकर 10-10 हजार रुपये सीधे खाते में भेजने तक नीतीश की यह लम्बी रणनीति आखिरकार उनके लिए वोटों में तब्दील हो गई.
नीतीश ने कौन-सा दांव चला?
बिहार में NDA की वापसी में डबल ‘M’ फैक्टर की बड़ी भूमिका रही. नीतीश कुमार ने इस फैक्टर की अहमियत बहुत पहले समझ ली थी. इसी समझ का नतीजा था राज्य में शराबबंदी. शराब बंद होने का असर साफ दिखा और इसके बाद नीतीश ने महिलाओं पर सीधा दांव खेला. उन्होंने महिला रोजगार योजना शुरू की और परिवार की एक महिला को 10-10 हजार रुपये कारोबार शुरू करने के लिए दिए. अगर उनका काम ठीक चला तो आगे दो लाख रुपये तक की मदद भी मिलने का रास्ता खुला.
BJP से एक कदम आगे निकले नीतीश?
पिछले कई चुनाव बताते हैं कि महिलाएं अब पुरुषों से ज्यादा वोटिंग कर रही हैं. यह चुनाव भी अलग नहीं रहा. बीजेपी ने पहले कई राज्यों मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और हरियाणा में महिलाओं के खातों में पैसे डालकर समर्थन लिया था. लेकिन इस बार नीतीश ने बीजेपी से भी तेज चाल चली. उन्होंने एक साथ 10 हजार रुपये महिलाओं के खाते में डाल दिए. इस कदम ने राज्य की महिलाओं को आरजेडी और लालटेन से दूर कर दिया. तेजस्वी यादव के मुख्यमंत्री बनने की उम्मीदें भी इसी झटके में टूट गईं.
इतना ही नहीं, कहा जा रहा है कि नीतीश ने आरजेडी के दूसरे ‘M’ यानी मुस्लिम वोट बैंक में भी सेंध लगा दी. कई जगह मुसलमानों ने आरजेडी से दूरी बनाई और वोट सीधे जेडीयू को मिले. यानी आरजेडी को ‘M’ फैक्टर पर डबल झटका लगा. महिलाएं भी दूर गईं और मुसलमान भी.
20 साल पहले शुरू हुई थी नीतीश की चाल
नीतीश 2005 में पहली बार मुख्यमंत्री बने थे. तभी से उन्होंने अपना वोट-बेस बनाना शुरू कर दिया था और आरजेडी के ‘M’ फैक्टर की काट के लिए अपनी रणनीति बनाई. पहली सरकार में ही उन्होंने स्कूल जाने वाली लड़कियों के लिए साइकिल योजना शुरू की. इसके बाद 2016 में उन्होंने शराबबंदी लागू की. इस फैसले की आलोचना भी हुई, लेकिन महिलाओं में यह कदम बेहद लोकप्रिय रहा.
जब उन्हें लगा कि शराबबंदी का असर कुछ कम हो रहा है, तब उन्होंने स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए 50% आरक्षण दे दिया. सरकारी नौकरियों में 35% आरक्षण दिया. इन फैसलों ने महिलाओं को आरजेडी और कांग्रेस से हटाकर नीतीश की ओर मोड़ दिया. और अब चुनाव से ठीक पहले खाते में 10-10 हजार रुपये भेजने वाले फैसले ने गेम पलट दिया. तेजस्वी ने भी सरकार बनने पर महिलाओं को 30-30 हजार देने का वादा किया था, लेकिन महिलाओं ने भरोसा नीतीश पर ही जताया.
कौन-सी पार्टी को कितनी सीटें मिलीं?
बीजेपी ने 89 सीटें जीतीं. जेडीयू को 85 सीटें मिलीं. आरजेडी सिर्फ 25 सीटों पर सिमट गई. चिराग पासवान की पार्टी ने 19 सीटें जीतीं. कांग्रेस का हाल सबसे खराब रहा सिर्फ 6 सीटें मिलीं. लेफ्ट पार्टियां लगभग साफ हो गईं. AIMIM ने इस बार भी अपना पुराना प्रदर्शन दोहराया. जीतन राम मांझी की पार्टी को 5 सीटें मिलीं. उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी को 4 सीटें मिलीं. लेफ्ट पार्टियों को मिलकर भी सिर्फ 4 सीटें ही मिल पाईं.
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