जब-जब बिहार में बढ़ी वोटिंग, तब-तब बदली सत्ता, 8% की छलांग ने बढ़ाई नीतीश कुमार की टेंशन

Authored By: Nishant Singh

Published On: Friday, November 7, 2025

Last Updated On: Friday, November 7, 2025

बिहार चुनाव में बढ़ती वोटिंग से सियासी समीकरण बदलते नजर आ रहे हैं, 8% उछाल ने नीतीश कुमार की टेंशन बढ़ाई.
बिहार चुनाव में बढ़ती वोटिंग से सियासी समीकरण बदलते नजर आ रहे हैं, 8% उछाल ने नीतीश कुमार की टेंशन बढ़ाई.

बिहार की राजनीति हमेशा से जोश, जज़्बात और जनमत की दिशा से तय होती आई है. लेकिन इस बार कुछ अलग है, क्योंकि वोटिंग ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं. पहले चरण में 64.69% वोटिंग हुई है, जो पिछले विधानसभा चुनाव (2020) से करीब 8% ज्यादा है. और अगर बिहार के इतिहास पर नज़र डालें, तो जब-जब मतदाताओं ने इतनी बड़ी संख्या में वोट डाले हैं, सरकार बदली है. अब सवाल यही-क्या इस बार भी वही इतिहास दोहराएगा?

Authored By: Nishant Singh

Last Updated On: Friday, November 7, 2025

Bihar Election Voting Trend: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के पहले चरण में इस बार एक नया इतिहास बन गया. 18 जिलों की 121 सीटों पर गुरुवार को मतदान हुआ और इस बार 64.69% लोगों ने वोट डाला, जो कि पिछले चुनाव (56.1%) से करीब साढ़े आठ प्रतिशत अधिक है. यह सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि सत्ता के बदलने का इशारा माना जा रहा है.

बिहार की राजनीति में एक पुराना फॉर्मूला बार-बार दोहराया गया है- “जब-जब 5% से ज़्यादा वोटिंग बढ़ी, सरकार बदल गई.” अब जब रिकॉर्ड तोड़ वोटिंग हुई है, तो सियासी गलियारों में सबसे बड़ा सवाल यही है-क्या इस बार भी इतिहास खुद को दोहराएगा?

पहले चरण में किसने दिखाया वोटिंग का जोश?

इस बार के पहले फेज में मतदाताओं का जोश देखने लायक था. मुज़फ्फरपुर (70.96%) और समस्तीपुर (70.63%) ने सबसे ज्यादा वोटिंग दर्ज की, जबकि पटना (57.93%) में सबसे कम मतदान हुआ. अगर औसतन देखा जाए तो बिहार में 64.69% मतदान हुआ, जो प्रदेश के इतिहास में अब तक का सर्वाधिक है. 2020 में पहले फेज में सिर्फ 71 सीटों पर 56.1% मतदान हुआ था, लेकिन इस बार 121 सीटों पर वोटिंग के बावजूद आंकड़ा आसमान छू गया. इतिहास के लिहाज से देखें तो यह बिहार की अब तक की सबसे अधिक वोटिंग है, जिसने 1998 के लोकसभा चुनाव (64.6%) का रिकॉर्ड भी तोड़ दिया.

आख़िर वोटिंग बढ़ने का मतलब क्या होता है?

भारत के चुनावी इतिहास में यह देखा गया है कि जब भी मतदान में बड़ा उछाल आता है, तो इसका मतलब जनता ‘परिवर्तन’ की इच्छा से लगाया जाता है. हालांकि कुछ चुनावों में इसका उल्टा भी हुआ है, परंतु बिहार में आंकड़े कुछ और कहानी कहते हैं. 1951 से अब तक बिहार में जब भी 5% या उससे अधिक मतदान बढ़ा, तब सत्ता पलट हुई है. ऐसे में 8% से ज्यादा मतदान बढ़ना मौजूदा सरकार के लिए टेंशन की घंटी बजा रहा है.

आंकड़े बोलते हैं: जब वोट बढ़ा, तब गद्दी बदली

अगर बिहार के चुनावी इतिहास को देखें तो तीन बड़े मौकों पर ऐसा हुआ जब वोटिंग में उछाल ने सरकार बदल दी-

1967:

  • 1962 में 44.5% मतदान था, जो 1967 में बढ़कर 51.5% हो गया.
  • नतीजा – कांग्रेस की सत्ता गई और पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार बनी.

1980:

  • 1977 में 50.5% वोटिंग थी, जबकि 1980 में यह 57.3% पहुंच गई.
  • जनता पार्टी हार गई और कांग्रेस की वापसी हो गई.

1990:

  • 1985 में 56.3% वोटिंग हुई थी, 1990 में यह बढ़कर 62% हो गई.
  • नतीजा – कांग्रेस सत्ता से बाहर और जनता दल की सरकार बनी.

इन तीनों बार मतदान 5% से ज्यादा बढ़ा और तीनों बार सत्ता का चेहरा बदल गया. अब 2025 में 8.5% की बढ़ोतरी… यानी इतिहास खुद को दोहराने के लिए तैयार दिख रहा है.

बिहार का वोटिंग पैटर्न: अब तक का ट्रेंड

साल कुल मतदान (%) नतीजा
1951-52 42.6 कांग्रेस सरकार
1967 51.5 कांग्रेस हारी
1980 57.3 कांग्रेस जीती
1990 62.0 कांग्रेस हारी
2000 62.57 सत्ता बदली
2020 56.1 एनडीए सरकार
2025 (पहला चरण) 64.69 ? (सस्पेंस बाकी)

ये आंकड़े बताते हैं कि बिहार में बढ़ती वोटिंग अक्सर जनता के मूड में बदलाव की निशानी होती है.

नीतीश कुमार के लिए बढ़ी चिंता

नीतीश कुमार के नेतृत्व में पिछले तीन चुनावों में वोटिंग 2–3% तक ही बढ़ी थी, जिसका सीधा फायदा उन्हें मिला.

मगर इस बार साढ़े 8% की बढ़ोतरी ने सियासी हलकों में हलचल मचा दी है. इतिहास कहता है कि इतनी ज्यादा वोटिंग के बाद सत्ता का समीकरण पलट जाता है. महागठबंधन और एनडीए दोनों के बीच पिछले चुनाव में कांटे की टक्कर रही थी- महागठबंधन को 61, एनडीए को 59 सीटें मिली थीं. अब अगर मतदाताओं ने बड़ा फैसला किया है, तो उसका असर पहले चरण से ही दिख सकता है.

क्यों बढ़ी इतनी वोटिंग?

  • मतदाता सूची की सफाई (SIR): फर्जी वोटर हटे और नए जोड़े गए.
  • युवाओं की भागीदारी: पहली बार वोट डालने वालों की संख्या रिकॉर्ड स्तर पर.
  • महिलाओं की सक्रियता: महिला वोटर प्रतिशत बढ़ा.
  • एंटी-इंकम्बेंसी की लहर: सरकार से असंतोष की भावना.
  • चुनावी जागरूकता अभियान: ग्रामीण इलाकों में भी वोटिंग का जोश.

इन कारणों ने मिलकर बिहार की वोटिंग को ऐतिहासिक बना दिया.

पहले चरण की सीटें: किसकी किस्मत बंद?

पहले चरण की 121 सीटों पर 1314 उम्मीदवार मैदान में हैं. महागठबंधन की ओर से आरजेडी (72), कांग्रेस (24), माले (14) तो एनडीए की ओर से जेडीयू (57), बीजेपी (48) उम्मीदवार उतरे हैं. चिराग पासवान की एलजेपी (रामविलास) 13 सीटों पर, जबकि ओवैसी की AIMIM 8 सीटों पर मैदान में है. कई सीटों पर त्रिकोणीय मुकाबला भी देखा जा रहा है.

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निशांत कुमार सिंह एक पैसनेट कंटेंट राइटर और डिजिटल मार्केटर हैं, जिन्हें पत्रकारिता और जनसंचार का गहरा अनुभव है। डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के लिए आकर्षक आर्टिकल लिखने और कंटेंट को ऑप्टिमाइज़ करने में माहिर, निशांत हर लेख में क्रिएटिविटीऔर स्ट्रेटेजी लाते हैं। उनकी विशेषज्ञता SEO-फ्रेंडली और प्रभावशाली कंटेंट बनाने में है, जो दर्शकों से जुड़ता है।
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