राजनीति से डरती थीं सोनिया गांधी, फिर भगवद्गीता ने कैसे बदला उनका फैसला? किताब में खोले जिंदगी के कई राज

Authored By: Mazhar Pathan

Published On: Saturday, November 7, 2026

Updated On: Saturday, November 7, 2026

सोनिया गांधी की किताब में बड़े खुलासे, राजीव गांधी की तस्वीर, परिवार का डर और गीता का संदेश

सोनिया गांधी ने अपनी आने वाली किताब 'Belonging: A Journey of Love' में बताया है कि राजीव गांधी की हत्या के बाद वह राजनीति से दूर रहना चाहती थीं. लेकिन कांग्रेस की कमजोर होती स्थिति और परिवार से जुड़ी जिम्मेदारियों के बीच उनके मन में संघर्ष चल रहा था. इसी दौरान भगवद्गीता के एक संदेश ने उन्हें अपना फैसला लेने में मदद की.

Authored By: Mazhar Pathan

Updated On: Saturday, November 7, 2026

कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी को भारतीय राजनीति के सबसे प्रभावशाली नेताओं में गिना जाता है. उन्होंने लंबे समय तक कांग्रेस की कमान संभाली और देश की राजनीति में अहम भूमिका निभाई. लेकिन क्या आप जानते हैं कि एक समय ऐसा भी था, जब सोनिया गांधी राजनीति की दुनिया में कदम रखने से डरती थीं? वह राजनीति को पसंद नहीं करती थीं और अपने पति राजीव गांधी की हत्या के बाद इस दुनिया से दूर रहना चाहती थीं.

अब सोनिया गांधी ने अपनी आने वाली किताब ‘Belonging: A Journey of Love’ में इस दौर से जुड़े कई अनुभव साझा किए हैं. किताब के कुछ अंशों में उन्होंने बताया है कि कैसे वह अपने मन के भीतर चल रहे संघर्ष से जूझ रही थीं. एक तरफ परिवार और बच्चों की चिंता थी, तो दूसरी तरफ कांग्रेस पार्टी की बिगड़ती स्थिति और जिम्मेदारी का सवाल था. इसी मुश्किल समय में भगवद्गीता का एक संदेश उनके लिए रास्ता दिखाने वाला बना.

राजीव गांधी की हत्या के बाद राजनीति से बना ली थी दूरी

सोनिया गांधी के जीवन में साल 1991 एक ऐसा मोड़ लेकर आया, जिसने उनकी पूरी दुनिया बदल दी. इसी साल उनके पति और पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या कर दी गई. इस घटना के बाद सोनिया गांधी ने खुद को सार्वजनिक जीवन से काफी हद तक दूर कर लिया था.

उनके मुताबिक, राजीव गांधी के पुराने साथी समय-समय पर उनसे मिलने आते थे. कुछ लोग पारिवारिक कार्यक्रमों में बुलाने आते, तो कुछ उनसे कांग्रेस के कामकाज में सक्रिय भूमिका निभाने की अपील करते थे. लेकिन सोनिया गांधी उनकी बात सुनती जरूर थीं, पर इन अपीलों पर कोई कदम नहीं उठाती थीं.

वह राजनीति में आने के पक्ष में नहीं थीं. उनके लिए राजनीति केवल सत्ता और पद का रास्ता नहीं थी, बल्कि वह इससे जुड़े महत्वाकांक्षा, लालच, दिखावे और धोखे जैसे पहलुओं को लेकर भी असहज थीं.

कांग्रेस की हालत ने बढ़ाई सोनिया गांधी की बेचैनी

सोनिया गांधी ने किताब में बताया है कि 1990 के दशक में कांग्रेस लगातार मुश्किलों का सामना कर रही थी. पार्टी के भीतर गुटबाजी बढ़ रही थी और कई बड़े नेता अलग होकर अपनी राजनीतिक राह बना रहे थे.

1996 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस अपने दम पर सरकार बनाने में सफल नहीं हुई. पार्टी के भीतर मतभेद और टूट का सिलसिला भी जारी था. अर्जुन सिंह, एनडी तिवारी और जीके मूपनार जैसे नेताओं के अलग होने का जिक्र करते हुए सोनिया गांधी ने उस दौर की राजनीतिक परिस्थितियों को याद किया है. ममता बनर्जी ने भी 1997 में कांग्रेस छोड़कर तृणमूल कांग्रेस बनाई थी.

सोनिया गांधी लिखती हैं कि जब भी वह घर में राजीव गांधी और इंदिरा गांधी की तस्वीरों के पास से गुजरती थीं, तो उनके मन में दर्द और अपराधबोध का भाव पैदा होता था. उन्हें लगता था कि जिन लोगों ने देश के लिए काम किया और जिन मूल्यों की रक्षा की, क्या वह उन सबको इस तरह पीछे छोड़ सकती हैं? यही सवाल धीरे-धीरे उनकी बेचैनी बढ़ा रहा था.

राहुल और प्रियंका भी नहीं चाहते थे कि मां राजनीति में आएं

सोनिया गांधी के इस फैसले का असर उनके बच्चों राहुल गांधी और प्रियंका गांधी पर भी पड़ रहा था. किताब में उन्होंने बताया है कि दोनों बच्चे उनकी मनःस्थिति को समझ रहे थे और उन्हें डर था कि कहीं उनकी मां राजनीति में न चली जाएं.

राहुल और प्रियंका ने उनसे इस मुद्दे पर खुलकर बहस भी की. दोनों पहले ही अपनी दादी इंदिरा गांधी और पिता राजीव गांधी को खो चुके थे. ऐसे में उन्हें डर था कि राजनीति में आने के बाद कहीं वे अपनी मां को भी न खो दें.

सोनिया गांधी के मुताबिक, बच्चों ने उनसे वादा भी लिया था कि वह कोई ऐसा कदम नहीं उठाएंगी, जिससे परिवार फिर किसी मुश्किल में पड़ जाए.

इस तरह सोनिया गांधी के सामने केवल राजनीतिक जिम्मेदारी का सवाल नहीं था. उन्हें यह भी सोचना था कि उनके फैसले से उनके बच्चों और परिवार पर क्या असर पड़ेगा.

भगवद्गीता के किस संदेश ने दिखाया रास्ता?

जब सोनिया गांधी के मन में सवाल बढ़ते जा रहे थे, तब उन्होंने भगवद्गीता को दोबारा पढ़ने का फैसला किया. उन्होंने बताया कि वह बचपन में गीता पढ़ चुकी थीं, लेकिन उस समय जीवन की परिस्थितियां अलग थीं.

साल 1997 में उन्होंने अपने कार्यालय से पता करवाया कि क्या कोई विद्वान घर आकर उन्हें गीता का अर्थ समझा सकता है. इसके बाद प्रोफेसर वाचस्पति उपाध्याय, जिन्हें परिवार के लोग शास्त्रीजी कहते थे, उनसे मिलने के लिए तैयार हुए.

सोनिया गांधी ने जनवरी 1997 से उनके साथ गीता का अध्ययन शुरू किया. शास्त्रीजी संस्कृत के श्लोक पढ़ते और सोनिया उनके हिंदी अनुवाद को पढ़तीं. इसके बाद वह उन श्लोकों का अर्थ और उनका गहरा संदेश समझाते थे.

इस अध्ययन का सबसे अहम संदेश था अपने कर्तव्य का पालन करो और उसके परिणाम की चिंता में मत उलझो.

गीता में भगवान कृष्ण अर्जुन को यही समझाते हैं कि मनुष्य को अपना धर्म और कर्तव्य निभाना चाहिए. सोनिया गांधी के अनुसार, इस संदेश ने उनके मन में चल रहे सवालों का जवाब दिया.

उन्होंने लिखा कि जैसे-जैसे गीता का अध्ययन पूरा होने लगा, उन्हें अपने फैसले को लेकर स्पष्टता मिलने लगी. उन्हें महसूस हुआ कि अब उन्हें उस जिम्मेदारी की ओर कदम बढ़ाना चाहिए, जिसे वह लंबे समय से टाल रही थीं.

1998 में संभाली कांग्रेस की कमान

साल 1997 में सोनिया गांधी ने कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता ली जिसकी वजह से पार्टी की जिम्मेदारी संभालने का दबाव बढ़ता गया और गीता के अध्ययन के बाद उन्होंने राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने का फैसला किया और 1998 में कांग्रेस अध्यक्ष बनीं.

उनके मुताबिक, यह फैसला किसी पद या सत्ता की इच्छा से नहीं, बल्कि अपने कर्तव्य की भावना से जुड़ा था. इसे भारत में हार्पर कॉलिन्स 10 नवंबर 2026 को प्रकाशित करने वाला है.

इस किताब के सामने आए अंश सोनिया गांधी के राजनीतिक जीवन का एक ऐसा पहलू दिखाते हैं, जिसके बारे में आमतौर पर कम चर्चा होती है. यह कहानी बताती है कि राजनीति में आने का उनका फैसला आसान नहीं था. इसके पीछे परिवार को खोने का दर्द, बच्चों की चिंता, कांग्रेस की स्थिति और कर्तव्य को लेकर लंबा आत्ममंथन था.

उनके लिए भगवद्गीता का संदेश इसी आत्ममंथन के बीच एक सहारा बना. राजनीति से दूरी बनाने की इच्छा रखने वाली सोनिया गांधी ने आखिरकार उसी जिम्मेदारी को स्वीकार किया, जिससे वह कभी बचना चाहती थीं.

About the Author: Mazhar Pathan
मैं पिछले 6 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हूं। इस दौरान न्यूज़ रूम से लेकर ज़मीनी स्तर तक पत्रकारिता के विभिन्न आयामों में काम करने का अनुभव हासिल किया है। ऑफिस में वीडियो एंकरिंग से लेकर फील्ड में ग्राउंड रिपोर्टिंग तक, मैंने अलग-अलग विषयों और मुद्दों पर काम किया है। सामाजिक, राजनीतिक, समसामयिक और जनहित से जुड़े विषयों पर रिपोर्टिंग, लेखन और वीडियो कंटेंट तैयार करना मेरी कार्यशैली का हिस्सा रहा है।
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