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भक्त कभी हीरे जड़ित सिंहासन पर नहीं बैठता है: सद्गुरु जग्गी वासुदेव
Authored By: स्मिता
Published On: Friday, July 18, 2025
Last Updated On: Friday, July 18, 2025
आध्यात्मिक गुरु और ईशा फाउंडेशन के संस्थापक सद्गुरु जग्गी वासुदेव भक्ति के यथार्थपूर्ण अर्थ बताते हैं. उनके अनुसार, भक्ति में डूबा भक्त कभी हीरे जड़ित सिंहासन पर नहीं बैठता है और न ही वह कभी उसकी कामना करता है. उसकी एकमात्र कामना ईश्वर की गोद में बैठने की होती है.
Authored By: स्मिता
Last Updated On: Friday, July 18, 2025
Sadhguru Jaggi Vasudev: हरी भक्ति के विशेष अर्थ होते हैं. सिर्फ धार्मिक कारणों से नहीं आध्यात्मिक वजहों से भी भक्ति की महत्ता बहुत अधिक है. आध्यात्मिक गुरु जग्गी वासुदेव बताते हैं, ‘ धरती की इस पुरानी सभ्यता में प्रतिभा बुनियादी रूप से शिक्षा की देन नहीं, भक्ति की देन रही है.’ भक्ति में व्यक्ति समावेशी हो जाते हैं. भक्त होने का मतलब है बोध और विवेक के एक ऐसे आयाम पर पहुंचना, जहां दिव्यता की संभावना को निमंत्रित किया जाता है. भक्त कभी हीरे जड़ित सिंहासन पर नहीं बैठता, न ही वह कभी उसकी कामना करता है. उसकी एकमात्र कामना ईश्वर की गोद में बैठने की होती है. उसकी कामना कहीं पहुंचने या जाने की नहीं होती है.
हर बाधा को समाप्ति की ओर ले जाती है भक्ति
कोई भी मनुष्य सारी सृष्टि के बारे में अपने मौलिक बोध को बदल कर ही ईश्वर की गोद में बैठ सकता है. भक्ति कोई यात्रा नहीं है, जिसे तय करके कोई वहां पहुंच सकता है. भक्ति मनुष्य के भीतर मौजूद सभी सीमाओं को तोड़ने का एक जबरदस्त साधन है. ये सीमाएं चाहे मनोवैज्ञानिक हों, भावनात्मक हों या फिर कर्म के अनुसार. यदि भक्ति का सैलाब आयेगा, तो वह बड़ी सहजता से इन सभी बाधाओं व सीमाओं को अपने साथ बहा ले जायेगा. नियमित साधना के जरिये इन सीमाओं को हटाने के लिए बहुत सारा काम करना पड़ेगा.
भीतर बनी सीमा टूट सकती है
जो साधना तीव्र भक्ति की अवस्था में की जाती है, उससे आप उन सारी सीमाओं को बहा सकते हैं, जो आपने अपने भीतर बना रखी है. यदि आप एक सुंदर गुलदस्ता देखते हैं, तो यह जानने की सहज इच्छा होती है कि इसे किसने बनाया है. आप एक सुंदर कलाकृति देखते हैं, तो आप स्वाभाविक रूप से जानना चाहेंगे कि इसे किसने बनाया है. यदि आप एक सुंदर बच्चा देखते हैं, तो आप जानना चाहेंगे कि इसके माता-पिता कौन हैं. परंतु बहुत कम लोग होंगे जो इस सृष्टि की सर्वश्रेष्ठ रचना ‘मनुष्य’ के बारे में प्रश्न पूछते होंगे कि ‘इसका रचयिता कौन है?’
निष्कर्ष से परे है भक्ति
आपके पास मनुष्य के रचयिता के बारे में कई रेडीमेड जवाब सामने आएंगे. भक्ति कोई रेडीमेड जवाब नहीं है. भक्ति आपको वहां ले जाने का एक साधन है. भक्ति कोई निष्कर्ष नहीं है, जो मनुष्य निकालता है. भक्ति इन सारे निष्कर्षों से परे जाने का रास्ता है. भक्ति उस सैलाब को तैयार करने का एक तरीका है, जो अनुभवों की सारी सीमाओं से परे आपको बहा ले जाता है.
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