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Phulera Dooj Celebration in Braj: फुलेरा दूज से क्यों होती है होली उत्सव की शुरुआत? ब्रज और श्रीकृष्ण-राधा प्रेम से जुड़ा पावन पर्व
Authored By: Nishant Singh
Published On: Wednesday, February 18, 2026
Last Updated On: Wednesday, February 18, 2026
Phulera Dooj Celebration in Braj: फुलेरा दूज 2026 का पर्व 19 फरवरी को मनाया जाएगा, जो ब्रज में होली उत्सव की विधिवत शुरुआत का प्रतीक है. यह दिन भगवान श्रीकृष्ण और राधा रानी के दिव्य प्रेम से जुड़ा है. फुलेरा दूज को अबूझ मुहूर्त माना जाता है, इसलिए इस दिन शुभ कार्यों का विशेष महत्व होता है.
Authored By: Nishant Singh
Last Updated On: Wednesday, February 18, 2026
Phulera Dooj Celebration in Braj: फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाया जाने वाला फुलेरा दूज 19 फरवरी 2026 को पड़ रहा है. यह दिन केवल एक धार्मिक तिथि नहीं, बल्कि होली जैसे रंगों के महापर्व की औपचारिक शुरुआत का संकेत माना जाता है. खासतौर पर ब्रज में इस दिन से वातावरण पूरी तरह रंग, प्रेम और भक्ति में डूबने लगता है. फुलेरा दूज का अर्थ है “फूलों की द्वितीया”, जो वसंत ऋतु के आगमन और प्रेम के उत्सव का प्रतीक है. इसी दिन से मंदिरों में गुलाल अर्पित होने लगता है और होली का उल्लास धीरे-धीरे चरम की ओर बढ़ता है.
भगवान कृष्ण और राधा रानी से जुड़ी पौराणिक कथा
फुलेरा दूज का गहरा संबंध भगवान श्रीकृष्ण और राधा रानी के दिव्य प्रेम से जुड़ा है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब किसी कारणवश श्रीकृष्ण लंबे समय तक ब्रज नहीं आए, तो वहां की प्रकृति उदास हो गई, वन सूखने लगे और वातावरण में नीरसता छा गई. जैसे ही कृष्ण लौटे, राधा रानी और गोपियों ने प्रसन्न होकर उन पर फूलों की वर्षा की. इसी खुशी और प्रेम की स्मृति में फुलेरा दूज पर फूलों की होली खेलने की परंपरा शुरू हुई. यह दिन इस बात का प्रतीक है कि प्रेम और आनंद से ही जीवन में फिर से रंग भरे जा सकते हैं.
ब्रज के मंदिरों में फुलेरा दूज का भव्य उत्सव
फुलेरा दूज के दिन मथुरा और वृंदावन के प्रमुख मंदिरों में विशेष आयोजन होते हैं. ठाकुर जी को फूलों और रंगीन गुलाल से सजाया जाता है, उनका आकर्षक श्रृंगार किया जाता है और फूलों की सेज पर विराजमान किया जाता है. भक्त भगवान के साथ फूलों की होली खेलते हैं और मंदिरों में भजन-कीर्तन का विशेष आयोजन होता है. यह उत्सव न केवल धार्मिक होता है, बल्कि मन को शांति और सकारात्मक ऊर्जा से भर देता है. हजारों श्रद्धालु इस दिन दर्शन के लिए उमड़ते हैं, जिससे पूरा ब्रज क्षेत्र उत्सवमय हो जाता है.
होली उत्सव की विधिवत शुरुआत का प्रतीक
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, फुलेरा दूज से ही ब्रज में होली की विधिवत शुरुआत मानी जाती है. इसी दिन से भगवान कृष्ण को गुलाल अर्पित करने की परंपरा शुरू होती है. इसके बाद लड्डू होली, लट्ठमार होली और रंगभरी एकादशी जैसे आयोजन क्रमशः आते हैं. फुलेरा दूज मानो यह संदेश देता है कि अब रंगों, आनंद और आपसी प्रेम का समय शुरू हो चुका है. यही कारण है कि इस दिन को होली उत्सव की पहली दस्तक कहा जाता है.
शुभ कार्यों के लिए क्यों है फुलेरा दूज अबूझ मुहूर्त
ज्योतिष शास्त्र में फुलेरा दूज को “अबूझ मुहूर्त” माना गया है. इसका अर्थ है कि इस दिन किसी भी शुभ कार्य के लिए अलग से मुहूर्त देखने की आवश्यकता नहीं होती. विवाह, सगाई, गृह प्रवेश या नए व्यापार की शुरुआत के लिए यह दिन अत्यंत शुभ माना जाता है. मान्यता है कि इस दिन किए गए कार्यों में सफलता और स्थायित्व मिलता है. लोग घर की सफाई करते हैं, फूलों की रंगोली बनाते हैं और सकारात्मक ऊर्जा के स्वागत की तैयारी करते हैं.
फुलेरा दूज का आध्यात्मिक संदेश
फुलेरा दूज हमें यह सिखाता है कि भक्ति केवल नियमों तक सीमित नहीं, बल्कि आनंद और उत्सव के साथ जुड़ी होती है. फूलों की होली यह संदेश देती है कि जीवन में प्रेम, सौम्यता और सकारात्मकता बनाए रखना कितना जरूरी है. शुद्ध मन और सात्विक भाव से किया गया उत्सव ही सच्ची शांति देता है. यही कारण है कि फुलेरा दूज आज भी हमारी संस्कृति, परंपरा और आस्था का एक जीवंत प्रतीक बना हुआ है.
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