देश के 10 राज्यों में स्कूल की चारदीवारी से सड़क तक पहुंचे बच्चे, बुनियादी सुविधाओं की मांग ने खोली शिक्षा व्यवस्था की जमीनी हकीकत

Authored By: Nishant Singh

Published On: Saturday, August 22, 2026

Updated On: Saturday, August 22, 2026

10 राज्यों में School Infrastructure और बच्चों की बुनियादी सुविधाओं की स्थिति

जुलाई-अगस्त 2026 में करीब 10 राज्यों के 25 जिलों से स्कूली बच्चों के सड़कों पर उतरने की तस्वीर सामने आई. उनकी मांगें बेहद बुनियादी थीं-शिक्षक, बिजली, पंखे, साफ पानी, शौचालय और सुरक्षित स्कूल. सरकारी आंकड़ों में सुधार के बावजूद इन प्रदर्शनों ने शिक्षा व्यवस्था की जमीनी हकीकत पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है.

Authored By: Nishant Singh

Updated On: Saturday, August 22, 2026

School Infrastructure: जुलाई-अगस्त 2026 के दौरान देश के कोने-कोने से एक अनोखी तस्वीर सामने आई – स्कूली बच्चे अपनी किताबें-बस्ते छोड़कर सड़कों पर उतर आए. यह किसी एक स्कूल या शहर की बात नहीं थी. करीब 10 राज्यों और 25 जिलों से ऐसी खबरें आईं, जहां छात्रों ने खुद अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए आवाज उठाई. न कोई महंगी मांग, न कोई नई योजना – सिर्फ शिक्षक, बिजली, पंखा, साफ पानी, शौचालय और सुरक्षित स्कूल भवन जैसी वे चीजें, जो हर बच्चे का हक होनी चाहिए.

फतेहपुर से शुरू हुई चिंगारी

28 जुलाई को उत्तर प्रदेश के फतेहपुर में कक्षा 6 से 12 तक के सैकड़ों छात्र सड़क पर उतरे. महीनों से टूटे डेस्क, बिजली की आवाजाही, गंदा पानी और बदहाल शौचालयों की शिकायतें अनसुनी रह गई थीं. यह चिंगारी यहीं नहीं रुकी – लखनऊ समेत यूपी के कई और जिलों में भी ऐसे ही प्रदर्शन देखने को मिले. वहीं से यह लहर मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, बिहार, ओडिशा, झारखंड, छत्तीसगढ़ और पंजाब तक फैल गई.

आंकड़े कहते हैं सुधार, जमीन कुछ और

केंद्र सरकार के UDISE+ 2025-26 आंकड़ों पर नजर डालें तो देशभर के स्कूलों में सुविधाओं का स्तर बेहतर हुआ है – बिजली 95%, पीने का पानी 99.5% और शौचालय करीब 97-98% स्कूलों तक पहुंचे हैं. लेकिन इन औसत आंकड़ों के पीछे राज्यों के बीच बड़ी खाई छिपी है. जहां तमिलनाडु और केरल जैसे राज्य लगभग शत-प्रतिशत सुविधाओं के करीब खड़े हैं, वहीं उत्तर प्रदेश (88.8%), मध्य प्रदेश (90.7%) और राजस्थान (91.5%) जैसे राज्य अब भी पीछे हैं. शौचालयों के मामले में भी राजस्थान 86.8% के साथ राष्ट्रीय औसत से काफी नीचे है.

शिक्षक ही नहीं मिल रहे

सिर्फ बुनियादी ढांचा नहीं, शिक्षकों की भारी कमी भी बड़ी वजह बनकर उभरी. महाराष्ट्र के बीड में एक स्कूल में 16 शिक्षकों के पद खाली मिले, तो धाराशिव में छात्रों ने गणित-विज्ञान शिक्षकों की मांग को लेकर धरना दिया – यह कमी चार साल से बनी हुई थी. राजस्थान के जालोर में तो हालात यह हैं कि एक शिक्षक पर करीब 150 बच्चों की जिम्मेदारी है. आंकड़े बताते हैं कि देश में अब भी एक लाख से ज्यादा स्कूल ऐसे हैं जहां सिर्फ एक ही शिक्षक पढ़ाता है, हालांकि पिछले साल के मुकाबले यह संख्या थोड़ी घटी है.

कानून तो पहले से मौजूद है

गौर करने वाली बात यह है कि बच्चे जिन सुविधाओं की मांग कर रहे हैं, वे कोई नई मांग नहीं, बल्कि शिक्षा के अधिकार कानून यानी RTE Act 2009 में पहले से दर्ज हैं. सुरक्षित भवन, अलग शौचालय, साफ पानी और पढ़ाई की सामग्री – यह सब कानूनन हर स्कूल को देना ही है. इसी तरह संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार कन्वेंशन भी बच्चों के लिए पौष्टिक भोजन और स्वास्थ्य सुविधाओं को जरूरी मानता है.

भोजन, हॉस्टल और सुरक्षा भी मुद्दा

आवासीय स्कूलों की हालत भी कम चिंताजनक नहीं. मध्य प्रदेश के धार, उत्तराखंड के खटीमा और यूपी के अमेठी-लखनऊ जैसे इलाकों में छात्रों ने खराब भोजन, गंदगी और हॉस्टल सुविधाओं की कमी को लेकर विरोध जताया. वहीं राजस्थान के अलवर में तो स्कूल की छत गिरने के बाद 174 छात्र सुरक्षा को लेकर सड़क पर उतर आए. मध्य प्रदेश के सिरोंज और उज्जैन में बढ़े बस किराए और स्कूल के दूर शिफ्ट होने पर भी नाराजगी सामने आई.

तस्वीर का दूसरा पहलू

हालांकि यह कहना गलत होगा कि हालात में कोई सुधार नहीं हुआ. बीते एक साल में स्कूलों में बिजली, कंप्यूटर और इंटरनेट जैसी सुविधाओं में इजाफा दर्ज हुआ है. लेकिन खेल के मैदान जैसी सुविधा में गिरावट आई है, और दिव्यांग बच्चों के लिए रैंप-हैंडरेल जैसी जरूरी चीजें अब भी सिर्फ 58% स्कूलों में ही मौजूद हैं.

असल सवाल अमल का है

इन तमाम प्रदर्शनों से एक बात साफ हो जाती है – मसला सिर्फ यह नहीं कि सरकारी कागजों में कितने स्कूलों तक सुविधाएं पहुंचीं, बल्कि यह है कि जिस स्कूल में बच्चा हर दिन जाता है, वहां उसे असल में यह सब मिल भी रहा है या नहीं. राष्ट्रीय औसत भले उम्मीद जगाता हो, पर 10 राज्यों से उठी बच्चों की यह आवाज बता रही है कि कानून के कागज और स्कूल की जमीनी हकीकत के बीच फासला अब भी बड़ा है.

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निशांत कुमार सिंह एक पैसनेट कंटेंट राइटर और डिजिटल मार्केटर हैं, जिन्हें पत्रकारिता और जनसंचार का गहरा अनुभव है। डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के लिए आकर्षक आर्टिकल लिखने और कंटेंट को ऑप्टिमाइज़ करने में माहिर, निशांत हर लेख में क्रिएटिविटीऔर स्ट्रेटेजी लाते हैं। उनकी विशेषज्ञता SEO-फ्रेंडली और प्रभावशाली कंटेंट बनाने में है, जो दर्शकों से जुड़ता है।
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