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हर साल क्यों तबाह हो जाता है Nepal? जानिए पहाड़ों के भीतर छिपे इस खतरे की पूरी कहानी
Authored By: Galgotias Times Bureau
Published On: Wednesday, September 30, 2026
Last Updated On: Wednesday, September 30, 2026
नेपाल एक बार फिर बाढ़ और भूस्खलन की चपेट में है, जिसमें कई लोगों की जान जा चुकी है. आखिर हर साल यह देश प्राकृतिक आपदाओं का इतना बड़ा शिकार क्यों बनता है. इसके पीछे सिर्फ भारी बारिश नहीं, बल्कि धरती के भीतर की हलचल, पिघलते ग्लेशियर और खतरनाक हिमताल भी बड़ी वजह हैं.
Authored By: Galgotias Times Bureau
Last Updated On: Wednesday, September 30, 2026
Nepal disaster: हिमालय की गोद में बसा नेपाल(Nepal) जितना खूबसूरत है, उतना ही संवेदनशील भी. यहां हर साल किसी न किसी रूप में प्रकृति अपना रौद्र रूप दिखाती है. इस बार भी मूसलाधार बारिश और भूस्खलन(landslide) ने कई इलाकों में भारी तबाही मचाई है. आखिर इस देश की भौगोलिक बनावट में ऐसा क्या है, जो इसे बार-बार आपदाओं के लिए इतना जोखिम भरा बना देता है, आइए समझते हैं.
क्यों बार बार नेपाल बन रहा कुदरत के कहर का शिकार?
नेपाल(Nepal) में एक बार फिर मूसलाधार बारिश, उफनती नदियों और खिसकते पहाड़ों ने भारी तबाही मचाई है. सड़कें, पुल और दर्जनों मकान बह गए हैं, जबकि कई लोगों की जान भी जा चुकी है. नेपाल के आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के मुताबिक हाल की बारिश और भूस्खलन में इक्कीस से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है और कुछ लोग अब भी लापता हैं. यह सिलसिला किसी एक मौसम तक सीमित नहीं है, बल्कि हर साल दोहराया जाता है. इसकी जड़ें सिर्फ तेज बारिश में नहीं, बल्कि जमीन के भीतर की हलचल और बदलते पर्यावरण में भी छिपी हैं.
जमीन के नीचे चल रहा है टकराव
नेपाल की सबसे बड़ी भूगर्भीय समस्या भारतीय और यूरेशियन टेक्टॉनिक प्लेटों के बीच का टकराव है. यह प्रक्रिया करीब पांच करोड़ साल पहले शुरू हुई थी और आज भी जारी है. भारतीय प्लेट हर साल करीब बीस मिलीमीटर की रफ्तार से यूरेशियन प्लेट की तरफ खिसक रही है, जिससे हिमालय के नीचे लगातार दबाव बनता रहता है. यही दबाव नेपाल में बार-बार आने वाले भूकंपों की मुख्य वजह बनता है.
भूकंप से कमजोर होते पहाड़
भूकंप(earthquake) के झटके सिर्फ इमारतों को ही नहीं, बल्कि पूरे पहाड़ी ढांचे को भीतर से कमजोर कर देते हैं. इन झटकों से चट्टानें ढीली पड़ जाती हैं, और जब बारिश के दौरान इन कमजोर चट्टानों पर पानी का दबाव पड़ता है, तो पूरी ढलान ही नीचे आ गिरती है.
पिघलते ग्लेशियर और खतरनाक झीलें
ग्लोबल वार्मिंग की वजह से हिमालयी क्षेत्र में बर्फ तेजी से पिघल रही है, जिससे पहाड़ों की चट्टानों की आपसी पकड़ कमजोर हो जाती है. इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट के मुताबिक साल दो हजार के बाद से हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में ग्लेशियर पिघलने की रफ्तार दोगुनी हो चुकी है. इसी के साथ नेपाल और तिब्बत सीमा पर तीन हजार छह सौ चौबीस ग्लेशियल झीलें मौजूद हैं, जिनमें से सैंतालीस बेहद खतरनाक मानी गई हैं. जब ये झीलें फटती हैं, तो नीचे बसे गांवों तक पानी, बर्फ और मलबा पहुंचने में लोगों को संभलने का मौका तक नहीं मिलता.
संकरी घाटियां और मॉनसून की मार
नेपाल की नदियां बेहद तंग और संकरी घाटियों से होकर बहती हैं, जिससे बढ़ा हुआ पानी फैलने की जगह सीधे नीचे की ओर बहुत तेज रफ्तार से बहता है. इसके अलावा नेपाल दक्षिण एशियाई मॉनसून के सीधे रास्ते में आता है, जिससे यहां लगातार कई दिनों तक भारी बारिश होती रहती है. जंगलों की कटाई, अनियोजित सड़कें और नदियों के किनारे बने निर्माण भी इस खतरे को और बढ़ा देते हैं.
हर साल दोहराई जाती है यह तबाही
नेपाल के लिए यह अब किसी एक मौसम की बात नहीं रही. दो हजार सोलह से लेकर हाल के वर्षों तक लगभग हर साल भारी भूस्खलन और बाढ़ दर्ज की गई है. इसी साल अगस्त में लांगटांग लिरुंग पहाड़ से करीब दो वर्ग किलोमीटर चट्टान और ग्लेशियर का हिस्सा ढहने से भीषण बाढ़ आई थी, जिसमें चौदह सौ से ज्यादा लोगों की जान चली गई थी.
भारत और बांग्लादेश तक फैलता असर
नेपाल(Nepal) के पहाड़ों से निकलने वाली नदियां अपने साथ मलबा, गाद और पानी लेकर भारत और बांग्लादेश के मैदानी इलाकों तक पहुंचती हैं. इसलिए नेपाल में होने वाली हर बड़ी आपदा (Nepal natural disasters) का असर सिर्फ वहां तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया के जनजीवन को प्रभावित करता है.
निष्कर्ष
नेपाल की भौगोलिक बनावट, नई और अस्थिर पहाड़ियां (Himalayan disaster), बदलता जलवायु और मॉनसून की मार, इन सबका मेल इसे दुनिया के सबसे आपदा-संवेदनशील देशों में शामिल कर देता है. जब तक ग्लेशियरों की निगरानी मजबूत नहीं होती और पहाड़ी इलाकों में निर्माण को लेकर सख्ती नहीं बरती जाती, तब तक यह तबाही का सिलसिला थमने की उम्मीद कम ही नजर आती है.
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