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Hiteshwaranand Saraswati : कौन हैं पंचायती महानिर्वाणी अखाड़ा के महामंडलेश्वर महंत हितेश्वरानंद सरस्वती
Hiteshwaranand Saraswati : कौन हैं पंचायती महानिर्वाणी अखाड़ा के महामंडलेश्वर महंत हितेश्वरानंद सरस्वती
Authored By: स्मिता
Published On: Tuesday, January 28, 2025
Updated On: Tuesday, January 28, 2025
श्री पंचायती महानिर्वाणी अखाड़ा के महामंडलेश्वर बन गए हैं महंत हितेश्वरानंद सरस्वती महाराज (Hiteshwaranand Saraswat)। मेवाड़ के किसी संत को पहली बार महामंडलेश्वर बनाया गया है। कोरोना काल में उन्होंने अपनी पूरी संपत्ति आदिवासियों के कल्याण के लिए दान कर दी। जानते हैं महंत हितेश्वरानंद सरस्वती के बारे में सब कुछ।
Authored By: स्मिता
Updated On: Tuesday, January 28, 2025
माघ माह के कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि को प्रयागराज महाकुंभ में श्री पंचायती महानिर्वाणी अखाड़ा ने महंत हितेश्वरानंद सरस्वती महाराज (Hiteshwaranand Saraswati) को महामंडलेश्वर की उपाधि दी। महानिर्वाणी पीठाधीश्वर स्वामी विशोकानंद भारती और सर्व संतों की उपस्थिति में वैदिक मंत्रोच्चार के बीच दूध और गंगाजल से अभिषेक के पश्चात माला और चादर ओढ़ा कर हितेश्वरानंद सरस्वती महाराज का सम्मान किया गया है। इससे पहले उनका पट्टाभिषेक भी किया गया था। स्वामी हितेश्वरानंद सरस्वती जी महाराज समाजिक कार्यों को करने में अग्रणी रहे हैं। सनातन धर्म को मजबूत करने में उनका अहम योगदान (Hiteshwaranand Saraswati) रहा है।
कौन हैं स्वामी हितेश्वरानंद सरस्वती (Hiteshwaranand Saraswati)
चावंड, उदयपुर के महंत एवं विप्र फाउंडेशन के संरक्षक महंत हितेश्वरानंद सरस्वती महाराज को प्रयागराज महाकुंभ में संत समाज ने महामंडलेश्वर की उपाधि प्रदान की। वे कटावाला मठ से संबंध रखते हैं। महाराणा प्रताप की निर्वाण स्थली चावंड स्थित कटावाला मठ का जगन्नाथ महादेव मंदिर करीब 550 साल पुराना है। वर्ष 2021 में मानव कल्याण आश्रम के परमाध्यक्ष महंत स्वामी दुर्गेशानंद सरस्वती महाराज ने कटावाला मठ के पीठाधीश्वर घनश्याम बाव जी को संन्यास दीक्षा देकर अपना शिष्य घोषित किया। उन्हें स्वामी हितेश्वरानंद सरस्वती नाम दिया और संन्यास दीक्षा दी।
कल्याणकारी महंत
स्वामी हितेश्वरानंद सरस्वती महाराज का जन्म जिला पाली के चाणोद स्थान में हुआ था। घनश्याम बाव जी श्रीमाली ब्राह्मण कुल में जन्मे। उनकी मां का नाम हुलासी देवी जी है। कुंभलगढ़ के संत घनश्याम बाव जी ने ब्रह्मचारी जीवन से संन्यास जीवन में प्रवेश किया। स्वामी हितेश्वरानंद सरस्वती महाराज ने कटावाला मठ में रहकर साधना और समाज कल्याण के कार्यों में सक्रिय भूमिका निभाई है। उन्होंने कोरोना काल में अपनी पूरी संपत्ति आदिवासियों के कल्याण के लिए दान कर दी।
महा महामंडलेश्वर बनने की प्रक्रिया (Maha mandaleshwar)
महामंडलेश्वर बनने की प्रक्रिया लंबी और कठिन है। सनातन परंपरा में शंकराचार्य के बाद दूसरा सबसे बड़ा पद महामंडलेश्वर माना जाता है। अखाड़े में प्रवेश के समय साधु-संत को सबसे पहले संन्यासी, फिर महापुरुष, कोतवाल, थानापति, असंधारी, महंत, महंत श्री, भंडारी, अधिकारी सचिव, मंडलेश्वर का पद दिया जाता है। सबसे अंत में महामंडलेश्वर का पद दिया जाता है। महामंडलेश्वर का काम सनातन धर्म का प्रचार करना, संसार में ज्ञान का प्रकाश फैलाना और अज्ञानी लोगों को मानवता का सही रास्ता दिखाना है। संन्यासी बनना आसान नहीं है। इस प्रक्रिया में अपना पिंडदान भी किया जाता है। इसके साथ ही पूर्वजों का पिंडदान भी किया जाता है। इसके बाद उनकी शिखा रखी जाती है, जिसे अखाड़े में प्रवेश करने पर काट दिया जाता है। फिर उन्हें दीक्षा दी जाती है और इसके बाद पट्टाभिषेक होता है।
क्या है पट्टाभिषेक अनुष्ठान (Pattabhisheka Ritual)
पट्टाभिषेक अनुष्ठान के अनुसार, दूध, घी, शहद, दही और चीनी से बने पंचामृत से संन्यासी का अभिषेक किया जाता है। अखाड़े की ओर से चादर चढ़ाई जाती है। 13 अखाड़ों के संतों का स्वागत महंत समुदाय के लोग पट्टा पहनाकर करते हैं। श्री पंचायती अखाड़ा महानिर्वाणी की स्थापना करीब 1200 साल पहले अटल अखाड़े से जुड़े 8 संतों ने की थी। यह अखाड़ा भारत का दूसरा सबसे बड़ा अखाड़ा है। इसके इष्टदेव भगवान शिव हैं। अखाड़े को शक्ति के रूप में दिए गए दो भालों के नाम सूर्य प्रकाश और भैरव प्रकाश हैं। इस अखाड़े में प्रवेश के लिए कठिन प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। किसी भी तरह की जिम्मेदारी का पद देने के लिए लोकतांत्रिक तरीका अपनाया जाता है।
(हिन्दुस्थान समाचार के इनपुट के साथ)
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