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Social Security Code (Central) Rules 2025: गिग वर्कर्स के लिए जारी नए नियम में क्या-क्या है खास?
Authored By: Ranjan Gupta
Published On: Friday, January 2, 2026
Last Updated On: Friday, January 2, 2026
क्रिसमस और न्यू ईयर 2026 के बीच हड़ताल कर रहे गिग वर्कर्स के लिए राहत भरी खबर है. श्रम मंत्रालय ने Social Security Code Rules 2025 का ड्राफ्ट जारी किया है, जिसमें रजिस्ट्रेशन, बीमा, यूनिक आईडी और सोशल सिक्योरिटी फंड जैसी अहम व्यवस्थाएं शामिल हैं. आइए इन नए नियम को 10 प्वांइट्स में समझते हैं..
Authored By: Ranjan Gupta
Last Updated On: Friday, January 2, 2026
डिलीवरी ऐप्स पर काम करने वाले गिग वर्कर्स (Gig Workers) लंबे समय से बेहतर सैलरी, सुरक्षित कामकाजी हालात और सामाजिक सुरक्षा की मांग कर रहे हैं. इसी बीच केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाया है. श्रम और रोजगार मंत्रालय ने Social Security Code (Central) Rules, 2025 का ड्राफ्ट नोटिफाई किया है. इसका मकसद गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स को पहली बार एक संगठित सोशल सिक्योरिटी फ्रेमवर्क के दायरे में लाना है. यह घोषणा ऐसे वक्त आई है, जब नए साल की पूर्व संध्या पर देशभर में गिग वर्कर्स की हड़ताल ने कंपनियों की चिंता बढ़ा दी थी.
Social Security Code Rules 2025: गिग वर्कर्स के लिए क्या बदलेगा?
ड्राफ्ट नियमों में गिग वर्कर्स को सामाजिक सुरक्षा देने के लिए स्पष्ट शर्तें और व्यवस्थाएं तय की गई हैं. सरकार का दावा है कि इससे करोड़ों वर्कर्स को पहचान, सुरक्षा और भविष्य की गारंटी मिलेगी.
ड्राफ्ट रूल्स की 10 बड़ी बातें
- सोशल सिक्योरिटी लाभ पाने के लिए गिग वर्कर को कम से कम 90 दिन एक ही एग्रीगेटर के साथ काम करना होगा.
- अगर वर्कर एक से ज्यादा एग्रीगेटर के साथ काम करता है, तो उसे पिछले वित्त वर्ष में कुल 120 दिन काम करना जरूरी होगा.
- जिस दिन से कोई वर्कर कमाई शुरू करता है, उसी दिन से उसे एग्रीगेटर से जुड़ा माना जाएगा, चाहे कमाई कितनी भी कम क्यों न हो.
- किसी भी कैलेंडर दिन हुई कमाई को एलिजिबिलिटी के लिए गिना जाएगा.
- अगर एक वर्कर एक ही दिन में कई एग्रीगेटर के लिए काम करता है, तो हर एग्रीगेटर को अलग-अलग दिन के रूप में गिना जाएगा.
- 16 साल से अधिक उम्र के गिग वर्कर्स आधार नंबर और जरूरी दस्तावेजों के जरिए रजिस्ट्रेशन कर सकेंगे.
- एग्रीगेटर्स को गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स का डेटा एक सेंट्रल पोर्टल पर साझा करना होगा, ताकि यूनिक आईडी या यूनिवर्सल अकाउंट नंबर जारी किया जा सके.
- हर रजिस्टर्ड वर्कर को डिजिटल या फिजिकल आईडी कार्ड मिलेगा, जिसमें फोटो और जरूरी जानकारी होगी.
- केंद्र सरकार एक अथॉरिटी या एजेंसी नियुक्त करेगी, जो एग्रीगेटर्स से योगदान इकट्ठा कर सोशल सिक्योरिटी फंड में जमा करेगी.
- 60 साल की उम्र के बाद या तय न्यूनतम कार्यदिवस पूरे न होने पर वर्कर सोशल सिक्योरिटी स्कीम के लिए एलिजिबल नहीं रहेगा.
क्यों हड़ताल पर उतरे गिग वर्कर्स?
नए साल 2026 की पूर्व संध्या, यानी 31 दिसंबर 2025, को देशभर में गिग और डिलीवरी वर्कर्स ने हड़ताल का ऐलान किया. महाराष्ट्र, कर्नाटक, दिल्ली-एनसीआर, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु की यूनियनों ने इसमें सक्रिय भागीदारी की. यूनियनों का दावा है कि 1 लाख से ज्यादा वर्कर्स ने ऐप पर लॉगइन नहीं किया या सीमित समय के लिए ही काम किया.
इससे पहले क्रिसमस के दिन भी इसी तरह की हड़ताल देखने को मिली थी. वर्कर्स का कहना है कि काम का दबाव लगातार बढ़ रहा है, लेकिन वेतन, सुरक्षा और सम्मान में कोई ठोस सुधार नहीं हो रहा.
डिलीवरी वर्कर्स की जमीनी हकीकत
10 मिनट डिलीवरी मॉडल ने काम को और जोखिम भरा बना दिया है. तेज रफ्तार, ट्रैफिक और मौसम की मार के बीच गिग वर्कर्स हादसों का शिकार हो रहे हैं. धूप, बारिश, ठंड और गर्मी में दिन-रात काम करने के बावजूद अधिकतर वर्कर्स को न तो दुर्घटना बीमा मिलता है और न ही स्वास्थ्य बीमा या पेंशन जैसी सुविधाएं.
गिग वर्कर्स की 9 प्रमुख मांगें
वर्कर्स की ओर से जारी बयान में साफ तौर पर कहा गया है कि:
- फेयर और ट्रांसपेरेंट वेतन सिस्टम लागू किया जाए.
- 10 मिनट डिलीवरी मॉडल तुरंत बंद हो.
- बिना प्रक्रिया आईडी ब्लॉक और पेनल्टी पर रोक लगे.
- सुरक्षा के लिए जरूरी गियर और इंतजाम किए जाएं.
- एल्गोरिदम के आधार पर भेदभाव न हो.
- प्लेटफॉर्म और कस्टमर्स से सम्मानजनक व्यवहार मिले.
- तय समय से ज्यादा काम न कराया जाए और ब्रेक मिले.
- ऐप और टेक्निकल सपोर्ट मजबूत किया जाए.
- स्वास्थ्य बीमा, दुर्घटना कवर और पेंशन सुनिश्चित हो.
जोमैटो के CEO दीपेंद्र गोयल ने क्या कहा?
गिग वर्कर्स के सवालों पर जोमैटो के CEO दीपेंद्र गोयल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर अपनी बात रखी. उन्होंने कहा कि 10 मिनट डिलीवरी मॉडल राइडर्स पर दबाव डालने के लिए नहीं है. यह मॉडल मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर और नजदीकी स्टोर्स की वजह से संभव हो पाता है.
उनके मुताबिक, राइडर्स के ऐप में कोई टाइमर नहीं दिखता और न ही उन्हें यह बताया जाता है कि ग्राहक को डिलीवरी का वादा कितने मिनट में किया गया है.
10 मिनट डिलीवरी का गणित
गोयल के अनुसार:
| प्रोसेस | औसत समय |
|---|---|
| ऑर्डर पैकिंग | 2.5 मिनट |
| डिलीवरी दूरी | 2 किमी से कम |
| औसत गति | 15 किमी/घंटा |
| कुल डिलीवरी समय | लगभग 10 मिनट |
उनका दावा है कि इसमें राइडर्स को तेज गाड़ी चलाने के लिए मजबूर नहीं किया जाता.
हड़ताल के बीच Zomato और Swiggy का बड़ा ऐलान
New Year Eve पर डिलीवरी में रुकावट की आशंका के बीच जोमैटो और स्विगी ने इंसेंटिव बढ़ाने का फैसला लिया.
Zomato का ऑफर
- शाम 6 बजे से रात 12 बजे तक हर ऑर्डर पर 120 से 150 रुपये.
- दिनभर में 3,000 रुपये तक कमाई का वादा.
- ऑर्डर रिजेक्ट या कैंसल करने पर पेनल्टी अस्थायी रूप से माफ.
Swiggy ने बढ़ाया इंसेंटिव
- 31 दिसंबर और 1 जनवरी के बीच 10,000 रुपये तक कमाई का ऑफर.
- पीक आवर्स में 6 घंटे के लिए 2,000 रुपये तक अतिरिक्त कमाई.
कौन हैं गिग वर्कर्स?
डिलीवरी करने वाले लोग गिग वर्कर्स की श्रेणी में आते हैं. गिग वर्कर्स वे कर्मचारी होते हैं जो किसी स्थायी नौकरी के बजाय काम के बदले भुगतान प्राप्त करते हैं. आईटी सेक्टर से लेकर ई-कॉमर्स और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म तक, गिग वर्कर्स की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है. आज के डिजिटल दौर में फूड डिलीवरी, कैब सर्विस, लॉजिस्टिक्स और टेक्नोलॉजी से जुड़े कई काम इन्हीं के भरोसे चलते हैं. यह वर्ग तेजी से बढ़ रहा है और देश की अर्थव्यवस्था में भी अपना योगदान दे रहा है.
हालांकि, इतनी अहम भूमिका निभाने के बावजूद गिग वर्कर्स को अक्सर उचित वेतन और जरूरी सुविधाएं नहीं मिल पातीं. कई मामलों में कंपनियां इन्हें कर्मचारी मानने के बजाय “पार्टनर” या “फ्रीलांसर” का दर्जा देती हैं, जिससे उनकी जिम्मेदारी से बचा जा सके. इसका सीधा असर इनकी सामाजिक सुरक्षा पर पड़ता है. न तो इन्हें स्वास्थ्य बीमा मिलता है और न ही भविष्य के लिए कोई स्थायी सुरक्षा व्यवस्था होती है. दुर्घटना, बीमारी या काम छूटने की स्थिति में इन्हें खुद ही हालात से जूझना पड़ता है. यही कारण है कि गिग वर्कर्स से जुड़ी समस्याएं लगातार चर्चा और बहस का विषय बनी हुई हैं.
निष्कर्ष
Social Security Code Rules 2025 का ड्राफ्ट गिग वर्कर्स के लिए एक अहम शुरुआत माना जा रहा है. हालांकि, यूनियनों का कहना है कि असली बदलाव तब आएगा, जब ये नियम जमीन पर पूरी मजबूती से लागू होंगे. फिलहाल, हड़ताल और सरकारी पहल ने यह साफ कर दिया है कि गिग इकॉनमी अब सिर्फ ऐप्स तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह श्रम अधिकारों का बड़ा मुद्दा बन चुकी है.
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