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राज्यसभा चुनाव 2026 में बदला सियासी गणित, मजबूत होती बीजेपी-कांग्रेस, कमजोर पड़ते क्षेत्रीय दल, संकट में पवार-लालू-उद्धव खेमे
Authored By: Nishant Singh
Published On: Saturday, February 21, 2026
Last Updated On: Saturday, February 21, 2026
देश के 10 राज्यों की 37 राज्यसभा सीटों पर होने वाला चुनाव सियासी संतुलन बदलता दिखा रहा है. बदले विधानसभा गणित से बीजेपी और कांग्रेस को फायदा मिलता नजर आ रहा है, जबकि लालू, शरद पवार और उद्धव ठाकरे जैसे नेताओं की पार्टियों के लिए राह मुश्किल है. कई क्षेत्रीय दलों के राज्यसभा से बाहर होने का खतरा बढ़ गया है.
Authored By: Nishant Singh
Last Updated On: Saturday, February 21, 2026
Rajya Sabha Elections 2026: 16 मार्च 2026 को देश के 10 राज्यों की 37 राज्यसभा सीटों पर होने वाले चुनाव सिर्फ औपचारिक प्रक्रिया नहीं रह गए हैं, बल्कि ये चुनाव देश की सियासी दिशा तय करने वाले साबित हो सकते हैं. विधानसभा चुनावों के बाद कई राज्यों में शक्ति संतुलन पूरी तरह बदल चुका है और इसका सीधा असर राज्यसभा के नंबर गेम पर दिख रहा है. इस बदले समीकरण में राष्ट्रीय दलों को मजबूती मिलती नजर आ रही है, जबकि कई क्षेत्रीय दलों की पकड़ ढीली पड़ती दिख रही है. खास तौर पर लालू प्रसाद यादव, शरद पवार और उद्धव ठाकरे की पार्टियों के लिए यह चुनाव किसी इम्तिहान से कम नहीं हैं.
किसे फायदा, किसे नुकसान?
इन 37 सीटों में अभी एनडीए के पास 15 और इंडिया ब्लॉक के पास 18 सीटें हैं, जबकि 4 सीटें अन्य दलों के खाते में हैं. बदले हालात में अनुमान है कि एनडीए की सीटें बढ़कर 18 तक पहुंच सकती हैं, वहीं इंडिया ब्लॉक 14-15 सीटों तक सिमट सकता है. इस बदलाव का सबसे बड़ा कारण बिहार, महाराष्ट्र, ओडिशा और तेलंगाना जैसे राज्यों में विधानसभा की बदली हुई तस्वीर है. ऐसे में भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस को फायदा होता दिख रहा है, जबकि क्षेत्रीय दलों के लिए राह मुश्किल हो रही है.
बिहार: आरजेडी के लिए सबसे बड़ी चुनौती
बिहार की पांच राज्यसभा सीटों पर मुकाबला सबसे ज्यादा रोचक और उलझा हुआ है. मौजूदा विधानसभा गणित के मुताबिक एनडीए के पास 202 विधायक हैं, जबकि महागठबंधन के पास सिर्फ 35 और 7 अन्य विधायक हैं. एक राज्यसभा सीट जीतने के लिए 41 वोट चाहिए, ऐसे में महागठबंधन अपने दम पर एक भी सीट जीतने की स्थिति में नहीं है. इसका सीधा नुकसान राष्ट्रीय जनता दल को होता दिख रहा है. एनडीए चार सीटें आसानी से जीत सकता है और पांचवीं सीट के लिए भी उसके पास मजबूत संभावना है. AIMIM और बसपा जैसे दलों का अलग रुख आरजेडी की मुश्किलें और बढ़ा रहा है.
महाराष्ट्र: पवार-उद्धव की सियासी जमीन तंग
महाराष्ट्र की सात राज्यसभा सीटों पर बदले समीकरणों ने महाविकास आघाड़ी की मुश्किलें बढ़ा दी हैं. यहां एक सीट जीतने के लिए 37 विधायकों का समर्थन चाहिए. बीजेपी, शिंदे गुट की शिवसेना और अजित पवार गुट की एनसीपी मिलकर एनडीए के पास 228 विधायक हैं, जिससे वह छह सीटें लगभग पक्की कर सकता है. दूसरी ओर, शरद पवार, उद्धव ठाकरे और कांग्रेस मिलकर भी सिर्फ एक सीट के करीब पहुंच पाते हैं. ऐसे में सवाल यह है कि क्या पवार की वापसी होगी या उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) अपनी सीट बचा पाएगी- दोनों का एक साथ बच पाना मुश्किल दिख रहा है.
लेफ्ट और बीआरएस का लगभग सफाया
पश्चिम बंगाल में टीएमसी अपनी चार सीटें बचा लेगी, लेकिन एक सीट सीपीएम के हाथ से निकलकर बीजेपी के खाते में जा सकती है. इसका मतलब है कि बंगाल से लेफ्ट का राज्यसभा में प्रतिनिधित्व खत्म हो सकता है. तेलंगाना में दोनों सीटें कांग्रेस के खाते में जाने की संभावना है, जिससे बीआरएस को बड़ा झटका लगेगा. कुल मिलाकर लेफ्ट और बीआरएस दोनों के लिए यह चुनाव निराशाजनक साबित हो सकते हैं.
ओडिशा से असम तक बदला संतुलन
ओडिशा की चार सीटों में बीजेपी तीन सीटें जीत सकती है और बीजेडी को एक सीट से संतोष करना पड़ सकता है. तमिलनाडु में डीएमके चार और AIADMK एक सीट जीत सकती है, जबकि एक सीट पर मुकाबला रोचक रहेगा. असम में बीजेपी दो सीटें बरकरार रख सकती है, लेकिन असम गण परिषद को नुकसान उठाना पड़ सकता है. छत्तीसगढ़, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश में भी कांग्रेस और बीजेपी के बीच सीटों की अदला-बदली के आसार हैं.
निष्कर्ष: क्षेत्रीय दलों के लिए खतरे की घंटी
कुल मिलाकर 2026 का राज्यसभा चुनाव यह साफ संकेत दे रहा है कि राष्ट्रीय दलों का पलड़ा भारी होता जा रहा है. एनडीए और कांग्रेस दोनों को फायदा मिलता दिख रहा है, जबकि कई क्षेत्रीय दल या तो हाफ हो रहे हैं या पूरी तरह साफ होने की कगार पर हैं. यह चुनाव न सिर्फ सीटों का गणित बदलेगा, बल्कि आने वाले समय की सियासत की दिशा भी तय करेगा.
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