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Global Protests: बीते 6 महीनों में दुनिया में विरोध प्रदर्शन, जानें कहां गिरी सरकार, कहां फैली अशांति?
Authored By: Nishant Singh
Published On: Saturday, January 17, 2026
Last Updated On: Saturday, January 17, 2026
Global Protests: बीते छह महीनों में दुनिया के कई देशों में जनता का गुस्सा सड़कों पर देखने को मिला. महंगाई, बेरोजगारी, राजनीतिक फैसलों और आज़ादी पर पाबंदियों ने लोगों को विरोध के लिए मजबूर किया. कहीं युवाओं ने नेतृत्व किया तो कहीं सरकारें ही गिर गईं. यह दौर वैश्विक अस्थिरता और जनता की बढ़ती ताकत की साफ तस्वीर पेश करता है.
Authored By: Nishant Singh
Last Updated On: Saturday, January 17, 2026
Global Protests: दुनिया भर में पिछले छह महीनों में अस्थिरता और विरोध प्रदर्शन ने राजनीतिक स्थिरता को हिलाकर रख दिया है. दक्षिण एशिया से लेकर यूरोप और अफ्रीका तक, महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और नागरिक स्वतंत्रताओं पर पाबंदियों के खिलाफ लोग सड़कों पर उतर आए. युवा समूहों का गुस्सा और राजनीतिक असंतोष कई देशों में सरकारों को भी हिला गया. आइए जानते हैं, बीते छह महीनों में कौन से देश अशांति की आग में झुलसे और कहां सरकारें गिरी.
नेपाल: सोशल मीडिया प्रतिबंध ने भड़काई आग
नेपाल में सितंबर 2025 में देश के राजनीतिक इतिहास का एक बड़ा पल आया. काठमांडू और अन्य बड़े शहरों में युवाओं ने विरोध प्रदर्शन शुरू किए, जब सरकार ने फेसबुक, इंस्टाग्राम और टिक-टोक जैसे लोकप्रिय सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर प्रतिबंध लगाने का फैसला किया. इसके साथ ही लंबे समय से चली आ रही बेरोजगारी और भ्रष्टाचार की समस्याओं ने युवाओं को सड़कों पर ला दिया. प्रदर्शन तेजी से हिंसक हो गया और दंगे भड़क गए. स्थिति को देखते हुए प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को इस्तीफा देना पड़ा. नेपाल का यह संघर्ष युवाओं की ताकत और डिजिटल अधिकारों के प्रति उनकी संवेदनशीलता का प्रतीक बन गया.
बांग्लादेश: छात्र आंदोलन ने बदली राजनीतिक तस्वीर
बांग्लादेश में विद्रोह तो पहले शुरू हुआ था, लेकिन इसके नतीजे पिछले छह महीनों में सामने आए. सरकारी नौकरियों में कोटा प्रणाली के खिलाफ छात्र नेतृत्व वाले विरोध प्रदर्शन पूरे देश में फैल गए. 5 अगस्त 2024 तक विरोध इतना उग्र हो गया कि प्रधानमंत्री शेख हसीना को इस्तीफा देना पड़ा और उन्हें देश छोड़ना पड़ा. इसके बाद नोबेल पुरस्कार विजेता मुहम्मद युनूस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार ने सत्ता संभाली. हालांकि, बीते महीनों में हिंसा और धार्मिक अल्पसंख्यकों, खासकर हिंदुओं, पर हमलों की घटनाएं लगातार देखने को मिलीं. बांग्लादेश की राजनीति अब भी अस्थिरता की राह पर है.
ईरान: आर्थिक संकट और महंगाई ने भड़का दिया जनता का गुस्सा
ईरान 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद से अपने सबसे गंभीर आंतरिक संकट का सामना कर रहा है. दिसंबर 2025 के आखिर में गिरती अर्थव्यवस्था, महंगाई और रियाल के ऐतिहासिक पतन ने जनता को सड़कों पर ला दिया. प्रदर्शन जल्दी ही पूरे देश में फैल गए, लेकिन आम लोगों में असंतोष की लहर ने देश को अस्थिर कर दिया. आर्थिक संकट और राजनीतिक दबाव के बीच ईरान में हालात बेहद नाजुक बने हुए हैं.
फ्रांस: बजट और संसदीय गतिरोध ने गिराई सरकार
यूरोप में, फ्रांस ने पिछले छह महीनों में बड़े विरोध प्रदर्शन देखे. सितंबर से दिसंबर 2025 तक बजट फैसलों, माइग्रेशन पॉलिसी और संसदीय गतिरोध को लेकर जनता सड़कों पर उतरी. सरकार ने बिना संसदीय मंजूरी के वित्तीय कानून पारित करने की कोशिश की, जिससे जनता का गुस्सा और बढ़ गया. यह अशांति अंततः अविश्वास प्रस्ताव में बदल गई और प्रधानमंत्री फ्रांस्वा बायरू की सरकार गिर गई. फ्रांस का यह राजनीतिक संकट दर्शाता है कि नागरिक असंतोष और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का सम्मान कितना महत्वपूर्ण है.
मेडागास्कर: मूलभूत सुविधाओं की कमी ने फैलाई हिंसा
मेडागास्कर के लोग भी 2025 के अंत में हिंसक विरोध प्रदर्शन का सामना कर रहे थे. बिजली और पानी की पुरानी कमी, बढ़ती बेरोजगारी और सरकारी विफलताओं ने युवाओं को सड़कों पर ला दिया. बड़े शहरों में प्रदर्शन तेजी से फैल गए और स्थिति को देखते हुए राष्ट्रपति एंड्री राजोएलिना को देश छोड़ना पड़ा. उन्होंने अपनी सरकार को बर्खास्त कर दिया. मेडागास्कर की यह घटना बताती है कि मूलभूत जरूरतों की अनदेखी किस तरह राजनीतिक अस्थिरता को जन्म देती है.
वैश्विक संदेश: युवाओं की शक्ति और असंतोष
बीते छह महीनों की यह कहानी साफ संदेश देती है कि दुनिया के युवा और सामान्य नागरिक भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, महंगाई और आजादी पर पाबंदियों के खिलाफ सड़कों पर उतर सकते हैं. नेपाल, बांग्लादेश, ईरान, फ्रांस और मेडागास्कर की घटनाएं यह साबित करती हैं कि सरकारें केवल कानून और सत्ता से नहीं, बल्कि जनता की आवाज़ और भरोसे से टिकती हैं. वैश्विक स्तर पर यह विरोध प्रदर्शन यह भी दर्शाते हैं कि लोकतंत्र और नागरिक स्वतंत्रता की रक्षा आज भी सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है.
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