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केजरीवाल-सिसोदिया को शराब नीति मामले में बड़ी राहत: कोर्ट ने कहा सबूत कमजोर, ऐसे हुए बरी
Authored By: Nishant Singh
Published On: Friday, February 27, 2026
Last Updated On: Friday, February 27, 2026
Kejriwal Sisodia: दिल्ली के शराब नीति मामले में राउज एवेन्यू कोर्ट ने अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया समेत सभी 23 आरोपियों को बरी कर दिया. अदालत ने कहा कि अभियोजन ठोस और पर्याप्त सबूत पेश नहीं कर सका. गवाहों के बयानों में विरोधाभास पाए गए और आपराधिक साजिश की थ्योरी साबित नहीं हुई, इसलिए सभी को आरोपों से मुक्त किया गया.
Authored By: Nishant Singh
Last Updated On: Friday, February 27, 2026
Kejriwal Sisodia: दिल्ली के चर्चित शराब नीति मामले में बड़ा मोड़ तब आया जब राउज एवेन्यू कोर्ट ने पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया समेत सभी 23 आरोपियों को बरी कर दिया. अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि गंभीर आरोप जरूर लगाए गए, लेकिन उन्हें साबित करने के लिए जो ठोस और पर्याप्त सबूत चाहिए थे, वे पेश नहीं किए जा सके. सिर्फ आरोपों और आशंकाओं के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता. कोर्ट ने कहा कि कानून सबूतों पर चलता है, अंदाजों पर नहीं.
अदालत ने क्यों कहा – सबूत कमजोर हैं?
फैसला सुनाते हुए अदालत ने जांच एजेंसी की चार्जशीट और दलीलों की विस्तार से समीक्षा की. जज ने पाया कि अभियोजन पक्ष कई अहम दस्तावेज और कानूनी राय को रिकॉर्ड पर स्पष्ट रूप से पेश नहीं कर सका. कुछ गवाहों के बयान आपस में मेल नहीं खाते थे, जबकि कुछ बयान सुनी-सुनाई बातों पर आधारित थे. अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि केवल एक कमजोर और अपुष्ट गवाह के बयान के आधार पर आपराधिक साजिश स्थापित नहीं की जा सकती. ‘गंभीर संदेह’ की जो कानूनी कसौटी होती है, वह भी यहां पूरी नहीं हुई.
केजरीवाल पर कोर्ट की अहम टिप्पणियां
अरविंद केजरीवाल को कथित साजिश का मुख्य सूत्रधार बताया गया था, लेकिन अदालत ने कहा कि इस दावे के समर्थन में कोई प्रत्यक्ष और ठोस सामग्री पेश नहीं की गई. कैबिनेट द्वारा नीति को मंजूरी देना अपने आप में आपराधिक कृत्य नहीं माना जा सकता. अदालत ने यह भी कहा कि बिना पर्याप्त सबूत के किसी सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति को आरोपी बनाना कानून के सिद्धांतों के खिलाफ है. केवल राजनीतिक पद या नाम का उल्लेख होना, अपराध साबित करने के लिए काफी नहीं होता.
मनीष सिसोदिया को लेकर क्या बोली अदालत?
मनीष सिसोदिया के मामले में अदालत ने साफ कहा कि उनके खिलाफ पहली नजर में भी आपराधिक मंशा के संकेत नहीं मिलते. दस्तावेजों और बयानों को साथ पढ़ने पर यह सामने आया कि नीति निर्माण के दौरान संस्थागत स्तर पर चर्चा और विचार-विमर्श हुआ था. अभियोजन की ‘बड़ी साजिश’ वाली थ्योरी में दम नजर नहीं आया. अदालत ने यह भी कहा कि सिसोदिया के खिलाफ न तो कोई ठोस सामग्री है, न कोई बरामदगी, और न ही अवैध लाभ लेने या दिलाने का स्पष्ट प्रमाण.
जांच पर उठे कड़े सवाल
सुनवाई के दौरान जज ने जांच अधिकारी से कई तीखे सवाल पूछे. चार्जशीट के साथ कबूलनामे की प्रति क्यों नहीं जोड़ी गई? कानूनी राय को अलग दस्तावेज के रूप में क्यों पेश नहीं किया गया? जिन तीन कानूनी रायों का हवाला दिया गया, वे अभियोजन के पक्ष में नहीं थीं, फिर भी उन्हें समर्थन के रूप में क्यों बताया गया? अदालत ने यह भी कहा कि चार्जशीट दाखिल करते समय सभी दस्तावेजों की गंभीरता से जांच जरूरी है. कुछ गवाहों के बयान तो अभियोजन के दावों के उलट थे.
10 बड़े बिंदु जिन पर टिका फैसला
अदालत ने अपने आदेश में कई महत्वपूर्ण बिंदु गिनाए. पहला, केजरीवाल के खिलाफ प्रत्यक्ष सबूत नहीं. दूसरा, एक कमजोर गवाह के बयान पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता. तीसरा, नीति में व्यक्तिगत हेरफेर का कोई प्रमाण नहीं. चौथा, जांच प्रक्रिया में निष्पक्षता पर सवाल. पांचवां, एक आरोपी को बिना पर्याप्त आधार के मुख्य आरोपी बनाना. छठा, 36 पन्नों की कथित रिपोर्ट में विरोधाभास. सातवां, कथित बैठकों का कोई दस्तावेजी या इलेक्ट्रॉनिक सबूत नहीं. आठवां, विरोधाभासी और बाद में जोड़े गए बयान. नौवां, अवैध मांग या रिश्वत का स्पष्ट प्रमाण नहीं. और दसवां, ‘गंभीर संदेह’ की कानूनी कसौटी पूरी न होना.
सीबीआई अब क्या करेगी?
फैसले के बाद सीबीआई ने संकेत दिया है कि वह इस निर्णय को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती देगी. एजेंसी का कहना है कि विशेष अदालत में कुछ पहलुओं पर पर्याप्त विचार नहीं हुआ. अब उच्च न्यायालय में अपील दाखिल कर इन बिंदुओं को दोबारा रखा जाएगा. यानी कानूनी लड़ाई अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है.
आखिर कैसे हुए सभी 23 आरोपी बरी?
अंत में अदालत ने कहा कि आपराधिक साजिश या भ्रष्टाचार जैसे मामलों में केवल संदेह काफी नहीं होता. ठोस, प्रत्यक्ष और कानूनी रूप से स्वीकार्य सबूत जरूरी होते हैं. चूंकि अभियोजन पक्ष इन मानकों को पूरा नहीं कर सका, इसलिए आरोप तय करने के चरण पर ही सभी आरोपियों को डिस्चार्ज कर दिया गया. इस तरह यह मामला फिलहाल आरोपों से मुक्ति के साथ समाप्त हुआ, लेकिन इसकी कानूनी और राजनीतिक गूंज आगे भी सुनाई देती रह सकती है.
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