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हिमाचल में मानसून का कहर: 157 मौतें, 886 करोड़ का नुकसान और 259 सड़कें बंद, आखिर क्यों बढ़ रही है तबाही?
Authored By: Nishant Singh
Published On: Wednesday, August 12, 2026
Last Updated On: Thursday, August 13, 2026
Monsoon havoc in Himachal: हिमाचल प्रदेश में मानसून की भारी बारिश ने 30 जून से 9 अगस्त के बीच 157 लोगों की जान ले ली और 257 लोग घायल हुए. करीब 886 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ, जबकि 259 सड़कें बंद हैं. विशेषज्ञ जलवायु परिवर्तन के साथ अवैज्ञानिक निर्माण को भी बढ़ते आपदा जोखिम की वजह मानते हैं.
Authored By: Nishant Singh
Last Updated On: Thursday, August 13, 2026
Monsoon havoc in Himachal: हिमाचल प्रदेश में इस मानसून ने बारिश के साथ तबाही की ऐसी तस्वीर दिखाई है, जिसने पहाड़ी राज्यों की संवेदनशीलता पर फिर सवाल खड़े कर दिए हैं. 30 जून से 9 अगस्त के बीच भारी बारिश, भूस्खलन और अन्य घटनाओं में कम से कम 157 लोगों की मौत हुई, जबकि 257 लोग घायल हुए हैं. इस दौरान सड़कें टूटीं, बिजली और पानी की आपूर्ति प्रभावित हुई और बड़ी संख्या में सरकारी व निजी संपत्तियों को नुकसान पहुंचा.
मौतों का सबसे बड़ा आंकड़ा किन जिलों में?
प्राकृतिक आपदा से हुई मौतों में सबसे ज्यादा मामले चंबा जिले से सामने आए हैं. इसके बाद कांगड़ा और कुल्लू प्रभावित जिलों में रहे. राजधानी शिमला में भी बड़ी संख्या में लोगों की जान गई. मौतों के कारणों पर नजर डालें तो इनमें सिर्फ भूस्खलन ही नहीं, बल्कि सड़क हादसे, डूबने, सांप के काटने और अन्य दुर्घटनाएं भी शामिल हैं.
जिलेवार मौतों का आंकड़ा:
- चंबा: 24 मौतें
- कुल्लू: 21 मौतें
- कांगड़ा: 21 मौतें
- शिमला: 20 मौतें
- स्पीति: 18 मौतें
- लाहौल: 18 मौतें
इन आंकड़ों से साफ है कि आपदा का असर केवल एक इलाके तक सीमित नहीं रहा. पहाड़ी और मैदानी दोनों तरह के क्षेत्रों में लोगों को अलग-अलग मुश्किलों का सामना करना पड़ा.
886 करोड़ की संपत्ति को नुकसान
राज्य के स्टेट इमरजेंसी ऑपरेशन्स सेंटर यानी SEOC की रिपोर्ट के मुताबिक, मानसूनी आपदा से करीब 900 संपत्तियों और सार्वजनिक निर्माण से जुड़ी परिसंपत्तियों को नुकसान पहुंचा है. कुल नुकसान का अनुमान लगभग 886 करोड़ रुपये लगाया गया है. सड़कों और दूसरे बुनियादी ढांचे को नुकसान होने से कई इलाकों में सामान्य जनजीवन प्रभावित हुआ है.
259 सड़कें बंद, मंडी सबसे ज्यादा प्रभावित
लगातार बारिश और भूस्खलन का सीधा असर हिमाचल के सड़क नेटवर्क पर पड़ा है. राज्य में 259 सड़कें बंद हुई हैं. इनमें मंडी सबसे ज्यादा प्रभावित रहा, जहां 120 सड़कें बाधित हुईं. चंबा में 42, कुल्लू में 40 और शिमला में 30 सड़कें प्रभावित हुईं. पहाड़ी इलाकों में सड़क संपर्क टूटने का मतलब सिर्फ यातायात रुकना नहीं है, बल्कि कई बार जरूरी सामान, चिकित्सा सेवाओं और राहत सामग्री की पहुंच भी मुश्किल हो जाती है.
बिजली और पानी की सप्लाई पर भी असर
बारिश और भूस्खलन ने बिजली व्यवस्था को भी प्रभावित किया है. मंडी में सबसे ज्यादा 63 डिस्ट्रीब्यूशन ट्रांसफॉर्मर रीजन (DTR) प्रभावित हुए, जबकि अन्य इलाकों में भी बिजली आपूर्ति पर असर पड़ा. पानी की सप्लाई से जुड़ी समस्याएं भी सामने आईं. शिमला में ऐसी 12 घटनाएं दर्ज हुईं, जबकि हमीरपुर में 5 और बिलासपुर में 2 जगह पानी की आपूर्ति बाधित हुई.
क्या सिर्फ बारिश जिम्मेदार है?
हिमाचल की हर मानसूनी आपदा के बाद एक सवाल उठता है कि क्या केवल मौसम को दोष देना पर्याप्त है? केंद्र सरकार के अनुसार जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालयी क्षेत्र में अत्यधिक बारिश की घटनाएं बढ़ रही हैं. लेकिन इसके साथ ही मानवीय गतिविधियों और अवैज्ञानिक निर्माण से आपदा का जोखिम और बढ़ सकता है.
पहाड़ी इलाकों में सड़क चौड़ीकरण, निर्माण, ढलानों से छेड़छाड़ और प्राकृतिक जल निकासी में बदलाव जैसी गतिविधियां संवेदनशील क्षेत्रों को और कमजोर कर सकती हैं. इसलिए हिमाचल को केवल राहत और बचाव पर निर्भर रहने के बजाय लंबे समय की ऐसी योजना की जरूरत है, जिसमें सुरक्षित निर्माण, मजबूत सड़क व्यवस्था, बेहतर मौसम चेतावनी और पर्यावरण संरक्षण साथ-साथ चलें.
अभी भी खतरा टला नहीं
मौसम विभाग ने राज्य के पांच जिलों में ऑरेंज अलर्ट जारी किया है. इसका मतलब है कि आने वाले समय में भी भारी बारिश का खतरा बना हुआ है. ऐसे में प्रशासन के सामने राहत कार्यों के साथ-साथ संवेदनशील इलाकों में लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की चुनौती है.
हिमाचल की मौजूदा तस्वीर सिर्फ एक प्राकृतिक आपदा की कहानी नहीं है. यह पहाड़ों के साथ विकास के संतुलन की भी चेतावनी है. अगर बदलते मौसम के साथ निर्माण और आपदा प्रबंधन की रणनीति नहीं बदली गई, तो हर मानसून में नुकसान का यह सिलसिला और गंभीर हो सकता है.
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