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China Mega Dam: ब्रह्मपुत्र पर चीन की बड़ी तैयारी, भारत के सामने बढ़ी चुनौती
Authored By: Galgotias Times Bureau
Published On: Tuesday, September 22, 2026
Last Updated On: Tuesday, September 22, 2026
ब्रह्मपुत्र पर चीन का विशाल Mega Dam भारत और बांग्लादेश की चिंता बढ़ा रहा है. 60 गीगावाट बिजली वाले इस प्रोजेक्ट से जल सुरक्षा, पर्यावरण और सीमा क्षेत्रों पर क्या असर पड़ेगा? जानिए चीन की पूरी योजना और भारत के सामने मौजूद चुनौतियां.
Authored By: Galgotias Times Bureau
Last Updated On: Tuesday, September 22, 2026
China Mega Dam: नेपाल-चीन सीमा पर 26 अगस्त को ग्लेशियर फटने से हुई भयावह तबाही शायद ही लोगों के जेहन से उतरी होगी. सैकड़ों लोगों की मौत और करोड़ों रुपये के नुकसान की बात तो मौजूं है ही, मगर एक मसला अब भी भारत, नेपाल और बांग्लादेश की चिंता को बढ़ा रहा है कि चीन की नासमझी आखिर कब खत्म होगी और अपने फायदे के लिए क्या वो पड़ोसी मुल्क को खतरे में डालने से नहीं हिचकेगा? सिर्फ अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों और द्विपक्षीय बैठकों में भले चीन भलमनसाहत और अच्छी-अच्छी बातें करे, उस पर भरोसा करना खतरे से खाली नहीं है.
यह बातें इसलिए चर्चा में है क्योंकि पर्यावरण विशेषज्ञ और सैन्य रणनीतिकार भी काफी हद तक यह मानते हैं कि नेपाल में पिछले महीने हुई भयावह घटना मानव निर्मिंत आपदा ही थी.
इस त्रासदी के बाद अनुमान यह था कि चीन यारलुंग त्संगपो नदी, जो अरुणाचल प्रदेश में आकर ब्रह्मपुत्र नदी बन जाती है, पर विशाल हाइड्रोइलेक्ट्रिक बांध (Mega Dam), जिसे वह ‘प्रोजेक्ट ऑफ द सेंचुरी’ कहता है, के निर्माण का इरादा त्याग देगा, विशेषकर इसलिए कि निर्माण-स्थल भारत से लगी सीमा के निकट तिब्बत के भूकंप सक्रिय क्षेत्र में है. प्रस्तावित बांध की अनुमानित लागत 137 बिलियन डॉलर है और इससे 60 गीगावाट बिजली का उत्पादन होगा. यह मेगा डैम भारत और बांग्लादेश के लिए एक गंभीर रणनीतिक, पारिस्थितिक और सुरक्षा चिंता का विषय है.
ब्रह्मा चेलानी ने भारत को चेताया
इस बांध का भारत पर बहुत गहरा असर पड़ेगा. सवाल यह है कि चीन यह बांध(Yarlung Tsangpo Dam) क्यों बना रहा है और इस संदर्भ में भारत को क्या करना चाहिए? क्या यह बांध बीजिंग के विशाल ऊर्जा सुरक्षा लक्ष्यों का हिस्सा है या सीमा वार्ता पर दिल्ली को बैकफुट पर करने की गहरी साजिश? रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी ने इस परियोजना को लेकर भारत की रणनीति और चीन के वैज्ञानिकों की चेतावनियों को अंतरराष्ट्रीय मंच पर उठाने की जरूरत बताई है.
ब्रह्मा चेलानी ने सोशल मीडिया पोस्ट में सवाल उठाया कि अगर भारत चीन की सीमा के ठीक ऊपर ऐसी विशाल परियोजना बनाता, तो बीजिंग पर्यावरण, भूकंपीय खतरे और वैज्ञानिक चिंताओं को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कितना बड़ा अभियान चलाता. उनके मुताबिक भारत को भी चीन के वैज्ञानिकों द्वारा सामने रखी गई चिंताओं को दुनिया के सामने रखना चाहिए.
तथ्य यह है कि यारलुंग त्संगपो को लेकर चीन की महत्त्वाकांक्षी योजनाएं बहुत पुरानी हैं. अपनी 12वीं पंचवर्षीय योजना (2011-2015) में बीजिंग ने यारलुंग के ऊपरी व बीच के हिस्सों में अनेक बांध बनाने प्रस्तावित किए थे, जिसमें डागू डैम (640 मेगावाट), जांगमु डैम (510 मेगावाट) व जियाचा डैम (320 मेगावाट) के अतिरिक्त एक अन्य जेक्सु डैम भी था. जांगमु डैम चल रहा है, जबकि 3 अन्य डैम रुके हुए हैं, क्योंकि उनमें तकनीकी व लॉजिस्टिकल चुनौतियां बाधा उत्पन्न किए हुए हैं.
चीन को उसी की भाषा में देना होगा जवाब
दरअसल, चीन की अतीत की हरकतें बताती हैं कि वह प्रकृति की परवाह नहीं करता है. भारत के साथ सीमा विवाद में नदी उसके लिए राजनीतिक हथियार बन गई है. इसलिए भारत को उत्तर-पूर्व क्षेत्र में अपनी क्षमता व गुंजाइश को निरंतर मजबूत करते रहना चाहिए. साथ ही अपनी कूटनीति और सैन्य क्षमता को भी दुरुस्त करना होगा. क्योंकि लगता यह है कि चीन मेगा बांध बनाने की अपनी योजना को रोकने के लिए तैयार नहीं है. उसने नवीकरणीय ऊर्जा के लिए अपनी 15वीं पंचवर्षीय योजना में इस बांध को शामिल किया है.
भारत को क्या करना चाहिए
भारत को तीन स्तरों पर अपनी रणनीति मजबूत करनी चाहिए. पहला, सीमा पार से आने वाली नदियों के जल प्रवाह की स्वयं निगरानी को बढ़ा देना चाहिए, जिसके लिए बाढ़ के खतरे को मैप व भविष्यवाणी करने के लिए सुपरियर सैटेलाइट्स का प्रयोग करना होगा और टेलीमेट्री स्टेशनों को अपग्रेड करना होगा.
दूसरा, स्टोरेज सुविधाओं, तटबंध, बाढ़ के पानी को मोड़ देने व शमन के लिए ब्लूप्रिंट तैयार करना होगा. ब्रह्मपुत्र पर स्टोरेज सुविधाएं बनाना आवश्यक है, जिसमें जगह के चयन, भूकंप की आशंका, इकोलॉजी और स्थानीय जरूरतों का ख्याल रखा गया हो.
तीसरा, ब्रह्मपुत्र बेसिन में अंदरूनी नौपरिवहन को अधिक बढ़ाना होगा. अंदरूनी जलमागरे पर अधिक निवेश करना होगा ताकि नेशनल वाटरवे-2 आर्थिक गलियारे के रूप में काम करे और उसका सीधा संपर्क चिटगांव (बांग्लादेश) और हल्दिया (पश्चिम बंगाल) की बंदरगाहों से हो जाए.
China के साथ जल समझौता होना मुश्किल ही लगता है. ऐसे में भारत यह कर सकता है कि पानी की मात्रा से आगे बढ़कर अपना वाटर एजेंडा तैयार करे और सीमा पर क्लाइमेट चेंज, आर्दभूमि व जैव-विविधता की विस्तृत चिंताओं को सामने लेकर आए. इन पर दोनों भारत व चीन ने संबंधित कन्वेंशनों में हस्ताक्षर किए हुए हैं.
Written By: Rajiv mandal
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