चुनाव आयोग में मतभेद के दावे पर सियासी बवाल, CEC ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग

Authored By: Galgotias Times Bureau

Published On: Wednesday, September 23, 2026

Last Updated On: Thursday, September 24, 2026

Election Commission Rift के बीच CEC ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग
Election Commission Rift के बीच CEC ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग

चुनाव आयोग के भीतर मतभेद को लेकर एक बड़ी जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद सियासी हलचल तेज़ हो गई है. विपक्षी नेताओं ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर सवाल उठाते हुए उनका इस्तीफा या महाभियोग तक की मांग कर डाली है.

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Last Updated On: Thursday, September 24, 2026

Election Commission Rift को लेकर देश की सियासत में नया विवाद खड़ा हो गया है. चुनाव आयोग(CEC) के भीतर कथित मतभेद और कुछ फैसलों पर उठाई गई आपत्तियों की रिपोर्ट सामने आने के बाद विपक्ष ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार (CEC Gyanesh Kumar) पर सवाल उठाए हैं. विपक्षी नेताओं ने उनके इस्तीफे और कार्रवाई की मांग की है. हालांकि, चुनाव आयोग ने इन दावों पर सफाई देते हुए कहा है कि आंतरिक चर्चाओं में अलग-अलग विचार सामने आना सामान्य प्रक्रिया है और अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं.

रिपोर्ट में क्या दावा किया गया

रिपोर्ट के अनुसार चुनाव आयुक्त (Election Commission controversy) सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने बीते दस महीनों में आयोग के कदमों पर चौदह बार आपत्ति दर्ज कराई थी. यह आपत्तियां खुद को फैसलों से दूर रखे जाने से लेकर नए मतदाताओं को जोड़ने और पुराने नाम हटाने जैसे मामलों पर उठाई गईं. दोनों आयुक्तों ने कई कदमों को गैरकानूनी और अधिकारों से बाहर बताया था.

देश के तीस से ज्यादा राज्यों में चल रही विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया के तहत अब तक तेरह करोड़ से भी ज्यादा नाम मतदाता सूची से हटाए जा चुके हैं. हालांकि जिन लोगों के नाम हटे हैं, उन्हें अपील करने का मौका भी दिया गया है.

कहां-कहां उठे सवाल

जुलाई में नए मतदाताओं के फॉर्म में एक नया सवाल जोड़ा गया था, जबकि दोनों आयुक्तों ने पहले ही कहा था कि बिना नियम बदले ऐसा नहीं किया जा सकता. इसके बावजूद बदलाव कर दिया गया. पश्चिम बंगाल में नाम हटाने और अपील से जुड़े मामलों पर भी दोनों ने सवाल उठाए. इसके अलावा दिल्ली में आयोग के अंदर काम बांटने को लेकर भी आपत्ति दर्ज हुई, जिसे बाद में वापस भी ले लिया गया. गोवा में सत्तानवे मतदाता स्थानीय स्तर पर योग्य पाए गए, लेकिन केंद्रीय व्यवस्था में उनके नाम दर्ज ही नहीं हो सके, जिस पर भी सवाल खड़े किए गए.

विपक्ष का हमला तेज

रिपोर्ट सामने आते ही विपक्षी दलों ने मुख्य चुनाव आयुक्त पर सीधा निशाना साधा है. एक सांसद ने कहा कि अब वक्त आ गया है कि पहले पेश किए गए हटाने के प्रस्ताव को फिर से सामने लाया जाए, ताकि लोकतंत्र को बचाया जा सके. कांग्रेस के एक नेता ने आरोप लगाया कि सत्ताधारी दल के इशारे पर चुनावी प्रक्रिया की साख को अंदर से कमजोर किया जा रहा है.

बिहार के एक बड़े विपक्षी नेता ने कहा कि उनकी पार्टी हार नहीं हारी गई, बल्कि हराया गया. एक अन्य सांसद ने कहा कि जो संस्था लोकतंत्र की रक्षा करने के लिए बनी है, उसी पर अब नुकसान पहुंचाने के आरोप लगना बेहद चिंता की बात है. एक क्षेत्रीय पार्टी के प्रवक्ता ने मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने और उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग तक कर डाली.

हालांकि चुनाव आयोग के कुछ अधिकारियों का कहना है कि आयुक्तों ने कुछ मुद्दों पर आपत्ति जरूर जताई थी, लेकिन अंतिम फैसले हमेशा तीनों की सहमति से ही लिए गए.

जानकारों ने भी उठाए सवाल

कई वरिष्ठ पत्रकारों और कानूनी जानकारों ने भी इस रिपोर्ट (SIR controversy) पर प्रतिक्रिया दी है. एक जाने-माने वकील ने इस मामले पर सर्वोच्च न्यायालय से खुद संज्ञान लेने की मांग की, यह कहते हुए कि गैरकानूनी तरीके से निर्देश जारी करने की वजह से करोड़ों लोग मतदान के अधिकार से वंचित हो गए. एक अन्य वरिष्ठ पत्रकार ने सवाल उठाया कि क्या एक संवैधानिक संस्था अब सिर्फ एक व्यक्ति की मर्जी से चल रही है. वहीं एक पूर्व चुनाव आयुक्त पहले ही इस पूरी प्रक्रिया की गड़बड़ी के लिए आयोग से माफी मांगने की बात कह चुके हैं.

निष्कर्ष

फिलहाल इस पूरे मामले पर चुनाव आयोग की तरफ से कोई विस्तृत सफाई सामने नहीं आई है. विपक्ष लगातार दबाव बना रहा है और मांग कर रहा है कि मुख्य चुनाव आयुक्त या तो खुद इस्तीफा दें या फिर उन्हें हटाया जाए. दूसरी तरफ आयोग का कहना है कि हर फैसला सामूहिक सहमति से ही लिया गया. अब सबकी नजर इस बात पर है कि सर्वोच्च न्यायालय और आयोग इस रिपोर्ट पर आगे क्या रुख अपनाते हैं.

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