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UNGA में फिर गूंजा कश्मीर मुद्दा, एर्दोआन के बयान और OIC के रुख का क्या मतलब?
Authored By: Galgotias Times Bureau
Published On: Wednesday, September 23, 2026
Last Updated On: Wednesday, September 23, 2026
UNGA में एर्दोआन ने फिर कश्मीर का मुद्दा उठाया. OIC के जम्मू-कश्मीर संपर्क समूह की बैठक के साथ इस रुख ने भारत, पाकिस्तान और तुर्की की कूटनीति को फिर चर्चा में ला दिया है. जानिए इस पूरे घटनाक्रम का क्या मतलब है.
Authored By: Galgotias Times Bureau
Last Updated On: Wednesday, September 23, 2026
कश्मीर का मुद्दा एक बार फिर संयुक्त राष्ट्र महासभा के मंच पर चर्चा में है. तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन (Erdogan) ने UNGA 2026 में दक्षिण एशिया के विवादों को बातचीत और संयुक्त राष्ट्र चार्टर के दायरे में सुलझाने की बात कही, जिसमें कश्मीर भी शामिल है. इसी बीच OIC के जम्मू कश्मीर संपर्क समूह ने न्यूयॉर्क में बैठक कर कश्मीरी लोगों के आत्मनिर्णय के अधिकार को लेकर अपना समर्थन दोहराया. आखिर Turkey Kashmir मुद्दे पर बार बार यह रुख क्यों अपनाता है, पाकिस्तान के लिए इसका क्या महत्व है और भारत इसे किस नजरिए से देखता है, समझिए पूरी कहानी.
आखिर तुर्की बार बार कश्मीर का जिक्र क्यों करता है
अर्दोआन का यह बयान अचानक आया हुआ रुख नहीं है. तुर्की पिछले कई सालों से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कश्मीर का जिक्र करता आया है. इस बार खास बात यह रही कि यह बयान ऐसे समय पर आया जब तुर्की और पाकिस्तान के बीच रणनीतिक रिश्ते भी सुर्खियों में हैं. कुछ हफ्ते पहले ही तुर्की, पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच मक्का समझौता हुआ था, और उसके ठीक बाद संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान भी तीनों देशों के बीच बातचीत का सिलसिला जारी रहा. इसीलिए इस बयान को तुर्की और पाकिस्तान के बढ़ते रिश्तों और क्षेत्रीय कूटनीति के व्यापक नजरिए से देखा जा रहा है, हालांकि सिर्फ इतने से यह कहना जल्दबाजी होगी कि बयान किसी दबाव में दिया गया है.
OIC का संपर्क समूह क्या कह रहा है
तुर्की के बयान के साथ साथ OIC के जम्मू कश्मीर संपर्क समूह की बैठक भी अहम मानी जा रही है. इक्कीस सितंबर को न्यूयॉर्क में हुई इस बैठक में संगठन के महासचिव ने कश्मीरी लोगों के आत्मनिर्णय के अधिकार का समर्थन दोहराया और दो हजार उन्नीस के बाद उठाए गए कदमों पर भी अपनी आपत्ति दर्ज कराई. इस संपर्क समूह में पाकिस्तान, तुर्की, सऊदी अरब, अजरबैजान और नाइजर जैसे देश शामिल हैं. यानी सिर्फ तुर्की का बयान भर नहीं है, बल्कि पूरा एक संगठित समूह भी कश्मीर पर अपना पुराना रुख कायम रखे हुए है.
भारत इस पूरे मामले को कैसे देखता है
भारत लंबे समय से OIC की कश्मीर पर की गई टिप्पणियों को खारिज करता रहा है. भारत का साफ कहना है कि जम्मू कश्मीर उसका अभिन्न हिस्सा है और OIC को उसके आंतरिक मामलों पर बोलने का कोई अधिकार नहीं है. भारत की नीति हमेशा से यही रही है कि पाकिस्तान के साथ जो भी मुद्दे लंबित हैं, उन्हें केवल दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय स्तर पर ही सुलझाया जाना चाहिए. इसलिए अर्दोआन का यह बयान भारत के लिए मुख्य रूप से कूटनीतिक असहमति का विषय है, न कि कोई ऐसी बात जिससे कश्मीर पर कोई नई अंतरराष्ट्रीय प्रक्रिया शुरू हो जाए.
पाकिस्तान के लिए यह मौका कितना अहम
पाकिस्तान वर्षों से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कश्मीर का मुद्दा उठाता आया है. ऐसे में जब उसी मंच पर तुर्की का राष्ट्रपति भी कश्मीर की बात करता है और OIC का समूह भी उसी समय बैठक करता है, तो पाकिस्तान को अपने पुराने कूटनीतिक रुख के लिए एक तरह का समर्थन मिलता दिखाई देता है. हालांकि इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि सभी मुस्लिम देश कश्मीर पर एक जैसी राय रखते हैं, क्योंकि OIC के हर सदस्य देश की भारत के साथ अपनी अलग आर्थिक और रणनीतिक प्राथमिकताएं हैं.
भारत और तुर्की के रिश्तों में यह मुद्दा कितना संवेदनशील है
भारत और तुर्की (India Turkey Relations) के बीच सिर्फ कश्मीर ही एकमात्र मुद्दा नहीं है, दोनों देशों के बीच व्यापार, निवेश और पर्यटन जैसे कई क्षेत्रों में मजबूत रिश्ते भी हैं. लेकिन कश्मीर पर तुर्की की टिप्पणियां हमेशा से नई दिल्ली के लिए एक संवेदनशील विषय रही हैं. यहां एक दिलचस्प बात यह भी है कि तुर्की का रुख हर साल एक जैसा नहीं रहता. दो हजार चौबीस में अर्दोआन ने अपने भाषण में कश्मीर का जिक्र तक नहीं किया था, जिसे उस वक्त भारत तुर्की रिश्तों में सुधार का संकेत माना गया था. ऐसे में दो हजार छब्बीस में फिर से कश्मीर का उल्लेख आना यह दिखाता है कि यह मुद्दा तुर्की की विदेश नीति से पूरी तरह गायब नहीं हुआ है, खासकर पाकिस्तान के साथ उसके बढ़ते जुड़ाव को देखते हुए.
आखिर इस पूरे घटनाक्रम का असली मतलब क्या है
इस पूरे मामले से तीन बातें साफ निकलकर आती हैं. पहली, तुर्की ने कश्मीर को लेकर अपना पुराना कूटनीतिक रुख पूरी तरह नहीं छोड़ा है. दूसरी, OIC का संपर्क समूह भी कश्मीर को अपने एजेंडे में बनाए रखे हुए है. तीसरी, भारत इस तरह की टिप्पणियों को अपने आंतरिक मामलों में बाहरी दखल के रूप में देखता है और किसी भी तीसरे पक्ष की भूमिका को स्वीकार नहीं करता. इसलिए अर्दोआन का यह बयान अपने आप में कोई नया फैसला या नई अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था नहीं बनाता, बल्कि इसका महत्व मुख्य रूप से कूटनीतिक संदेश और भारत, पाकिस्तान तथा तुर्की के आपसी रिश्तों के संदर्भ में ही है. आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि तुर्की और OIC इस मुद्दे को सिर्फ बयानों तक सीमित रखते हैं या इसे अपनी आगे की कूटनीतिक चालों में भी जगह देते हैं.
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