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Election Commission Controversy: विदेशी मीडिया में क्यों छिड़ी बहस? चुनाव आयोग के अंदर की असहमति पर दुनिया की नजर
Authored By: Galgotias Times Bureau
Published On: Saturday, September 26, 2026
Last Updated On: Saturday, September 26, 2026
Election Commission controversy अब भारत तक सीमित नहीं रहा है. चुनाव आयोग से जुड़ी एक रिपोर्ट के बाद विदेशी मीडिया में भी भारतीय चुनाव व्यवस्था, आयोग के भीतर असहमति और मतदाता सूची को लेकर बहस शुरू हो गई है. जानिए अंतरराष्ट्रीय मीडिया (foreign media) ने इस पूरे मामले को किस नजरिए से पेश किया और [...]
Authored By: Galgotias Times Bureau
Last Updated On: Saturday, September 26, 2026
Election Commission controversy अब भारत तक सीमित नहीं रहा है. चुनाव आयोग से जुड़ी एक रिपोर्ट के बाद विदेशी मीडिया में भी भारतीय चुनाव व्यवस्था, आयोग के भीतर असहमति और मतदाता सूची को लेकर बहस शुरू हो गई है. जानिए अंतरराष्ट्रीय मीडिया (foreign media) ने इस पूरे मामले को किस नजरिए से पेश किया और चुनाव आयोग (Election Commission) ने क्या जवाब दिया.
भारत के चुनाव आयोग पर विदेशों में भी छिड़ी बहस
भारत के एक प्रमुख अंग्रेजी अखबार की जांच रिपोर्ट (report) ने देश की राजनीति में जो हलचल मचाई, उसकी गूंज अब अंतरराष्ट्रीय मीडिया तक भी पहुंच गई है. इस रिपोर्ट में दावा किया गया था कि तीन सदस्यीय चुनाव आयोग में से दो सदस्यों ने दस महीने के भीतर कम से कम चौदह बार आधिकारिक तौर पर अपनी आपत्ति दर्ज कराई थी.
अमेरिकी अखबार ने क्या लिखा
अमेरिका के एक प्रमुख अखबार ने इस रिपोर्ट (report) को कवर करते हुए इसे भारत की चुनावी व्यवस्था के भीतर से सामने आई पहली गंभीर आपत्ति करार दिया. अखबार के तीन पत्रकारों की टीम ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि आयोग के भीतर आमतौर पर फैसले सर्वसम्मति या बहुमत से लिए जाते हैं, ऐसे में दो सदस्यों की असहमति का मतलब है कि उठाए गए कदमों पर असर पड़ना चाहिए था. अखबार ने मतदाता सूची पुनरीक्षण प्रक्रिया को अव्यवस्थित बताते हुए कहा कि इसने देश के सबसे गरीब नागरिकों पर दस्तावेज जुटाने का भारी बोझ डाल दिया.
एक और वैश्विक प्रकाशन का नजरिया
एक अन्य अंतरराष्ट्रीय आर्थिक प्रकाशन ने भी इस मुद्दे पर विस्तार से लिखा. इसमें बताया गया कि मतदाता सूची से पात्र मतदाताओं के नाम हटाए जाने की आशंका ने पूरी प्रक्रिया को एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना दिया है. इस प्रकाशन ने यह भी जोड़ा कि पिछले एक साल में हुए राज्य चुनावों में सत्तारूढ़ पार्टी को लगातार मिली जीत के बाद यह मुद्दा और भी संवेदनशील हो गया है.
आयोग और सरकार का जवाब
इस पूरे विवाद पर चुनाव आयोग (Election Commission) ने भी अपनी तरफ से सफाई दी. आयोग ने एक विस्तृत बयान जारी कर कहा कि अखबार ने आंतरिक चर्चाओं और अलग-अलग विचारों को ही आपत्ति के तौर पर पेश कर दिया है. सत्तारूढ़ पार्टी के प्रवक्ता ने भी इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि किसी भी संस्था में चर्चा और बहस होना स्वस्थ लोकतंत्र की निशानी है, न कि संकट का संकेत.
पहले भी उठ चुकी है ऐसी असहमति
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों ने भी इस मामले पर अपनी राय रखी है. एक पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त(Election Commission) ने इसे संस्था के इतिहास में अभूतपूर्व बताया, हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि अगर दो सदस्य किसी मुद्दे पर बहुमत में हैं, तो कानूनी तौर पर उनका फैसला ही मान्य होता है. एक अन्य पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ने बताया कि उनके कार्यकाल में भी कई बार असहमति सामने आई थी, लेकिन उसे चर्चा के जरिए सुलझा लिया जाता था. गौरतलब है कि साल दो हजार उन्नीस में भी एक चुनाव आयुक्त ने आम चुनाव के दौरान खुलकर अपनी असहमति जाहिर की थी, जो उस समय भी बड़ी खबर बनी थी.
निष्कर्ष
भारत के चुनाव आयोग (Election Commission) से जुड़ा यह मामला अब सिर्फ घरेलू राजनीति का विषय नहीं रह गया है, बल्कि दुनिया भर के बड़े प्रकाशन इसे लोकतांत्रिक संस्थाओं की पारदर्शिता से जोड़कर देख रहे हैं. जहां एक तरफ आयोग और सत्तारूढ़ पार्टी इसे सामान्य आंतरिक चर्चा बता रहे हैं, वहीं विदेशी मीडिया और विपक्ष इसे एक गंभीर संस्थागत सवाल के तौर पर पेश कर रहे हैं. आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि इस मुद्दे पर आयोग और सरकार की तरफ से आगे क्या कदम उठाए जाते हैं.
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