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बिहार में SIR विवाद: वोटर लिस्ट की जांच पर बवाल, पूरा मामला समझिए यहां
Authored By: संतोष आनंद
Published On: Thursday, July 17, 2025
Last Updated On: Thursday, July 17, 2025
Bihar Voter List Controversy से जुड़ा बड़ा विवाद बिहार में सामने आया है। विधानसभा चुनाव 2025 से पहले SIR अभियान के तहत वोटर लिस्ट की जांच को लेकर सियासी घमासान मचा हुआ है। जानिए पूरा मामला और सभी पक्षों की रणनीति
Authored By: संतोष आनंद
Last Updated On: Thursday, July 17, 2025
Bihar Voter List Controversy: बिहार में विधानसभा चुनाव नजदीक हैं और उससे पहले एक बड़ी राजनीतिक बहस छिड़ी हुई है। यह बहस चुनाव आयोग की एक खास प्रक्रिया को लेकर है, जिसका नाम है SIR यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन। यह प्रक्रिया वोटर लिस्ट को अपडेट करने के लिए की जा रही है, लेकिन अब यह राजनीतिक बहस और कानूनी विवाद का रूप ले चुकी है। आइए इस पूरे मामले को विस्तार से समझते हैं।
क्या है SIR प्रक्रिया?
SIR यानी Special Intensive Revision एक ऐसा अभियान है जिसे चुनाव आयोग ने शुरू किया है ताकि वोटर लिस्ट को साफ-सुथरा बनाया जा सके। इसका मकसद यह है कि पुराने, गलत, दोहराए गए या फर्जी नाम हटाना है और सही मतदाताओं का नाम जोड़ना है। बिहार में इस तरह की प्रक्रिया 2003 के बाद अब पहली बार हो रही है। इस प्रक्रिया में चुनाव आयोग के कर्मचारी यानी बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) घर-घर जाकर लोगों से उनके वोटर कार्ड की जानकारी जांच रहे हैं। लोग फॉर्म भरकर अपनी जानकारी अपडेट कर सकते हैं। इसमें नाम, पता, उम्र, माता-पिता की जानकारी और पहचान से जुड़े दस्तावेज शामिल होते हैं। अगर कोई मतदाता 2003 के बाद वोटर बना है यानी जिसका जन्म 1987 के बाद हुआ है, तो उन्हें अपने माता-पिता की पहचान से जुड़े दस्तावेज देने होंगे। अगर उनके माता-पिता 2003 की वोटर लिस्ट में नहीं थे, तो उनका नाम जोड़ने के लिए ज्यादा सबूत मांगे जा रहे हैं।
क्यों हो रहा है विवाद?
विपक्षी पार्टियों का आरोप है कि यह सिर्फ वोटर लिस्ट को सुधारने का अभियान नहीं है, बल्कि एक राजनीतिक चाल है। राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के नेता तेजस्वी यादव ने कहा है कि यह प्रक्रिया गरीब, दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक वोटरों के नाम हटाने के लिए शुरू की गई है। उनका आरोप है कि यह सब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के निर्देश पर हो रहा है।
तेजस्वी यादव ने यहां तक कहा कि चुनाव आयोग अब निष्पक्ष संस्था न होकर ‘गोडी आयोग’ बन गया है। उनके मुताबिक, यह पूरी प्रक्रिया एक साजिश है ताकि कुछ खास वर्गों के वोट काटे जा सकें। विवाद बढ़ाने वाला एक और कारण यह है कि SIR प्रक्रिया में अगर कोई व्यक्ति संदिग्ध पाया जाता है या उसके कागज पूरे नहीं होते, तो उसे नागरिकता कानून 1955 के तहत जांच के लिए भेजा जा सकता है। इससे यह डर फैल गया है कि कई असली भारतीय नागरिक, खासकर गरीब और दस्तावेजों से वंचित लोग, वोट देने के अधिकार से वंचित हो सकते हैं।
कौन-कौन से दस्तावेज मांगे जा रहे हैं?
चुनाव आयोग ने कुल 11 दस्तावेजों की एक सूची जारी की है, जिनमें से कोई भी एक दिया जा सकता है:
1. सरकारी कर्मचारी या पेंशनभोगी का पहचान पत्र या पेंशन आदेश
2. 1 जुलाई 1987 से पहले जारी कोई भी पहचान पत्र
3. जन्म प्रमाण पत्र
4. पासपोर्ट
5. स्कूल या कॉलेज का प्रमाण पत्र
6. स्थायी निवास प्रमाण पत्र
7. वन अधिकार प्रमाण पत्र
8. जाति प्रमाण पत्र
9. राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (जहां उपलब्ध हो)
10. परिवार रजिस्टर
11. सरकार द्वारा आवंटित भूमि या मकान का प्रमाण पत्र
हालांकि अगर किसी मतदाता के पास ये दस्तावेज नहीं हैं, तो भी वह फॉर्म भर सकता है। तब ERO यानी निर्वाचन रजिस्ट्रेशन अधिकारी उसके घर जाकर उसकी आयु और पहचान की जांच करेगा। आसपास के लोगों से बात करके और अन्य उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर फैसला लिया जाएगा कि उसका नाम वोटर लिस्ट में जोड़ा जाए या नहीं।
क्या आधार कार्ड मान्य है?
शुरुआत में आधार कार्ड को नागरिकता का प्रमाण नहीं माना जा रहा था, जिससे लोगों में डर फैल गया कि अगर आधार नहीं चलेगा तो क्या होगा। हालांकि बाद में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आधार, वोटर ID और राशन कार्ड को वैध दस्तावेज माना जाए। यह फैसला लोगों के लिए राहत भरा है।
ऑनलाइन फॉर्म कैसे भर सकते हैं?
अगर कोई व्यक्ति खुद से फॉर्म भरना चाहता है तो वह चुनाव आयोग की वेबसाइट (https://voters.eci.gov.in) पर जाकर फॉर्म भर सकता है। वहां EPIC नंबर या फिर मोबाइल नंबर के साथ लॉगइन करना होगा। यहां पर आपको होम पेज पर ही Special Intensive Revision का विकल्प मिलेगा। फॉर्म खुलन के बाद EPIC नंबर दर्ज करना होगा। इसके बाद कुछ जानकारी पहले से भरी मिलेगी और बाकी खुद भरनी होगी। फिर पहचान से जुड़े दस्तावेज अपलोड करके फॉर्म सबमिट करना होगा। सबमिट करने के बाद आपके मोबाइल पर मैसेज आएगा जिससे पुष्टि होगी कि फॉर्म जमा हो गया है।
अगर आपके पास दस्तावेज नहीं हैं?
अगर आपने 25 जुलाई तक बिना दस्तावेज फॉर्म भर दिया है, तो 1 अगस्त से 1 सितंबर तक दस्तावेज जमा करने का मौका मिलेगा। लेकिन यह सुविधा सिर्फ उन्हें मिलेगी जिन्होंने 25 जुलाई तक फॉर्म भर दिया है।
सुप्रीम कोर्ट की भूमिका
विपक्षी दलों ने इस मामले को सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा दिया है। वहां इस बात की जांच हो रही है कि क्या यह प्रक्रिया कानूनी है और निष्पक्ष ढंग से हो रही है या नहीं। जज सुधांशु धूलिया ने टिप्पणी की कि यह मामला लोकतंत्र की जड़ से जुड़ा है, क्योंकि यह वोट देने के अधिकार से जुड़ा हुआ है। कोर्ट ने SIR प्रक्रिया पर रोक नहीं लगाई है, लेकिन कहा है कि वह इसकी प्रक्रिया, समय और उद्देश्य की गहराई से जांच करेगा। अगली सुनवाई 28 जुलाई को होनी है।
क्या यह वाकई वोटर लिस्ट सुधार का काम है?
चुनाव आयोग का कहना है कि यह एक नियमित प्रक्रिया है और कोई नया नियम नहीं बनाया गया है, लेकिन सच यह भी है कि आयोग ने पहले कभी इतने प्रचार के साथ यह नहीं बताया था कि बिना दस्तावेज भी फॉर्म जमा किया जा सकता है। 25 जून तक की प्रेस विज्ञप्तियों और पोस्टर्स में यह बात साफ नहीं की गई थी।
जागरूकता अभियान कैसे चल रहा है?
चुनाव आयोग ने पूरे राज्य में जागरूकता अभियान चलाया है। प्रचार गाड़ियां, सरकारी कर्मचारी, जीविका दीदी, एनसीसी और एनएसएस के छात्र इस काम में जुटे हैं ताकि लोगों को बताया जा सके कि वे कैसे फॉर्म भर सकते हैं और दस्तावेज कैसे जमा कर सकते हैं।
बिहार में मतदाता सूची 2003 हुई थी अपडेट
बिहार में मतदाता सूची 2003 में अंतिम बार विशेष रूप से अपडेट की गई थी। चुनाव आयोग (ECI) के अनुसार, देश में अलग-अलग समय पर SIR (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) अभियान पहले भी चलाए जाते रहे हैं, जिनका उद्देश्य नया वोटर लिस्ट बनाना या पुराने को अपडेट करना रहा है। ऐसे SIR अभियान साल 1952 से लेकर 2004 तक कई बार किए जा चुके हैं, जिनमें 1952-56, 1957, 1961, 1965, 1966, 1983-84, 1987-89, 1992, 1993, 1995, 2002, 2003 और 2004 शामिल हैं। बिहार में आखिरी बार विशेष पुनरीक्षण 2003 में किया गया था। उस समय यह अभियान मौजूदा ड्राइव की तरह ही 31 दिनों में पूरा कर लिया गया था, लेकिन तब आधुनिक तकनीक का सहारा नहीं लिया गया था। इसके बाद 2005 में विधानसभा चुनाव से पहले चुनाव आयोग ने नियमित चक्र के अनुसार वोटर लिस्ट को फिर से अपडेट किया था। इस प्रक्रिया में बड़ी संख्या में गड़बड़ियां सामने आई थीं। उदाहरण के लिए, सिर्फ पटना जिले में ही करीब 70,000 डुप्लीकेट नाम पाए गए थे। इसके अलावा, चुनाव आयोग ने ऐसे लोगों के नाम भी हटाए थे, जिनके खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी थे, लेकिन वे फिर भी मतदाता सूची में शामिल थे। इन कार्रवाइयों का उद्देश्य वोटर लिस्ट को पारदर्शी और निष्पक्ष बनाना था। अब जो SIR चल रहा है, वह लगभग दो दशक बाद हो रहा है और इसमें तकनीक, डिजिटल दस्तावेजीकरण और पहचान सत्यापन को प्रमुखता दी जा रही है।
नतीजा क्या होगा?
यह पूरा मामला अब राजनीतिक, कानूनी और सामाजिक मुद्दा बन चुका है। विपक्ष का दावा है कि करोड़ों गरीब लोगों को वोट देने से रोका जा सकता है, जबकि आयोग कह रहा है कि यह सिर्फ वोटर लिस्ट को साफ करने की प्रक्रिया है।
सच क्या है, इसका फैसला अब सुप्रीम कोर्ट करेगा। लेकिन जब तक यह मामला सुलझ नहीं जाता, तब तक यह विवाद बिहार की राजनीति में बड़ा मुद्दा बना रहेगा और चुनावों के नतीजों पर भी असर डाल सकता है।

















