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टीचर्स से लेकर स्टूडेंट्स तक… UGC के 4 नियम जिनपर मचा सबसे बड़ा बवाल
Authored By: Nishant Singh
Published On: Tuesday, January 27, 2026
Last Updated On: Tuesday, January 27, 2026
UGC Rules: देश की यूनिवर्सिटियों और कॉलेजों में पढ़ाई से ज़्यादा चर्चा इन दिनों UGC के नए नियमों की है. 13 जनवरी 2026 को लागू हुए ये नियम समानता और भेदभाव खत्म करने के नाम पर लाए गए, लेकिन इन्हीं पर सबसे बड़ा विवाद खड़ा हो गया. टीचर्स से लेकर स्टूडेंट्स तक सवाल उठा रहे हैं कि क्या ये बदलाव सुरक्षा देंगे या शिक्षा जगत में नई परेशानियां पैदा करेंगे.
Authored By: Nishant Singh
Last Updated On: Tuesday, January 27, 2026
UGC Rules: देश की यूनिवर्सिटियों और कॉलेजों में इन दिनों पढ़ाई से ज्यादा चर्चा UGC के नए नियमों की हो रही है. 13 जनवरी 2026 को लागू किए गए “Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations 2026” ने शिक्षा जगत में हलचल मचा दी है. सोशल मीडिया पर #UGCRolleback ट्रेंड कर रहा है, छात्र संगठन सड़क पर उतर आए हैं और मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है. सवाल सीधा है कि क्या ये नियम समानता लाएंगे या नया भेदभाव खड़ा करेंगे?
UGC का दावा: समानता और सुरक्षा की पहल
UGC का कहना है कि इन नियमों का मकसद उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत भेदभाव को रोकना है. आयोग के मुताबिक, 2020 से 2025 के बीच SC, ST और OBC छात्रों की शिकायतों में 100 फीसदी से ज्यादा बढ़ोतरी हुई है. रोहित वेमुला और पायल तड़वी जैसे मामलों से सबक लेते हुए UGC ने सख्त निगरानी तंत्र बनाने का फैसला किया. इसी के तहत Equity Committee, Equity Squad और 24×7 हेल्पलाइन की व्यवस्था की गई है.
विवाद की जड़ कहां है?
समस्या नियम के इरादे से नहीं, उसके ढांचे से जुड़ी बताई जा रही है. छात्र और शिक्षक कह रहे हैं कि नियम एकतरफा हैं और उनमें संतुलन की कमी है. सुप्रीम कोर्ट में दाखिल जनहित याचिका में दावा किया गया है कि कुछ प्रावधान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और समानता के अधिकार का उल्लंघन करते हैं. बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री का इस्तीफा इस नाराज़गी को और गहरा कर गया.
विवाद के केंद्र में UGC के 4 नियम
1. Equity Committee और Equity Squad: ज्यादा ताकत, कम स्पष्टता
हर कॉलेज और यूनिवर्सिटी में Equity Committee और Equity Squad बनाना अनिवार्य कर दिया गया है. छात्रों का कहना है कि इन समितियों में सामान्य वर्ग का प्रतिनिधित्व जरूरी नहीं बताया गया है. साथ ही, ‘भेदभाव’ की परिभाषा भी साफ नहीं है, जिससे किसी भी सामान्य बातचीत या अकादमिक मतभेद को शिकायत में बदला जा सकता है.
2. 24×7 हेल्पलाइन: शिकायत आसान, बचाव मुश्किल
नए नियमों के तहत छात्र किसी भी समय भेदभाव की शिकायत कर सकते हैं. लेकिन नियम में झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायतों पर कार्रवाई का स्पष्ट प्रावधान नहीं है. शिक्षक संगठनों को डर है कि बिना जांच के आरोप लगने से किसी का करियर, प्रतिष्ठा और मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित हो सकता है.
3. फोकस सिर्फ कुछ वर्गों पर?
UGC का पूरा जोर SC, ST और OBC छात्रों की सुरक्षा पर है. सामान्य वर्ग के छात्रों और शिक्षकों का कहना है कि यह व्यवस्था उन्हें पहले से ही संदिग्ध मान लेती है. उनका तर्क है कि समानता का मतलब सभी के लिए समान सुरक्षा होना चाहिए, न कि किसी एक वर्ग को प्राथमिकता.
4. सख्त कार्रवाई का डर
अगर कोई संस्थान इन नियमों का पालन नहीं करता तो उसकी मान्यता रद्द की जा सकती है या फंड रोका जा सकता है. शिक्षाविदों का कहना है कि बिना पर्याप्त ट्रेनिंग और गाइडलाइंस के इतने सख्त नियम लागू करना संस्थानों पर अनावश्यक दबाव डालता है.
छात्र और शिक्षक क्यों नाराज़ हैं?
छात्र संगठनों का कहना है कि नियम संवाद के बिना थोपे गए हैं. शिक्षक संघ इसे अकादमिक स्वतंत्रता पर खतरा मान रहे हैं. सोशल मीडिया से लेकर कैंपस तक सवाल गूंज रहा है क्या यह नियम भेदभाव खत्म करेंगे या नया डर पैदा करेंगे?
UGC की सफाई क्या है?
UGC का कहना है कि नियम धीरे-धीरे लागू होंगे और उद्देश्य सिर्फ सुरक्षित व समान शैक्षणिक माहौल बनाना है. आयोग मानता है कि बिना सख्त निगरानी के भेदभाव रोकना संभव नहीं.
आगे क्या?
अब सबकी नजर सुप्रीम कोर्ट पर है. अगर कोर्ट नियमों में संतुलन की जरूरत मानता है, तो बदलाव संभव है. फिलहाल, UGC के ये चार नियम शिक्षा जगत में बहस, डर और उम्मीद तीनों का केंद्र बन चुके हैं.
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