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Chhath Puja 2025: जानें अक्टूबर में कब से शुरू है छठ पूजा
Authored By: स्मिता
Published On: Monday, September 1, 2025
Last Updated On: Monday, September 1, 2025
Chhth Puja 2025: जीवनदाता सूर्य को अर्घ्य प्रदान करने वाले महापर्व छठ 2025 की शुरुआत 25 अक्टूबर को नहाय-खाय से शुरू हो जाएगी. यह 28 अक्टूबर को उगते हुए सूर्य को जल अर्पित करने के साथ समाप्त हो जाएगा. जानते हैं छठ पर्व की तिथि और महत्ता.
Authored By: स्मिता
Last Updated On: Monday, September 1, 2025
Chhath Puja 2025: रोशनी देने के साथ-साथ जीवनदाता भी हैं सूर्य. कार्तिक माह में इसकी विशेष पूजा-अर्चना महापुण्यदायी होती है. कार्तिक माह की छठी तिथि को इनकी विशिष्ट पूजा के लिए छठ महापर्व मनाया जाता है. छठ पूर्वी भारत और दक्षिणी नेपाल में भी मनाया जाता है. यह मुख्य रूप से बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश राज्यों और नेपाल के कोशी, गंडकी, बागमती, लुम्बिनी और मधेश प्रांतों में भी मनाया जाता है. छठ (Chhath Puja) का उल्लेख पुराणों में भी मिलता है.
कब से कब तक है छठ 2025 (Chhath Puja Date & Time)
| तारीख | व्रत / पर्व |
|---|---|
| शनिवार, 25 अक्टूबर 2025 | नहाय खाय या कद्दू-भात |
| रविवार, 26 अक्टूबर 2025 | खरना |
| सोमवार, 27 अक्टूबर 2025 | अस्ताचलगामी सूर्य अर्घ्य |
| मंगलवार, 28 अक्टूबर 2025 | उदयगामी सूर्य अर्घ्य |
छठ पूजा का आध्यात्मिक महत्व (Chhath Puja Spiritual Significance)
छठ पूजा की जड़ें प्राचीन वैदिक परंपराओं में पाई जा सकती हैं. यह इसे भारत के सबसे प्राचीन त्योहारों में से एक बनाती हैं। माना जाता है कि यह त्योहार कृषि प्रधान समाज में सूर्य के महत्व का प्रतीक है, जो जीवन और जीविका के चक्र का प्रतिनिधित्व करता है. आध्यात्मिक दृष्टिकोण से यह त्योहार सूर्य की जीवनदायिनी ऊर्जा के प्रति कृतज्ञता प्रकट करता है. वेदों में सूर्य के कई संदर्भ मिलते हैं, जो प्राचीन संस्कृतियों में स्वास्थ्य और धन के देवता के रूप में सूर्य के प्रति श्रद्धा को दर्शाते हैं. इस त्योहार का समय फसल कटाई के मौसम के साथ मेल खाता है, जो भरपूर पैदावार के लिए कृतज्ञता का समय है.
छठ पूजा के अनुष्ठान (Chhath Puja Rituals)
छठ पूजा चार दिनों तक चलती है. हर दिन कुछ खास अनुष्ठान होते हैं, जिनका पालन भक्त बहुत श्रद्धा के साथ करते हैं.
1. पहला दिन: नहाय खाय
यह उत्सव नहाय खाय से शुरू होता है. इस दिन भक्त खुद को शुद्ध करने के लिए नदियों या जलाशयों में पवित्र डुबकी लगाते हैं. पवित्रता के साथ वे मौसमी सब्जियों, जिनमें मुख्य रूप से कद्दू (लौकी) कच्चे केले से भोजन तैयार करते हैं. इसे पवित्रता के प्रतीक के रूप में खाते हैं. भोजन मिट्टी के बर्तन में तैयार किया जाता है. यह दिन शरीर और आत्मा की शुद्धि का प्रतीक है, जिससे उत्सव की शुरुआत हो जाती है.
2. दूसरा दिन: खरना
दूसरे दिन खरना पूजा होती है. इसमें पूरे दिन उपवास रखा जाता है. भक्त शाम को डूबते सूर्य को अर्घ्य देने के बाद अपना उपवास तोड़ते हैं. वे रोटी के साथ गुड़ के साथ चावल की खीर (रसिया) पकाते हैं. इसे परिवार और दोस्तों में बांटते हैं. यह दिन साझा करने और सामुदायिक भावना के महत्व का प्रतीक है.
3. तीसरा दिन : संध्या अर्घ्य
तीसरा दिन, जिसे संध्या अर्घ्य के नाम से जाना जाता है, सूर्यास्त के समय सूर्य देव को अर्घ्य दिया जाता है. भक्तगण नदी के किनारे फल, मिठाइयां और ठेकुआ (गेहूं के आटे और गुड़ से बनी) जैसे प्रसाद के साथ इकट्ठा होते हैं. इस अनुष्ठान में डूबते सूर्य को अर्घ्य देते हुए पानी में खड़े होना होता है. यह दिन भक्ति के चरम का प्रतीक है, जो भक्तों की अपनी मान्यताओं के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है.
4. चौथा दिन : उषा अर्घ्य
अंतिम दिन, उषा अर्घ्य, उगते सूर्य को अर्घ्य देने के लिए होता है. सुबह भक्त अंतिम अनुष्ठान करने के लिए एक बार फिर नदी तट पर एकत्रित होते हैं. वे सूर्य देव के प्रति अपनी भक्ति और सम्मान प्रदर्शित करते हुए पारंपरिक गीत गाते हैं. परिवार अनुष्ठान के सफल समापन की खुशियाँ मनाते हुए मिलकर प्रसाद खाते हैं.
छठ पूजा से जुड़ी पौराणिक कथा (Chhath Puja in Mythology)
- इस त्योहार से जुड़ी सबसे लोकप्रिय कथाओं में से एक महाभारत के पात्र महात्मा कर्ण की है. अपनी अटूट निष्ठा और उदारता के लिए प्रसिद्ध कर्ण ने युद्ध में शक्ति और पराक्रम प्राप्त करने के लिए सूर्य देव की पूजा की थी. माना जाता है कि उन्होंने सूर्य के आशीर्वाद के लिए कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए छठ पूजा की थी.
- एक और प्रमुख कहानी छठी मैया की है. माना जाता है कि छठी मैया सूर्य की किरणें हैं. वे भक्तों को समृद्धि और मनोकामनाओं की पूर्ति का आशीर्वाद देती हैं.
छठ पूजा का पर्यावरणीय महत्व (Chhath Puja Importance)
छठ पूजा पर्यावरणीय जागरूकता पर जोर देने का भी संदेश देता है. नदियों में स्नान और प्राकृतिक तत्वों की पूजा करने वाले अनुष्ठान, जल निकायों और प्रकृति के संरक्षण के महत्व पर प्रकाश डालते हैं. श्रद्धालुओं को अपने आस-पास की सफाई करने और नदियों की पवित्रता बनाए रखने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है. यह प्रथा लोगों से प्रकृति की रक्षा और संजोने का आग्रह करती है.
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