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होली पर रंग खेलने की शुरुआत कैसे हुई, जब बाजार में रंग नहीं थे तब कैसे मनाया जाता था यह पर्व
Authored By: Nishant Singh
Published On: Monday, February 23, 2026
Last Updated On: Monday, February 23, 2026
होली रंगों का त्योहार ही नहीं, बल्कि आस्था, प्रेम और प्रकृति से जुड़ी एक प्राचीन परंपरा है. इसकी शुरुआत होलिका दहन की धार्मिक कथा और कृष्ण-राधा की प्रेम लीलाओं से मानी जाती है. यह पर्व सामाजिक मेल-मिलाप का प्रतीक था.
Authored By: Nishant Singh
Last Updated On: Monday, February 23, 2026
Holi Festival History: होली का नाम सुनते ही मन में रंगों की बौछार, पिचकारियों की मस्ती और गुलाल से सनी मुस्कानें तैरने लगती हैं. लेकिन यह रंगीन तस्वीर हमेशा से ऐसी नहीं थी. जब बाजारों में पैकेट वाले रंग नहीं मिलते थे, तब भी होली उतनी ही उल्लासपूर्ण होती थी. दरअसल, होली सिर्फ रंग खेलने का त्योहार नहीं, बल्कि आस्था, प्रेम और प्रकृति से जुड़ी एक गहरी सांस्कृतिक परंपरा है, जिसकी जड़ें पौराणिक कथाओं और लोकजीवन में समाई हुई हैं.
होलिका दहन: बुराई पर अच्छाई की जीत की कहानी
हिंदू धर्म में होली दो दिनों तक मनाई जाती है. पहले दिन होलिका दहन होता है, जो बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक माना जाता है. यह कथा भक्त प्रह्लाद, उनके पिता हिरण्यकश्यप और उनकी बहन होलिका से जुड़ी है. मान्यता है कि ईश्वर की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित रहे और होलिका अग्नि में भस्म हो गईं. तभी से यह परंपरा चली आ रही है.
कृष्ण-राधा और रंगों वाली होली की शुरुआत
रंगों से खेली जाने वाली होली का संबंध भगवान कृष्ण और राधा की प्रेम कथाओं से जुड़ा है. ब्रज की लोकमान्यता के अनुसार, कृष्ण अपने सांवले रंग को लेकर चिंतित रहते थे, तब माता यशोदा ने उन्हें राधा को रंग लगाने की सलाह दी. इसी प्रेमिल प्रसंग से रंगों की होली की परंपरा शुरू हुई, जो बाद में पूरे उत्तर भारत में फैल गई.
जब केमिकल रंग नहीं थे, तब कैसे मनती थी होली
पुराने समय में होली पूरी तरह प्राकृतिक रंगों से खेली जाती थी. पलाश या टेसू के फूलों को पानी में भिगोकर केसरिया रंग बनाया जाता था. हल्दी से पीला रंग और चंदन से तिलक लगाया जाता था. ये रंग न सिर्फ सुंदर होते थे, बल्कि त्वचा के लिए भी सुरक्षित माने जाते थे.
फूलों, फाग और मेल-मिलाप का त्योहार
गुलाब, गेंदा और टेसू की पंखुड़ियों से फूलों की होली खेली जाती थी. गांवों में ढोलक-मंजीरे के साथ फाग गाए जाते थे. घर-घर गुझिया, मालपुआ और दही बड़े बनते थे. लोग गिले-शिकवे भूलकर गले मिलते थे. आज भी मथुरा और वृंदावन में यह परंपरा खास उत्साह से निभाई जाती है.
समय के साथ होली का स्वरूप बदला, लेकिन आज फिर लोग प्राकृतिक रंगों की ओर लौट रहे हैं, ताकि यह पर्व वही शुद्ध आनंद और अपनापन लौटा सके, जिसके लिए होली जानी जाती है.
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