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हर की पौड़ी में जल का संकट गहराया, 20 अक्टूबर 2026 की मध्यरात्रि से शुरू हुई पानी की वार्षिक बंदी, पुजारियों और व्यापारियों ने जताया एतराज
Authored By: Galgotias Times Bureau
Published On: Thursday, October 22, 2026
Last Updated On: Thursday, October 22, 2026
हरिद्वार में हर की पौड़ी पर गंगाजल की कमी का मौजूदा संकट 20 अक्टूबर 2026 की मध्यरात्रि से शुरू हुई ऊपरी गंगनहर की वार्षिक बंदी से जुड़ा है. इस बार नहर की सफाई, मरम्मत और आगामी अर्द्धकुंभ की तैयारियों के लिए जलप्रवाह रोका गया है. यह संकट दीपावली के समय तक रहेगा.
Authored By: Galgotias Times Bureau
Last Updated On: Thursday, October 22, 2026
Har Ki Pauri water crisis: उत्तराखंड के हरिद्वार में ऊपरी गंगनहर को मरम्मत के लिए मंगलवार देर रात से बंद कर दिया गया है. इसके चलते हर की पौड़ी पर गंगाजल का संकट खड़ा हो गया है. अब 18 दिन बाद ही हर की पौड़ी पर गंगाजल पूरी तरह दिखाई देगा. इससे यहां आने वाले श्रद्धालुओं को निराशा हाथ लग रही है. साथ ही स्थानीय व्यापारियों को भी नुकसान की आशंका नजर आ रही है. कुछ व्यापारियों ने इस तरह पानी पूरी तरह बंद करने पर एतराज जताया है. पुजारियों के मुताबिक, इससे धार्मिक अनुष्ठान भी प्रभावित हो रहे हैं.
मरम्मत के लिए बंद की गई गंगनहर
उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग के मुताबिक गंगा बंदी हर साल होने वाला एक मेंटेनेंस कार्य है. यह नहर प्रणाली दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र को पीने का पानी भी उपलब्ध कराती है और कई थर्मल पावर स्टेशनों के साथ-साथ नदी पर बने कई जलविद्युत संयंत्रों को भी मदद पहुंचाती है.
साल भर नहरें चालू रहने के कारण इनके कई हिस्से पानी में डूबे रहते हैं या इस्तेमाल में होते हैं, जिससे उनकी ठीक से जांच करना मुमकिन नहीं हो पाता. केवल इसी बंदी के दौरान ही अलग-अलग तरह के नुकसान सामने आते हैं, जिससे जरूरी मरम्मत की योजना बनाई जा सकती है और उसे पूरा किया जा सकता है. कुंभ मेले से जुड़ी परियोजनाएं अलग-अलग जगहों पर चल रही हैं और इस बंदी की अवधि को लेकर एक खास योजना बनाई गई है. ध्यान देने वाली बात यह है कि यह पूरे गंगा नदी तंत्र के सूखने का मामला नहीं है. संकट मुख्य रूप से हर की पौड़ी और ऊपरी गंगनहर से जुड़े घाटों पर जलस्तर कम होने का है.
उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग ऊपरी गंगनहर का संचालन करता है. यह नहर हरिद्वार के भीमगोड़ा बैराज से निकलती है और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के साथ दिल्ली-एनसीआर की जलापूर्ति तथा सिंचाई व्यवस्था के लिए महत्त्वपूर्ण है.
वार्षिक बंदी के प्रमुख कारण हैं:
- गाद और सिल्ट की सफाई: नहर के तल में जमा मिट्टी और अन्य अवसाद हटाना.
- नहर और तटबंधों की मरम्मत: क्षतिग्रस्त हिस्सों, पुलों और किनारों को ठीक करना.
- घाटों का निर्माण और सुधार: इस वर्ष हरिद्वार में आगामी अर्द्धकुंभ से जुड़े कुछ निर्माण कार्यों को भी गति दी जा रही है.
- सुरक्षा और तकनीकी निरीक्षण: पानी लगातार बहने के कारण जिन हिस्सों की ठीक से जांच नहीं हो पाती, उन्हें खाली करके उनकी स्थिति देखना. इन कारणों से हर साल कुछ समय के लिए नहर का पानी रोका जाता है.
दूसरे प्रमुख तीर्थस्थलों पर क्या असर पड़ता है?
भारत के दूसरे पवित्र स्थलों में पानी की समस्या के कारण अलग-अलग हैं. हरिद्वार की मौजूदा नहर बंदी को इन सभी स्थानों पर लागू मानना सही नहीं होगा.
ऋषिकेश – त्रिवेणी घाट
गंगा स्नान और आरती का प्रमुख केंद्र. यहां जलस्तर मौसम, बारिश, ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र और बैराजों से छोड़े जाने वाले पानी से प्रभावित होता है. हरिद्वार की गंगनहर बंदी का अर्थ यह नहीं कि ऋषिकेश में भी गंगा का प्रवाह बंद हो जाता है.
देवप्रयाग – भागीरथी और अलकनंदा का संगम
यहां दोनों नदियों के मिलने से गंगा का नाम प्रचलित होता है. जलस्तर का संबंध नदी के प्राकृतिक प्रवाह, वर्षा और ऊपरी क्षेत्रों की परिस्थितियों से है. हरिद्वार की नहर की वार्षिक बंदी से यहां का संगम स्वतः बंद नहीं होता.
वाराणसी – दशाश्वमेध और मणिकर्णिका घाट
यहां गंगा का प्रवाह अलग नदी-खंड से आता है. जलस्तर पर मानसून, बैराजों के संचालन, नदी के प्रवाह और स्थानीय परिस्थितियों का असर पड़ता है. हरिद्वार की वार्षिक नहर बंदी यहां के घाटों को सीधे सूखा नहीं देती.
प्रयागराज – त्रिवेणी संगम
यहां गंगा और यमुना का संगम है. स्नान और मेले की व्यवस्थाओं के लिए नदी का पर्याप्त जलस्तर जरूरी है, लेकिन यहां पानी की उपलब्धता अलग जलप्रवाह और मौसमी परिस्थितियों से निर्धारित होती है.
उज्जैन – क्षिप्रा नदी और रामघाट
यहां समस्या गंगा नहर की नहीं, बल्कि क्षिप्रा नदी में पर्याप्त स्वच्छ जल बनाए रखने की है. नदी के प्रवाह, प्रदूषण, मौसमी जल उपलब्धता और स्थानीय जल प्रबंधन की भूमिका महत्त्वपूर्ण है.
Wriiten By: Rajiv Mandal














