राम अमीरों के, शिव गरीबों के? रेवंत रेड्डी के बयान से छिड़ी नई बहस
Authored By: Galgotias Times Bureau
Published On: Wednesday, September 30, 2026
Updated On: Wednesday, September 30, 2026
राम अमीरों के और शिव गरीबों के? रेवंत रेड्डी के बयान ने भगवान की जाति और वर्ग तय करने वाली पुरानी राजनीतिक बहस को फिर सुर्खियों में ला दिया है. पूरा मामला जानिए. पढ़ें पूरी खबर.
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Updated On: Wednesday, September 30, 2026
Revanth Reddy Ram Shiva Remark: तेलंगाना के मुख्यमंत्री का पिछले दिनों का बयान सुर्खियों में है. उनका ‘राम अमीरों के, शिव गरीबों के’ बयान (Ram rich Shiva poor statement) ने एक बार फिर फिर इस पुराने सवाल को जिंदा कर दिया है कि -क्या सियासत में भगवान की भी जाति तय होगी? क्या है पूरा मामला, जानते हैं इस खास रिपोर्ट में.
भगवान राम किसके हैं? भगवान शिव किसके हैं?(revanth reddy ramana give statement) हनुमानजी किस जाति के हैं? सुनने में ये सवाल अजीब लग सकते हैं, लेकिन भारतीय राजनीति में पिछले कुछ वर्षों में इन सवालों पर बाकायदा बयानबाजी हो चुकी है. कभी भगवान राम को अमीरों से जोड़ने की कोशिश हुई तो कभी भगवान शिव को गरीबों का देवता बताया गया. हनुमानजी को कभी दलित, कभी आदिवासी, कभी जाट, कभी वैश्य और यहां तक कि मुस्लिम तक बताए जाने के दावे सामने आए.
तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने दिया विवादित बयान
ताजा मामला तेलंगाना के मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी(Telangana CM Revanth Reddy) के 29 सितंबर 2026 के बयान से जुड़ा है. दिल्ली में एक मीडिया कार्यक्रम में रेड्डी ने उत्तर और दक्षिण भारत की धार्मिक-सांस्कृतिक राजनीति का जिक्र करते हुए कहा कि दक्षिण में लोग शिव के भक्त हैं और उत्तर में राम के. उन्होंने यह भी कहा कि ‘शिव गरीबों के भगवान हैं, राम अमीरों के भगवान हैं’ और भाजपा पर भगवान राम को राजनीतिक प्रतीक के रूप में इस्तेमाल करने का आरोप लगाया. इस बयान पर भाजपा नेताओं ने आपत्ति जताई और इसे धार्मिक विभाजन से जोड़कर आलोचना की. कांग्रेस की ओर से बाद में यह तर्क सामने आया कि टिप्पणी का उद्देश्य भाजपा की राजनीतिक रणनीति की आलोचना करना था.
बयान का राजनीतिक संदर्भ अपनी जगह है, लेकिन इससे एक बड़ा सामाजिक सवाल फिर सामने है-क्या किसी देवता की पहचान को अमीर-गरीब, उत्तर-दक्षिण या जाति के आधार पर परिभाषित किया जा सकता है?
हनुमानजी की जाति बताने की होड़
इस सवाल का सबसे चर्चित उदाहरण 2018 का है. राजस्थान विधानसभा चुनाव के दौरान उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के एक भाषण को लेकर विवाद हुआ. रिपोर्टों के अनुसार उन्होंने हनुमानजी को वनवासी, वंचित और दलित समुदाय से जोड़कर बताया था. उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से बाद में इस कथन की व्याख्या/खंडन को लेकर विवाद रहा.
इसके बाद तो जैसे हनुमानजी की ‘जाति’ तय करने की होड़ लग गई.
- बहुजन राजनीति से जुड़ीं तत्कालीन भाजपा सांसद सावित्री बाई फुले ने कहा कि हनुमानजी दलित थे और उनके साथ सामाजिक अपमान हुआ. उन्होंने सवाल उठाया कि राम के लिए इतना कुछ करने वाले हनुमान को बंदर क्यों बनाया गया.
- फिर उत्तर प्रदेश के एक भाजपा नेता बुक्कल नवाब ने दावा किया कि उनकी मान्यता में हनुमान मुस्लिम थे. उनके तर्क का आधार नामों की समानता बताया गया था.
- कुछ ही दिनों बाद उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मंत्री चौधरी लक्ष्मी नारायण सिंह ने कहा कि उन्हें लगता है कि हनुमानजी जाट थे. उनका तर्क हनुमानजी के व्यवहार को जाट समुदाय के कथित स्वभाव से जोड़ने पर आधारित था.
- इसके बाद भाजपा नेता विनीत अग्रवाल शारदा ने हनुमानजी को वैश्य समुदाय से जोड़ने का दावा किया.
और फिर आया ‘ओबीसी’ वाला दावा
हनुमानजी को ओबीसी बताने वाला बयान भी सामने आया था. अगस्त 2019 में बिहार के तत्कालीन भाजपा मंत्री ब्रज किशोर बिंद ने दावा किया कि भगवान शिव और हनुमानजी बिंद समुदाय से थे. बिंद समुदाय बिहार में ओबीसी श्रेणी में आता है. उन्होंने अपने तर्क में कहा था कि जब राम को क्षत्रिय और कृष्ण को यादव कहा जाता है तो शिव और हनुमान को बिंद क्यों नहीं माना जा सकता.
यानी जिस भगवान को करोड़ों लोग श्रद्धा, शक्ति और भक्ति के प्रतीक के रूप में देखते हैं, राजनीतिक बयानबाजी में उनके लिए अलग-अलग ‘जाति प्रमाणपत्र’ पेश होने लगे. भगवान राम भी जातीय पहचान से नहीं बचे
हनुमानजी की जाति को लेकर विवाद के दौरान
तत्कालीन मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने सवाल उठाया था कि अगर हनुमान को किसी जाति से जोड़ा जा रहा है तो फिर कृष्ण की जाति यादव और राम की जाति क्या होगी? इसी विवाद पर समाजवादी पार्टी के नेता शिवपाल यादव ने भी कहा था कि देवताओं को जाति के आधार पर बांटना उचित नहीं है.
यह प्रसंग इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारतीय धार्मिक परंपरा में राम, कृष्ण, शिव और हनुमान की पहचान केवल किसी सामाजिक जाति तक सीमित नहीं रही है. इनके चरित्रों की व्याख्या अलग-अलग संप्रदायों, परंपराओं और क्षेत्रों में अलग-अलग ढंग से होती रही है.
- कभी जाति, कभी वर्ग और कभी उत्तर-दक्षिण
- अब बहस जाति से आगे बढ़कर आर्थिक वर्ग और भौगोलिक पहचान तक पहुंच गई है.
रेवंत रेड्डी(Revanth Reddy) के ताजा बयान में राम को अमीरों और शिव को गरीबों से जोड़ा गया. साथ ही उत्तर भारत को रामभक्ति और दक्षिण भारत को शिवभक्ति से जोड़ने का राजनीतिक-सांस्कृतिक तर्क रखा गया.
लेकिन भारतीय धार्मिक परंपरा में राम और शिव के संबंध की कथाएं भी मौजूद हैं. रामेश्वरम की परंपरा में भगवान राम द्वारा शिव की पूजा का उल्लेख मिलता है. रामचरितमानस की भक्ति परंपरा में भी राम और शिव को परस्पर श्रद्धा से जुड़ा बताया गया है. इसलिए धार्मिक दृष्टि से राम और शिव को परस्पर विरोधी खेमों में रखकर देखना एक राजनीतिक व्याख्या हो सकती है, लेकिन इसे सनातन परंपरा की सर्वमान्य व्याख्या कहना अलग बात होगी.
भगवान को जाति देने से किसका भला?
भारत में जाति वास्तविक सामाजिक और राजनीतिक प्रश्न है. वंचित समुदायों के प्रतिनिधित्व, सामाजिक न्याय और सम्मान के सवाल अपनी जगह महत्वपूर्ण हैं. इसी कारण कुछ नेताओं ने हनुमानजी को दलित, आदिवासी या ओबीसी समुदाय से जोड़कर अपने सामाजिक-राजनीतिक संदेश को व्यक्त करने की कोशिश की.
लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब किसी देवता की पहचान को चुनावी समीकरण का हिस्सा बना दिया जाता है.
2018 में हनुमानजी की जाति को लेकर विवाद इतना बढ़ा कि अलग-अलग नेताओं की ओर से उनके लिए अलग-अलग पहचानें सामने आने लगीं. एक रिपोर्ट ने उस दौर को ‘पहले दलित, फिर मुस्लिम, अब जाट’ जैसी बहस के रूप में दर्ज किया था.
सवाल यह नहीं कि कोई नेता किस सामाजिक समूह को सम्मान दिलाना चाहता है. सवाल यह है कि सम्मान देने के लिए भगवान को किसी जाति में बांटना क्यों जरूरी हो?
आस्था का दायरा राजनीति से बड़ा है
भगवान राम(God Ram) को कोई मर्यादा पुरुषोत्तम मानता है, कोई आदर्श राजा. कृष्ण को कोई योगेश्वर कहता है तो कोई अपना आराध्य. शिव के लिए कोई महादेव कहता है तो कोई भोलेनाथ. हनुमान के लिए भक्ति, शक्ति, सेवा और समर्पण सबसे प्रमुख भाव हैं.
इन आस्थाओं की ताकत शायद इसी में है कि इनके अनुयायी जाति, भाषा, क्षेत्र और आर्थिक स्थिति से परे उन्हें अपना आराध्य मानते हैं.
राजनीति को समाज की वास्तविक समस्याओं-गरीबी, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक भेदभाव और अवसरों की असमानता-पर बहस करनी है तो वह जरूरी भी है. लेकिन जब इन मुद्दों को स्थापित करने के लिए देवी-देवताओं की जाति या आर्थिक वर्ग तय किए जाने लगें, तो बहस का केंद्र बदल जाता है.
- कल तक सवाल था-हनुमानजी दलित हैं, जाट हैं, वैश्य हैं या ओबीसी?
- आज सवाल है-राम अमीरों के हैं और शिव गरीबों के?
- कल शायद कोई पूछे-कौन-सा भगवान किस वर्ग या क्षेत्र का है?
आस्था की दुनिया में शायद इससे बड़ा विरोधाभास और क्या होगा कि जो भगवान भक्तों को जोड़ने के प्रतीक माने जाते हैं, उन्हीं के नाम पर इंसानों के बीच पहचान की नई दीवारें खड़ी की जाएं.
भगवान की जाति पूछने से पहले शायद यह पूछना ज्यादा जरूरी है कि हमारी अपनी राजनीति कब जाति और वर्ग से ऊपर उठकर नागरिक को केवल नागरिक मानेगी.
Written By: Rajiv Mandal
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