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Indigo Blues: आखिर क्यों भारत में हर एयरलाइन डूब जाती है? जानें क्यों नहीं टिक पाती कोई कंपनी?
Authored By: Nishant Singh
Published On: Friday, December 5, 2025
Last Updated On: Friday, December 5, 2025
भारत का आसमान बाहर से जितना चमकदार दिखता है, भीतर से उतना ही खतरनाक है. उदारीकरण के बाद ईस्ट-वेस्ट से लेकर किंगफिशर, जेट और गोफर्स्ट तक- दो दर्जन एयरलाइंस मिट गईं, और भारत दुनिया की सबसे बड़ी ‘एयरलाइन कब्रगाह’ बन गया. महंगा जेट फ्यूल, डॉलर में बढ़ता खर्च, किराये की अंधाधुंध प्रतिस्पर्धा और लीज़ पर निर्भरता हर नई कंपनी की कमर तोड़ देती है. इंडिगो और एयर इंडिया जैसी बची कंपनियां भी अब भारी दबाव झेल रही हैं.
Authored By: Nishant Singh
Last Updated On: Friday, December 5, 2025
Indigo Blues: भारत दुनिया के सबसे तेज़ बढ़ते एविएशन बाज़ारों में है, हवाई यात्रियों की संख्या हर साल नए रिकॉर्ड तोड़ रही है. ऊपर से देखो तो आसमान नीला और चमकदार दिखता है, लेकिन इस चमक के नीचे एक ऐसी सच्चाई छिपी है जिसने बीते तीन दशकों में दो दर्जन एयरलाइंस को जमीन पर ला पटका है. ईस्ट-वेस्ट से लेकर किंगफिशर, जेट से लेकर गो फर्स्ट. एक के बाद एक एयरलाइंस ऐसे गिरीं जैसे कोई अदृश्य हाथ उन्हें खींचकर कब्रगाह में डाल देता हो. आखिर भारत में एयरलाइन टिक क्यों नहीं पाती? यही इस कहानी का असली रहस्य है.
1991: जब आसमान खुला और सपनों की बरसात हुई
उदारीकरण से पहले आसमान पूरी तरह सरकार के कब्जे में था. एयर इंडिया विदेशी रूट्स पर और इंडियन एयरलाइंस घरेलू उड़ानों पर बादशाहत करती थी. प्राइवेट कंपनियों का प्रवेश लगभग नामुमकिन था. फिर 1991 का आर्थिक तूफ़ान आया और दरवाज़े खुल गए. नई कंपनियां ऐसे फूटीं जैसे मॉनसून में घास-ईस्ट-वेस्ट, दमानिया, मोदीलुफ़्त, एनईपीसी, सहारा… सभी ने सोचा कि अब आसमान उनका होगा. बेहतर सेवा, कम किराया और नए हवाई जहाज़-हर कोई इंडियन एयरलाइंस को चुनौती देने उतरा. लेकिन दशक खत्म होने से पहले सपने टूटने लगे और ज्यादातर एयरलाइंस इतिहास बनने लगीं.
तेज़ उड़ान… और उससे भी तेज़ गिरावट
भारत की पहली प्राइवेट शेड्यूल्ड एयरलाइन बनी ईस्ट-वेस्ट. इंडियन एयरलाइंस से भी सस्ता किराया रखा, लेकिन सस्ते किराए की यह दौड़ उसे सीधे घाटे की खाई में ले गई. 1995 आते-आते बैंक लोन बंद, बेड़ा ज़मीन पर और कंपनी दिवालिया. संस्थापक वाहिद की हत्या ने पूरी कहानी को और रहस्यमय बना दिया.
दमानिया एयरलाइंस ने आरामदायक सीट, गर्म खाना, प्रीमियम अनुभव तो दिया लेकिन टिकट के दाम लागत का बोझ नहीं संभाल पाए. कुछ ही सालों में जहाज़ बेचकर कंपनी ने खुद को बंद कर दिया. एनईपीसी और मोदीलुफ़्त का हाल भी ऐसा ही रहा-किराया कम, खर्च ज्यादा और अंत बहुत तेज़.
सहारा: महत्वाकांक्षा का सबसे बड़ा क्रैश
1993 में लॉन्च हुई एयर सहारा उस दौर की सबसे महत्वाकांक्षी एयरलाइन थी. बॉम्बे-दिल्ली का किराया आधा कर दिया और यात्रियों की भीड़ उमड़ पड़ी. लेकिन तभी एशियाई आर्थिक संकट ने रुपया गिरा दिया और डॉलर में होने वाली लीज़ लागत आसमान छू गई. नुकसान इतना बढ़ गया कि पहले 49% हिस्सा जेट एयरवेज को बेचना पड़ा और बाद में पूरी एयरलाइन ही बिक गई. नाम बदला, मालिक बदले, लेकिन अंत में सहारा और जेट – दोनों ही इतिहास बन गए.
मोदीलुफ़्त: जब कॉर्पोरेट अहंकार ने एयरलाइन मार दी
जर्मन दिग्गज लुफ्थांसा और मोदी समूह की साझेदारी से बनी मोदीलुफ़्त शुरू में काफी चर्चा में रही. लेकिन पैसों के उपयोग पर दोनों पार्टनर्स में ऐसा झगड़ा भड़का कि 1996 में लुफ्थांसा ने एक रात में अपने सारे जहाज़ वापस बुला लिए. अगले हफ्ते DGCA ने लाइसेंस सस्पेंड कर दिया और कहानी खत्म. यानी भारत में एयरलाइन की मौत का फॉर्मूला एक जैसा ही रहा-करोड़ों का खर्च, सौ फीसदी लीज़ पर जहाज, मुद्रा संकट में लागत का फटना और अंत में प्रमोटर का हारा हुआ जुआ.
2000 का लो-कॉस्ट बूम: उड़ान सबको मिली, टिकना किसी को नहीं
2003 में एयर डेक्कन ने किराया इतना सस्ता कर दिया कि ट्रेन वाले भी प्लेन चढ़ने लगे-‘चप्पल वाले भी उड़ेंगे’ वाला उनका नारा पूरे भारत में छा गया. इसके बाद स्पाइसजेट और इंडिगो आए. डेक्कन को किंगफिशर ने खरीदा, लेकिन लग्जरी के भूचाल में 8,000 करोड़ का कर्ज डूब गया. उसके बाद पैरामाउंट, एयर कोस्टा, पैगासस, ओडिशा, डेक्कन 360… सब एक-एक करके खत्म हो गए. जेट एयरवेज 2019 में और गोफर्स्ट 2023 में दिवालिया घोषित हो गई. यानी एयरलाइन शुरू करना आसान है, चलाना सबसे मुश्किल.
आज भी जस का तस: वो जाल जो एयरलाइंस को मार देता है
विशेषज्ञ कहते हैं कि भारत का ‘एविएशन ट्रैप’ आज भी वही है-
- जेट फ्यूल (ATF) दुनिया में सबसे महंगा, लागत का लगभग 45%
- टिकटों पर इतनी प्रतिस्पर्धा कि कंपनियां लाभ कमाने का सपना भी नहीं देख पातीं
- अधिकांश खर्च डॉलर में, लेकिन भुगतान रुपये में – झटका पड़ा और मॉडल ढह गया
- लीज़ पर जहाज़, पैसा रुका नहीं कि लेसर जहाज़ वापस ले जाते हैं
यह ऐसा फंदा है जिसमें एयरलाइन जितना छटपटाए, उतना और उलझती चली जाती है.
जो आज भी बचे हुए हैं… उनकी सांसें भी भारी हैं
इंडिगो आज भी सबसे बड़ा नाम है. नो-फ्रिल्स मॉडल, एक ही तरह के एयरबस जहाज और लगभग ज़ीरो कर्ज – ये उसकी ताकत रही है. लेकिन अब नए FDTL नियम, बढ़ता फ्यूल खर्च और डॉलर के उतार-चढ़ाव ने उसके मॉडल पर भी दबाव बढ़ा दिया है. एयर इंडिया टाटा के हाथों में नई शुरुआत कर चुकी है, पर अभी मंज़िल दूर है. स्पाइसजेट कभी चलता है, कभी लटकता. अकासा नई उम्मीद है, लेकिन अभी उसे भी लंबी उड़ान भरनी है. यानी भारत का आसमान जितना चमकीला है, यहां एयरलाइन चलाना उतना ही खतरनाक खेल है. जिस इतिहास से हमने नहीं सीखा, वो अपने आपको बार-बार दोहराता है.
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