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ट्रंप ने बदला चुनावी नक्शा, फिर भी क्यों हार गई रणनीति? बीजेपी के लिए क्या है सबक
Authored By: Mazhar Pathan
Published On: Friday, November 6, 2026
Last Updated On: Friday, November 6, 2026
अमेरिका में ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी ने चुनाव से पहले क्षेत्रों के नक्शे अपने हिसाब से खींचे, पर नतीजों ने दिखा दिया कि यह दांव हर बार नहीं चलता. भारत में परिसीमन की चर्चा गर्म है, तो क्या बीजेपी के लिए इसमें कोई सबक छिपा है?
Authored By: Mazhar Pathan
Last Updated On: Friday, November 6, 2026
अमेरिका के 2026 मध्यावधि चुनाव ने एक पुरानी बात फिर याद दिला दी: चुनाव लकीरों से नहीं, लोगों के मन से जीते जाते हैं. रिपब्लिकन पार्टी ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के इशारे पर कई राज्यों में संसदीय क्षेत्रों की सीमाएं नए सिरे से खींची थीं. मकसद साफ था, सदन में पकड़ मजबूत करना. मगर नतीजे आए तो तस्वीर पार्टी की उम्मीदों जैसी नहीं निकली.
‘द हिंदू’ में वरघीस के. जॉर्ज ने इसी घटनाक्रम को आधार बनाकर बीजेपी के लिए एक राजनीतिक सीख निकाली है. उनकी दलील सीधी है. नक्शा किसी पार्टी के पक्ष में झुकाया जा सकता है, वोटर का मिजाज नहीं.
ट्रंप ने आखिर किया क्या था?
अमेरिका में हर दस साल पर जनगणना होती है और उसके बाद आबादी के हिसाब से संसदीय क्षेत्रों की सीमाएं दोबारा तय की जाती हैं. नियम तो यही कहता है. दिक्कत तब शुरू होती है जब दल इस मौके को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करने लगते हैं.
इसी खेल का नाम गेरिमैंडरिंग है. मोटे तौर पर इसमें विरोधी पार्टी के समर्थकों को या तो कई क्षेत्रों में बिखेर दिया जाता है, या एक ही क्षेत्र में ठूंस दिया जाता है, ताकि उनके वोट का असर कम हो जाए.
2026 के चुनाव से पहले रिपब्लिकन पार्टी ने कई राज्यों में यही कोशिश की. उसे भरोसा था कि डेमोक्रेटिक पार्टी की कुछ सीटें इस तरह उसकी झोली में आ जाएंगी और संसद में उसका पलड़ा भारी रहेगा.
पर हुआ उल्टा. एसोसिएटेड प्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक रिपब्लिकन अपनी ज्यादातर लक्षित सीटें नहीं निकाल पाए. कई जगह डेमोक्रेटिक उम्मीदवार नए नक्शे के बावजूद जीत गए. यानी जनता का बदला हुआ रुख पार्टी के हिसाब-किताब पर भारी पड़ गया.
नक्शा बदलने से जीत पक्की नहीं होती
इस पूरे किस्से की सबसे काम की बात यही है कि लकीरें खींचकर वोटर की नाराजगी को दबाया नहीं जा सकता. महंगाई, नौकरी, इलाज या सरकार के फैसलों से लोग परेशान हों, तो वह गुस्सा वोट की शक्ल में बाहर आता है. कागज पर कोई इलाका किसी पार्टी का गढ़ दिख सकता है, पर मतदान के दिन मूड पलट जाए तो पूरा गणित बैठ जाता है.
अमेरिका में रिपब्लिकन रणनीति के साथ यही हुआ. ट्रंप की नीतियों, अर्थव्यवस्था और दूसरे मुद्दों पर लोगों की नाराजगी ने नतीजों पर असर डाला.
भारत में परिसीमन की बात क्यों उठ रही है?
अब इस घटना को भारत के संदर्भ में देखा जा रहा है, क्योंकि यहां भी जनगणना और परिसीमन का सवाल आने वाले दिनों में बड़ा मुद्दा बनने वाला है.
परिसीमन यानी लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं को नए सिरे से तय करना, ताकि चुनावी क्षेत्र आबादी के अनुपात में रहें. भारत निर्वाचन आयोग के मुताबिक मौजूदा लोकसभा क्षेत्रों की सीमाएं 2001 की जनगणना पर टिकी हैं.
संविधान के अनुच्छेद 82 के तहत जनगणना के बाद संसद कानून बनाती है और परिसीमन आयोग क्षेत्रों की सीमाएं तय करता है. मौजूदा व्यवस्था यह भी कहती है कि 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना के संबंधित आंकड़े आने तक राज्यों के बीच लोकसभा सीटों के बंटवारे को बदलना जरूरी नहीं है.
देश की अगली जनगणना 2027 के लिए तय है. ऐसे में आगे चलकर परिसीमन पर राजनीतिक और संवैधानिक बहस और तेज होने के पूरे आसार हैं.
बीजेपी इससे क्या सीख सकती है?
जॉर्ज का कहना है कि चुनावी इलाकों का गणित हमेशा एक जैसा नहीं रहता. किसी इलाके में किसी पार्टी का पक्का वोट बैंक है, इसका मतलब यह नहीं कि वहां का वोटर हर बार उसी को चुनेगा.
इसके लिए वे बिहार के बांकीपुर उपचुनाव का उदाहरण देते हैं. जन सुराज के प्रशांत किशोर ने यहां बीजेपी उम्मीदवार को 19,324 वोटों से हराया. चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार किशोर को 64,151 और बीजेपी प्रत्याशी को 44,827 वोट मिले.
लेखक इसे बीजेपी के परंपरागत समर्थक वर्ग में आ रहे बदलाव की मिसाल मानते हैं. फिर भी यह याद रखना चाहिए कि आधिकारिक नतीजे सिर्फ वोट बताते हैं. वे यह साबित नहीं करते कि किसी खास जाति या समुदाय के मतदाताओं ने किस वजह से अपना वोट बदला.
अंत में भरोसा ही असली गणित है
अमेरिका का चुनाव और भारत की परिसीमन बहस, दोनों हमें एक ही सवाल पर ले आते हैं: क्या सीमाएं बदलकर लंबे समय तक सियासी फायदा लिया जा सकता है? सीटों का गणित शुरुआत में बढ़त दिला सकता है, पर जनता का साथ बनाए रखना बिल्कुल अलग मेहनत है. वोटर अपने अनुभव, अपने इलाके की दिक्कतों और सरकार के काम को देखकर फैसला करता है. यही इस पूरे मामले का निचोड़ है. नक्शा दोबारा खींचा जा सकता है, पर लोगों की सोच को किसी नक्शे के दायरे में बांधा नहीं जा सकता.













