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UN General Assembly 2026: मोदी, शी जिनपिंग और पुतिन क्यों नहीं पहुंचे न्यूयॉर्क?
Authored By: Galgotias Times Bureau
Published On: Saturday, September 26, 2026
Last Updated On: Saturday, September 26, 2026
UN General Assembly 2026 में मोदी, शी जिनपिंग और पुतिन समेत कई बड़े नेता न्यूयॉर्क नहीं पहुंचे. आखिर क्यों? जानिए 81वीं महासभा में क्या बदला और कौन कर रहा है देशों का प्रतिनिधित्व.
Authored By: Galgotias Times Bureau
Last Updated On: Saturday, September 26, 2026
UN General Assembly 2026: संयुक्त राष्ट्र महासभा जो दुनिया की सबसे बड़ी बैठकों में से एक है. जहां दुनिया के अलग-अलग देशों के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर पहुंचते हैं. यहां वे अपने देश की बात दुनिया के सामने रखते हैं और दूसरे देशों के नेताओं के साथ कई अहम मुलाकातें भी करते हैं.लेकिन इस बार की तस्वीर कुछ अलग है. भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी(PM Modi) से लेकर चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग(Xi Jinping) और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन(Putin) तक कई बड़े नेता खुद न्यूयॉर्क नहीं पहुंचे.
हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि इन देशों ने महासभा में हिस्सा नहीं लिया. ज्यादातर देशों ने अपने विदेश मंत्री या दूसरे बड़े नेताओं को वहां भेजा है. आखिर ऐसा क्यों हुआ और इस बार की महासभा में क्या खास है? इसे आसान भाषा में समझते हैं.
सबसे पहले समझिए, महासभा होती क्या है?
- संयुक्त राष्ट्र में दुनिया के 193 देश सदस्य हैं. महासभा वह मंच है जहां इन सभी देशों को अपनी बात रखने का मौका मिलता है.
- हर साल सितंबर में इसकी बड़ी बैठक होती है. इस दौरान दुनिया के कई बड़े नेता एक ही जगह पर पहुंचते हैं. युद्ध, शांति, गरीबी, जलवायु, आतंकवाद, कारोबार और दुनिया से जुड़े दूसरे बड़े मुद्दों पर चर्चा होती है.
- इस बार संयुक्त राष्ट्र की 81वीं महासभा 22 से 26 सितंबर और फिर 28 सितंबर को रखी गई है.
- इस सत्र की अध्यक्षता बांग्लादेश के विदेश मंत्री खलीलुर रहमान कर रहे हैं.
नरेंद्र मोदी क्यों नहीं पहुंचे?
- भारत की ओर से इस बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Modi) संयुक्त राष्ट्र महासभा में नहीं पहुंचे. उनकी जगह विदेश मंत्री एस. जयशंकर भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं.
- मोदी ने आखिरी बार 2021 में महासभा को संबोधित किया था. इसके बाद भारत की ओर से कई बार जयशंकर ने यह जिम्मेदारी संभाली है.
- इसका मतलब यह नहीं है कि भारत ने महासभा को नजरअंदाज किया है. जयशंकर वहां भारत की ओर से दूसरे देशों के नेताओं और विदेश मंत्रियों के साथ बातचीत कर रहे हैं.
- भारत के लिए यह बैठक इसलिए भी अहम है क्योंकि आने वाले समय में संयुक्त राष्ट्र (General Assembly)सुरक्षा परिषद की अस्थायी सदस्यता के लिए भारत की कोशिशें जारी हैं.
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की गैर-मौजूदगी क्यों चर्चा में है?
- चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग (Xi Jinping) का इस बार महासभा में नहीं पहुंचना इसलिए ज्यादा चर्चा में है क्योंकि वह अमेरिका की यात्रा पर थे.
- वह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से मुलाकात के लिए अमेरिका पहुंचे थे, लेकिन न्यूयॉर्क जाकर संयुक्त राष्ट्र महासभा में शामिल नहीं हुए.
- शी जिनपिंग आखिरी बार 2015 में खुद संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय पहुंचे थे. उसके बाद से वह व्यक्तिगत रूप से महासभा में नहीं आए.
- चीन ने इस बार भी अपने प्रतिनिधित्व के लिए वरिष्ठ अधिकारी भेजे हैं.
पुतिन की गैर-मौजूदगी कोई नई बात नहीं
- रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भी इस बार न्यूयॉर्क नहीं पहुंचे.
- उनकी जगह रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने देश का प्रतिनिधित्व किया.
- पुतिन की महासभा से दूरी काफी पुरानी है. वह आखिरी बार 2015 में संयुक्त राष्ट्र महासभा में खुद शामिल हुए थे.
- इसके बाद रूस की तरफ से ज्यादातर विदेश मंत्री लावरोव ही इस बैठक में दिखाई दिए हैं.
- इसलिए रूस के मामले में इस बार की गैर-मौजूदगी को अचानक लिया गया फैसला नहीं कहा जा सकता.
जर्मनी और इटली के नेता भी नहीं पहुंचे
जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज भी इस बार महासभा में नहीं पहुंचे. उनकी जगह विदेश मंत्री योहान वाडेफुल ने जर्मनी की ओर से हिस्सा लिया.
इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी भी न्यूयॉर्क नहीं पहुंचीं. उनकी जगह विदेश मंत्री एंतोनियो ताजानी वहां गए.
इटली की ओर से बताया गया कि इस समय देश के अंदर कई जरूरी काम हैं, इसलिए प्रधानमंत्री ने घरेलू मामलों पर ध्यान देने का फैसला किया.
यानी हर देश के नेता के नहीं आने की वजह एक जैसी नहीं है.
दक्षिण अफ्रीका और मिस्र की कहानी भी अलग
दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामाफोसा ने स्वास्थ्य कारणों से इस बैठक में शामिल नहीं होने का फैसला किया. उनकी जगह विदेश मंत्री रोनाल्ड लामोला ने देश का प्रतिनिधित्व किया. मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सिसी भी इस बार खुद नहीं पहुंचे. मिस्र की तरफ से प्रधानमंत्री मुस्तफा मदबूली महासभा में शामिल हुए. नाइजीरिया के राष्ट्रपति बोला टिनूबू भी इस बार वहां नहीं पहुंचे. उनकी जगह उपराष्ट्रपति काशिम शेट्टीमा ने देश का प्रतिनिधित्व किया.
महमूद अब्बास का मामला सबसे अलग
फिलिस्तीन के राष्ट्रपति महमूद अब्बास की स्थिति बाकी नेताओं से अलग है. वह महासभा में व्यक्तिगत रूप से शामिल नहीं हो सके क्योंकि अमेरिका ने उनके लिए राजनयिक प्रवेश अनुमति नहीं दी. इसके बावजूद फिलिस्तीन को महासभा में अपनी बात रखने का रास्ता दिया गया और अब्बास ने दूर से संदेश के जरिए अपनी बात रखने की योजना बनाई.
यानी यहां उनकी गैर-मौजूदगी सिर्फ यात्रा न करने का फैसला नहीं थी, बल्कि अमेरिका और फिलिस्तीन के बीच चल रहे गंभीर मतभेद से जुड़ी हुई थी.
आखिर इस बार की महासभा इतनी अहम क्यों है?
यह बैठक ऐसे समय हो रही है जब दुनिया कई बड़े संकटों से जूझ रही है. मध्य-पूर्व में संघर्ष जारी है. रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध खत्म नहीं हुआ है. दुनिया के कई हिस्सों में तनाव बढ़ा हुआ है. इसके अलावा जलवायु परिवर्तन, आर्थिक परेशानियां और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसी नई चुनौतियां भी देशों के सामने हैं.
ऐसे समय में संयुक्त राष्ट्र से उम्मीद की जाती है कि वह देशों को बातचीत के लिए एक साझा मंच देगा. इस बार की बैठक संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेस के लिए भी खास है. उनका कार्यकाल 2026 के अंत में खत्म होने वाला है. यानी यह उनके कार्यकाल की आखिरी बड़ी महासभा है.
गुटेरेस ने अपने संबोधन में दुनिया में चल रहे युद्धों को खत्म करने और संयुक्त राष्ट्र को और मजबूत बनाने की जरूरत पर जोर दिया.
बड़े नेता नहीं आए, तो क्या संयुक्त राष्ट्र कमजोर हो रहा है?
सिर्फ कुछ बड़े नेताओं के नहीं पहुंचने से ऐसा निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा. इस बैठक में करीब 130 देशों के राष्ट्राध्यक्ष और सरकार प्रमुख व्यक्तिगत रूप से शामिल हो रहे हैं. बाकी देशों ने भी अपने विदेश मंत्रियों और वरिष्ठ अधिकारियों को भेजा है.
इसलिए इस बार की तस्वीर को एक दूसरे तरीके से भी देखा जा सकता है. दुनिया के बड़े देशों ने संयुक्त राष्ट्र से दूरी नहीं बनाई है, लेकिन कई देशों ने यह जरूर तय किया है कि इस मंच पर उनके देश का प्रतिनिधित्व किस स्तर पर होगा.
यही इस बार की महासभा की सबसे खास बात है. एक तरफ दुनिया के तमाम देश युद्ध और बढ़ते तनाव के बीच बातचीत का रास्ता तलाश रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ कई बड़े नेता खुद न्यूयॉर्क पहुंचने के बजाय अपने विदेश मंत्रियों और दूसरे वरिष्ठ नेताओं के जरिए अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे हैं.
इससे साफ है कि संयुक्त राष्ट्र का मंच अब भी महत्वपूर्ण है, लेकिन बदलती दुनिया में देश इसका इस्तेमाल अपने हिसाब से और अपनी जरूरत के मुताबिक कर रहे हैं.
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