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दावोस की मेज पर दुनिया: बर्फीले पहाड़ों में गर्म होती वैश्विक राजनीति
Authored By: गुंजन शांडिल्य
Published On: Wednesday, January 21, 2026
Last Updated On: Wednesday, January 21, 2026
दावोस में आज से वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की मीटिंग शुरू हो गई है. इसके साथ ही यह शहर कुछ दिनों के लिए अनौपचारिक रूप से वैश्विक सत्ता-राजधानी में बदल गया है. इस बार की बैठक ट्रंप की आक्रामक टैरिफ नीति, वेनेजुएला, ईरान और ग्रीनलैंड जैसे मुद्दों पर दिए गए बयान, और ‘अमेरिका फ़र्स्ट’ की नई व्याख्या के बीच हो रही है.
Authored By: गुंजन शांडिल्य
Last Updated On: Wednesday, January 21, 2026
Davos Global Politics: प्रत्येक वर्ष जनवरी में स्विट्ज़रलैंड के एल्प्स की बर्फ़ीली पहाड़ियों के बीच बसा एक छोटा-सा शहर दावोस कुछ दिनों के लिए अनौपचारिक रूप से वैश्विक सत्ता-राजधानी में बदल जाता है. करीब दस हजार की आबादी और स्की-रिज़ॉर्ट के तौर पर पहचाने जाने वाले इस शहर में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की सालाना बैठक होती है.
बैठक के दौरान यह शहर वैश्विक राजनीति, कॉरपोरेट ताक़त और नीति-निर्माण के सबसे बड़े मंच में तब्दील हो जाता है. इस बार भी करीब तीन हज़ार से अधिक राष्ट्राध्यक्ष, बहुराष्ट्रीय कंपनियों, अंतरराष्ट्रीय संस्थानों, थिंक टैंकों और टेक्नोलॉजी जगत के दिग्गज दावोस पहुंच गए हैं. इनके अलावा सैकड़ों एक्टिविस्ट, पत्रकार और पर्यवेक्षक भी इस पूरी कवायद पर नज़र रखते हैं.
क्या है, वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम?
जिनेवा स्थित वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की स्थापना 1971 में हुआ था. जर्मन अर्थशास्त्री क्लॉस श्वाब ने इसकी शुरुआत की थी. शुरुआती दौर में यह मंच यूरोपीय बिज़नेस एग्ज़ीक्यूटिव्स के लिए बना था. लेकिन समय के साथ यह वैश्विक अर्थव्यवस्था, असमानता, जलवायु परिवर्तन, तकनीक और भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा जैसे मुद्दों पर होने वाली सबसे प्रभावशाली चर्चाओं का केंद्र बन गया.
एल्प्स में समुद्र तल से लगभग पंद्रह सौ मीटर की ऊंचाई पर स्थित दावोस इन दिनों सिर्फ एक शहर यह स्थान नहीं है, बल्कि यह वैश्विक शक्ति-संवाद का प्रतीक है.
इस वर्ष दावोस बैठक क्यों है, महत्वपूर्ण?
इस साल की बैठक ऐसे समय हो रही है, जब दुनिया का भू-राजनीतिक माहौल असाधारण रूप से अस्थिर और जटिल है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की वापसी और उनकी आक्रामक टैरिफ नीति, वेनेजुएला, ईरान और ग्रीनलैंड जैसे मुद्दों पर दिए गए बयान, और ‘अमेरिका फ़र्स्ट’ की नई व्याख्या ने वैश्विक व्यवस्था को झकझोर दिया है.
दावोस में यह सवाल बार-बार उठ रहा है कि क्या अमेरिका अब भी उसी तरह वैश्विक नेतृत्व की भूमिका निभाएगा. या फिर दुनिया को नए शक्ति-केंद्रों के साथ जीने की आदत डालनी होगी.
कौन-कौन जुटा दावोस में
इसी पृष्ठभूमि में रिकॉर्ड संख्या में राजनीतिक नेता दावोस पहुंचे हैं. आयोजकों के अनुसार, लगभग चार सौ शीर्ष राजनीतिक हस्तियों में साठ से अधिक राष्ट्राध्यक्ष और सरकार प्रमुख शामिल हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप मुख्य वक्ताओं में हैं. उनके साथ अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो, ट्रेज़री सचिव स्कॉट बेसेंट और विशेष दूत स्टीव विटकॉफ जैसे प्रमुख चेहरे मौजूद हैं.
फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों, यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन, यूक्रेन के राष्ट्रपति वलोडिमिर ज़ेलेंस्की, कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी, चीन के उप-प्रधानमंत्री हे लिफेंग और अफ्रीका व पश्चिम एशिया के कई नेता भी इस मंच पर वैश्विक समीकरणों पर अपनी बात रखने वाले हैं.
वित्त, विदेश, व्यापार और उद्योग से जुड़े दर्जनों मंत्री और कई केंद्रीय बैंक गवर्नर भी दावोस की गलियों और कॉन्फ़्रेंस हॉलों में दिखाई दे रहे हैं.
कॉरपोरेट की बड़ी हस्तियां भी मौजूद
राजनीति के साथ-साथ कॉरपोरेट और टेक्नोलॉजी जगत की मौजूदगी भी यहां उतनी ही प्रभावशाली है. दुनिया की लगभग 850 बड़ी कंपनियों के चेयरमैन और मुख्य कार्यकारी अधिकारी अपनी रणनीतियां यहां साझा कर रहे हैं।
AI इस बार का मुख्य मुद्दा
आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (AI) इस बार दावोस की चर्चाओं के केंद्र में है. एनवीडिया के जेन्सेन हुआंग, माइक्रोसॉफ्ट के सत्या नडेला, गूगल डीपमाइंड के डेमिस हसाबिस और यूरोप की उभरती AI कंपनी मिस्ट्रल के आर्थर मेंश जैसे नाम यह संकेत दे रहे हैं कि तकनीक अब बाज़ार के विषय के साथ-साथ सत्ता और श्रम का भी सवाल बन चुकी है.
AI को लेकर दावोस में दो धराएं साफ दिखाईं दे रही हैं. एक ओर बिज़नेस लीडर इसे उत्पादकता और मुनाफ़ा बढ़ाने का ऐतिहासिक अवसर मानते हैं, वहीं मज़दूर संगठनों और नागरिक समूहों को डर है कि यह करोड़ों नौकरियों और आजीविकाओं के लिए ख़तरा बन सकता है. नीति-निर्माताओं के सामने चुनौती यह है कि वे नवाचार को रोके बिना ऐसे नियम कैसे बनाएं, जो समाज को असंतुलन से बचा सकें.
इस वर्ष की थीम ‘बातचीत की भावना’
इस साल फोरम ने अपनी बैठक के लिए ‘बातचीत की भावना’ को आधिकारिक थीम के रूप में चुना है. सहयोग, विकास, लोगों में निवेश, नवाचार और साझा समृद्धि जैसे शब्द मंच से बार-बार दोहराए जा रहे हैं. ऐसे दावोस की यह भाषा नई नहीं है.
इसके आलोचक वर्षों से कहते आ रहे हैं कि यहां विचारों की भरमार होती है, लेकिन दुनिया में बढ़ती आर्थिक असमानता, जलवायु संकट और युद्ध जैसे मुद्दों पर ठोस और बाध्यकारी कार्रवाई कम ही दिखती है.
दावोस: एक एलीट क्लब
आलोचक दावोस को अक्सर एक ऐसे एलीट क्लब के रूप में देखा जाता है, जहां दुनिया की समस्याओं पर चर्चा तो होती है. लेकिन उन समस्याओं को पैदा करने वाली व्यवस्था पर सवाल उठाने की हिम्मत कम नज़र आती है.
इन आलोचनाओं के बावजूद दावोस को नज़रअंदाज़ करना मुश्किल है. यहां होने वाली बातचीत सीधे-सीधे नीतियों में न भी बदले, तो भी यह आने वाले वर्षों की राजनीति, बाज़ार और तकनीक की दिशा के संकेत ज़रूर देती है.
एक आलोचक का कहना है, ‘एल्प्स की बर्फ़ के बीच होने वाली ये बैठकें, दरअसल उस बेचैन दुनिया की तस्वीर पेश करती हैं, जो एक साथ सहयोग और टकराव, नवाचार और असुरक्षा, और समृद्धि व असमानता के बीच झूल रही है.
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