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Pulmonary Hypertension: लखनऊ में 8-9 अगस्त को PH समिट, देश-विदेश के विशेषज्ञों ने बीमारी की जल्द पहचान और बेहतर इलाज पर किया मंथन
Authored By: Nishant Singh
Published On: Monday, August 10, 2026
Last Updated On: Monday, August 10, 2026
Pulmonary Hypertension: पल्मोनरी हाइपरटेंशन की पहचान अक्सर देर से होती है, जबकि सांस फूलना इसका शुरुआती संकेत हो सकता है. लखनऊ में आयोजित PH समिट में विशेषज्ञों ने बीमारी की जल्द पहचान, आधुनिक जांच और बेहतर उपचार पर चर्चा की. समय पर इलाज से गंभीर स्थिति और जटिलताओं का जोखिम कम किया जा सकता है.
Authored By: Nishant Singh
Last Updated On: Monday, August 10, 2026
Pulmonary Hypertension: सीढ़ियां चढ़ते समय सांस फूलना, थोड़ी सी मेहनत में थकान या अचानक चक्कर आना कई बार सामान्य कमजोरी समझकर नजरअंदाज कर दिया जाता है. लेकिन यही लक्षण पल्मोनरी हाइपरटेंशन (PH) जैसी गंभीर बीमारी का संकेत भी हो सकते हैं. इस बीमारी में फेफड़ों की रक्त वाहिकाओं में रक्तचाप बढ़ जाता है, जिससे हृदय को फेफड़ों तक रक्त पहुंचाने के लिए अधिक मेहनत करनी पड़ती है. समय पर पहचान और इलाज न मिलने पर स्थिति गंभीर हो सकती है.
लखनऊ में जुटे देश-विदेश के विशेषज्ञ

पल्मोनरी हाइपरटेंशन की चुनौती, नई जांच तकनीकों और उपचार के विकल्पों पर चर्चा के लिए किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU), लखनऊ के पल्मोनरी एवं क्रिटिकल केयर मेडिसिन विभाग की ओर से 8 और 9 अगस्त 2026 को ‘PH समिट लखनऊ 2026’ का आयोजन किया गया. KGMU शताब्दी फेज-2 अस्पताल के आठवीं मंजिल स्थित ऑडिटोरियम में हुई इस दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस की थीम ‘एडवांसिंग डायग्नोसिस, थेराप्यूटिक्स एंड आउटकम्स’ रखी गई.
समिट का उद्देश्य पल्मोनरी हाइपरटेंशन के क्षेत्र में सामने आए नए अध्ययनों और उपचार संबंधी जानकारियों को मरीजों तक पहुंचाने के साथ चिकित्सकों को बेहतर इलाज के लिए अपडेट करना रहा. उद्घाटन समारोह में उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए. अमेरिका के डॉ. संदीप सहाय और आयरलैंड के डॉ. सैयद रेहान क्वादेरी समेत देश के कई विशेषज्ञों ने इसमें भाग लिया.
बीमारी की पहचान में हो जाती है लंबी देरी
पल्मोनरी हाइपरटेंशन की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक इसकी देर से पहचान है. उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, PAH से पीड़ित करीब 70 से 80 प्रतिशत मरीजों में बीमारी का पता गंभीर चरण में चलता है. लक्षण शुरू होने और बीमारी की पहचान के बीच औसतन डेढ़ से दो साल या कई मामलों में दो साल से अधिक की देरी हो सकती है. सांस फूलना और थकान जैसे शुरुआती संकेतों को सामान्य मान लेना इस देरी की बड़ी वजह है.
विशेषज्ञों के मुताबिक बिना इलाज वाले पल्मोनरी आर्टेरियल हाइपरटेंशन में औसत जीवन अवधि तीन साल से कम हो सकती है. वहीं, स्रोत में यह भी बताया गया है कि बीमारी का पता देर से चलने पर तीन साल तक जीवित रहने की संभावना करीब 55 प्रतिशत रह जाती है. इसलिए शुरुआती लक्षणों पर ध्यान देना बेहद जरूरी है.
ये लक्षण दिखें तो रहें सतर्क
पल्मोनरी हाइपरटेंशन के लक्षण कई दूसरी हृदय और फेफड़ों की बीमारियों से मिलते-जुलते हैं. यही वजह है कि कई बार मरीज को सही बीमारी का पता देर से चलता है.
प्रमुख लक्षणों में शामिल हैं-
- बिना स्पष्ट कारण सांस फूलना
- लगातार थकान और कमजोरी
- सीने में दर्द
- चक्कर आना या बेहोशी
- पैरों, पंजों या पेट में सूजन
- सूखी खांसी या खांसी में खून आना
- जी मिचलाना या उल्टी
- होंठ और त्वचा का नीला पड़ना यानी साइनोसिस
इनमें खासतौर पर लगातार बनी रहने वाली सांस फूलने और थकान को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.
पांच प्रमुख समूहों में बांटी जाती है बीमारी
पल्मोनरी हाइपरटेंशन को इसके कारणों के आधार पर पांच प्रमुख समूहों में बांटा गया है. इनमें पल्मोनरी आर्टेरियल हाइपरटेंशन, बाईं ओर के हृदय रोग से जुड़ा PH, फेफड़ों की बीमारी या कम ऑक्सीजन से होने वाला PH, क्रोनिक थ्रोम्बोएम्बोलिक पल्मोनरी हाइपरटेंशन और अज्ञात या कई कारणों से होने वाला PH शामिल हैं.
बाईं ओर के हृदय रोग, फेफड़ों की पुरानी बीमारियां, कम ऑक्सीजन, फेफड़ों में रक्त के थक्के, जन्मजात हृदय रोग, कुछ संयोजी ऊतक रोग, HIV संक्रमण, पोर्टल हाइपरटेंशन और कुछ दवाएं इसके जोखिम को बढ़ा सकती हैं. कुछ मामले आनुवंशिक या बिना किसी ज्ञात कारण के भी होते हैं.
जांच से उपचार तक लंबी प्रक्रिया
PH की पहचान के लिए डॉक्टर मरीज की मेडिकल हिस्ट्री और शारीरिक जांच के बाद ब्लड टेस्ट, ECG, चेस्ट एक्स-रे और इकोकार्डियोग्राफी जैसी जांच कर सकते हैं. जरूरत के अनुसार लंग फंक्शन टेस्ट, स्लीप स्टडी, एक्सरसाइज टेस्ट, CT स्कैन, CMR और V/Q स्कैन किए जाते हैं. बीमारी की पुष्टि के लिए राइट हार्ट कैथीटेराइजेशन महत्वपूर्ण जांच है.
इलाज मरीज की स्थिति और बीमारी के कारण के अनुसार तय किया जाता है. इसमें जीवनशैली और खान-पान में बदलाव, ऑक्सीजन थेरेपी, अलग-अलग प्रकार की लक्षित दवाएं, डाययुरेटिक्स और एंटीकोआगुलंट्स शामिल हो सकते हैं. गंभीर मामलों में पल्मोनरी एंडार्टरेक्टॉमी, बैलून एंजियोप्लास्टी और फेफड़े का प्रत्यारोपण जैसे विकल्प भी मौजूद हैं.
जल्द पहचान ही सबसे बड़ा बचाव
विशेषज्ञों का जोर इस बात पर है कि पल्मोनरी हाइपरटेंशन को लेकर जागरूकता बढ़ाई जाए और शुरुआती संकेतों को गंभीरता से लिया जाए. KGMU का पल्मोनरी एवं क्रिटिकल केयर मेडिसिन विभाग PH मरीजों की जांच और उपचार के साथ रिस्क असेसमेंट तथा साक्ष्य आधारित इलाज पर भी काम कर रहा है. बीमारी की समय पर पहचान से उपचार शुरू करने का अवसर मिलता है और गंभीर स्थिति तक पहुंचने से बचाव संभव हो सकता है.
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