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Election Commission Dispute: शेषन से संधू-जोशी तक विवाद की पूरी कहानी
Authored By: Galgotias Times Bureau
Published On: Monday, September 28, 2026
Last Updated On: Monday, September 28, 2026
Election Commission Dispute फिर चर्चा में है. शेषन के दौर से लेकर संधू-जोशी की आपत्तियों तक, चुनाव आयोग में मतभेद की पूरी कहानी आखिर क्या है? पढ़ें पूरी खबर.
Authored By: Galgotias Times Bureau
Last Updated On: Monday, September 28, 2026
Election Commission Dispute: अतीत में शेषन से लेकर अशोक लवासा और अब सुखबीर सिंह संधू (Sukhbir Singh Sandhu) -विवेक जोशी (Vivek Joshi) तक विवाद होते रहे हैं. अधिकारियों के बीच विवाद कोई नई बात नहीं है. मगर एक अंग्रेजी अख़बार में छपी खबर ने चुनाव आयुक्तों (Election Commission) के बीच असहमति को उजागर कर दिया है. क्या है पूरा मामला… देखते हैं इस रिपोर्ट में.
चुनाव आयोग (EC) से जुड़े विवाद आमतौर पर राजनीतिक दलों के साथ ही सामने आते हैं, लेकिन आयोग के भीतर भी मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों के बीच अधिकार, फैसले और प्रक्रिया को लेकर कई बार मतभेद हुए. सबसे चर्चित मामला तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन और आयुक्त एमएस गिल व जीवीजी कृष्णमूर्ति का रहा.(Election Commission controversy) टकराव इतना बढ़ा कि शेषन ने दोनों आयुक्तों को एक मौके पर ‘दो गधे’ तक कह दिया. मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और अदालत ने लक्ष्मण रेखा खींच दी.
शेषन और दो आयुक्त : मामला पहुंचा सुप्रीम कोर्ट
1 अक्टूबर 1993 को केंद्र सरकार ने अध्यादेश के जरिए चुनाव आयोग को बहुसदस्यीय बनाया और एमएस गिल तथा जीवीजी कृष्णमूर्ति को चुनाव आयुक्त नियुक्त किया. तत्कालीन सीईसी टीएन शेषन ने इस व्यवस्था को चुनौती दी. उनका तर्क था कि नए आयुक्तों की नियुक्ति से सीईसी के अधिकार कमजोर किए जा रहे हैं.
दिसंबर 1993 में सुप्रीम कोर्ट(High Court) में जस्टिस पीबी सावंत और जस्टिस एनपी सिंह की पीठ ने मामले की सुनवाई की. पीठ ने माना कि मामला संविधान के अनुच्छेद 324 की व्याख्या से जुड़ा है और इसलिए इसे संविधान पीठ के सामने रखा जाना चाहिए.
संविधान पीठ ने सुनाया था फैसला
14 जुलाई 1995 को पांच जजों की संविधान पीठ ने फैसला सुनाया. पीठ में तत्कालीन सीजेआई एएम अहमदी, जस्टिस जगदीश शरण वर्मा, जस्टिस एनपी सिंह, जस्टिस एसपी भरूचा और जस्टिस एमके मुखर्जी शामिल थे.
अदालत ने बहुसदस्यीय चुनाव आयोग की व्यवस्था बरकरार रखी. फैसले के अनुसार चुनाव आयोग एक बहुसदस्यीय संवैधानिक संस्था है और फैसले सामूहिक रूप से लिए जाते हैं.
यह कैसी व्यवस्था?
सुप्रीम कोर्ट (High Court) ने साफ किया कि सीईसी आयोग के प्रमुख हैं, लेकिन अन्य चुनाव आयुक्त भी संवैधानिक संस्था का हिस्सा हैं और फैसले सामूहिक रूप से लिए जाते हैं.
यानी सीईसी अकेले आयोग के तौर पर फैसला करने का अधिकार नहीं रखते. आयोग के महत्वपूर्ण फैसले सामूहिक रूप से लिए जाने की व्यवस्था है.
1. 2009 : आयुक्त को हटाने की सिफारिश की
जनवरी 2009 में सीईसी (CEC) एन. गोपालस्वामी ने चुनाव आयुक्त नवीन चावला को हटाने की सिफारिश की थी. गोपालस्वामी ने चावला की निष्पक्षता पर सवाल उठाए थे.
राष्ट्रपति ने मार्च में सिफारिश स्वीकार नहीं की. इसके बाद चावला अप्रैल 2009 में सीईसी बने.
2. 2019 : लवासा की असहमति
2019 में चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने आचार संहिता की शिकायतों पर बहुमत के फैसलों से असहमति जताई. आयोग ने उनकी राय फाइल में रखने की अनुमति दी, लेकिन आदेश का हिस्सा नहीं बनाया.
इसके बाद लवासा ने बैठकों से दूरी बना ली और अगस्त 2020 में आयोग छोड़ दिया.
3. 10 महीने में 14 बार आपत्ति
चुनाव आयुक्त (Election Commission) सुखबीर सिंह संधू (Sukhbir Singh Sandhu)और विवेक जोशी ने 10 महीने में कम से कम 14 बार आयोग के फैसलों और प्रक्रियाओं पर आपत्तियां दर्ज कीं.
सीईसी को हटाने के लिए विशेष बहुमत जरूरी
मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) को पद से हटाना आसान नहीं है. संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत उन्हें सुप्रीम कोर्ट के जज की तरह ही हटाया जा सकता है.
इसके लिए सिद्ध कदाचार या अक्षमता के आधार पर संसद के दोनों सदनों में प्रस्ताव पारित होना जरूरी है.
प्रस्ताव को प्रत्येक सदन की कुल सदस्य संख्या के बहुमत के साथ-साथ उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई समर्थन की जरूरत होती है. इसके बाद राष्ट्रपति हटाने का आदेश जारी करते हैं.
दूसरे बड़े विवाद
- ईवीएम-वीवीपैट- मशीनों की विश्वसनीयता और वीवीपैट सत्यापन का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा.
- बिहार एसआईआर- 2025 में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण पर विवाद हुआ.
- गुजरात चुनाव, 2002- दंगों के बाद विधानसभा चुनाव टलते रहे. इस पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई.
- आयुक्तों की नियुक्ति- चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर भी सुप्रीम कोर्ट में मामला पहुंचा. 2023 में संविधान पीठ के
- जरिए व्यवस्था दी गई, जिसके बाद संसद ने नया कानून बनाया.
Written By: Rajiv Mandal
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