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अयोध्या को मिली ऐतिहासिक सौगात, राम कथा म्यूजियम में पहुंची 233 साल पुरानी दुर्लभ रामायण पांडुलिपि
Authored By: Nishant Singh
Published On: Wednesday, January 21, 2026
Last Updated On: Wednesday, January 21, 2026
Ayodhya Ram Mandir: अयोध्या को भारतीय सांस्कृतिक विरासत की एक अनमोल सौगात मिली है. वाल्मीकि रामायण की 233 साल पुरानी दुर्लभ संस्कृत पांडुलिपि राम कथा म्यूजियम को भेंट की गई है. वर्ष 1792 की यह अमूल्य धरोहर देवनागरी लिपि में लिखी गई है, जिसमें ‘तत्त्वदीपिका’ टीका भी शामिल है. इससे अयोध्या को वैश्विक रामायण अध्ययन केंद्र बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है.
Authored By: Nishant Singh
Last Updated On: Wednesday, January 21, 2026
Ayodhya Ram Mandir: राम नगरी अयोध्या एक बार फिर अपनी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक गरिमा के कारण विश्वभर में चर्चा का केंद्र बनी है. इस बार वजह है वाल्मीकि रामायण की 233 वर्ष पुरानी दुर्लभ संस्कृत पांडुलिपि, जिसे अयोध्या स्थित अंतरराष्ट्रीय राम कथा म्यूजियम को भेंट किया गया है. यह केवल एक प्राचीन ग्रंथ नहीं, बल्कि भारत की हजारों साल पुरानी ज्ञान परंपरा और सांस्कृतिक चेतना का जीवित प्रमाण है. इस अमूल्य धरोहर के अयोध्या पहुंचने से रामायण अध्ययन, शोध और जनसामान्य की समझ को एक नई दिशा मिलेगी.
1792 ई. की अमूल्य पांडुलिपि
संस्कृति मंत्रालय के अनुसार यह पांडुलिपि विक्रम संवत 1849, यानी 1792 ईस्वी की है. इसे संस्कृत भाषा में देवनागरी लिपि में लिखा गया है, जो उस काल की विद्वत परंपरा और लिपि शुद्धता को दर्शाती है. यह ग्रंथ आदिकवि महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण पर आधारित है, जिसमें महेश्वर तीर्थ द्वारा लिखी गई प्रसिद्ध टीका ‘तत्त्वदीपिका’ भी सम्मिलित है. इस टीका के माध्यम से रामायण के श्लोकों का दार्शनिक और व्यावहारिक अर्थ और अधिक स्पष्ट होता है.
रामायण के पांच प्रमुख कांडों का समावेश
इस दुर्लभ संग्रह में रामायण के पांच महत्वपूर्ण कांड शामिल हैं- बालकांड, अरण्यकांड, किष्किंधाकांड, सुंदरकांड और युद्धकांड. ये कांड भगवान श्रीराम के जीवन के विभिन्न चरणों को प्रस्तुत करते हैं, लेकिन केवल कथा तक सीमित नहीं रहते. इनमें भारतीय समाज की नैतिक व्यवस्था, कर्तव्यबोध, त्याग, मर्यादा और धर्म की गहन व्याख्या भी देखने को मिलती है. यही कारण है कि रामायण आज भी केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन दर्शन मानी जाती है.
राष्ट्रपति भवन से अयोध्या तक का सफर
यह पांडुलिपि इससे पहले राष्ट्रपति भवन, नई दिल्ली में संरक्षित थी. अब इसे स्थायी रूप से अयोध्या स्थित अंतरराष्ट्रीय राम कथा संग्रहालय को सौंप दिया गया है. इससे आम श्रद्धालुओं, विद्यार्थियों और शोधार्थियों को सीधे इस धरोहर को देखने और समझने का अवसर मिलेगा. अयोध्या जैसी पवित्र भूमि पर इस पांडुलिपि का संरक्षण अपने आप में एक ऐतिहासिक निर्णय माना जा रहा है.
सांस्कृतिक हस्तांतरण का ऐतिहासिक क्षण
यह महत्वपूर्ण पांडुलिपि केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति श्रीनिवास वरखेड़ी द्वारा प्रधानमंत्री संग्रहालय एवं पुस्तकालय की कार्यकारी परिषद के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्रा को सौंपी गई. इसे एक ऐतिहासिक सांस्कृतिक हस्तांतरण के रूप में देखा जा रहा है. यह कदम न केवल रामायण परंपरा के संरक्षण को मजबूत करता है, बल्कि भारत की प्राचीन ज्ञान संपदा को भावी पीढ़ियों तक सुरक्षित पहुंचाने का भी कार्य करता है.
अयोध्या को वैश्विक रामायण केंद्र बनाने की पहल
अधिकारियों का मानना है कि यह पहल राम कथा संग्रहालय को रामायण विरासत के वैश्विक केंद्र के रूप में विकसित करने में सहायक होगी. इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रामायण अध्ययन को नई गति मिलेगी और भारत की सांस्कृतिक पहचान और मजबूत होगी. कुलपति श्रीनिवास वरखेड़ी ने इसे वाल्मीकि रामायण के शाश्वत ज्ञान को अमर बनाने वाला कदम बताया, जबकि नृपेंद्र मिश्रा ने इसे अयोध्या और राम भक्तों के लिए भावनात्मक और ऐतिहासिक क्षण कहा.
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